और जानने की प्रक्रिया भी एकतरफा हो जाती है। बिल्कुल। यदि हम दूसरे को जानेंगे भी तो उस पर अपना आधिपत्य कायम करने के लिए । तो जानना व...
और जानने की प्रक्रिया भी एकतरफा हो जाती है।
बिल्कुल।
यदि हम दूसरे को जानेंगे भी तो उस पर अपना आधिपत्य कायम करने के लिए । तो जानना वहाँ पर आधिपत्य का पर्याय हो जाता है। जिसकी चर्चा Heidegger ने की उन्होंने आधुनिकता के ‘कर्ता’ में जो अंतर्निहित प्रभुत्व और हिंसा है, उसकी तरफ इशारा किया। तो यह चीज़ बड़ी दिलचस्प मुझे लग रही है कि यह प्रेम में जो संवाद है, उसमें यह चीज़ नहीं है। संवाद का एक रूप ऐसा भी हो सकता है, जिसमें एक-दूसरे पर वर्चस्व कायम करने की इच्छा न हो। और ये बस प्रेम में संभव है ।
हाँ बिल्कुल ,एक-दूसरे को समृद्ध करें, एक-दूसरे के नए आयामों को, संभावनाओं को उद्घाटित करे। मैं Plato को बहुत नहीं मानता हूँ, लेकिन Plato ने एक जगह बड़ा अच्छा कहा था। उसने कहा था कि प्रेम में यह जो बुनियादी प्रश्न है, what और who का – अंग्रेज़ी के ‘क्या’ और ‘कौन’ का उसमें ‘कौन’ ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है । आप व्यक्ति से प्रेम करते हैं और फिर उसके गुण और दोष बाद में गिनते हैं । जबकि जब ‘what’ का प्रश्न होता है तो वहाँ यह होता है कि कोई वस्तु लेने जाते हैं तो आप पहले उसके गुणों को देखते हैं, फिर उस वस्तु को खरीदते हैं । जबकि प्रेम में आप व्यक्ति से प्रेम करते हैं, who से प्रेम करते हैं, व्यक्ति पहले आता है और फिर उसके गुण अस्तित्व में आते हैं। प्रेम में इस who का, दूसरे मनुष्य का , जिससे आप प्रेम करते हैं, उसकी जो एकवचनात्मकता है, उसके प्रति आपका आकर्षण होता है। आप उसको अपने भीतर उद्घाटित होते महसूस करते हैं। यही संवाद का आधार बनता है। क्योंकि प्रेम में ‘क्या’ है और ‘क्या’ नहीं है के बीच संवाद नहीं होता। दो ‘कौन’, दो singularities, दो एकवचनात्मकताओं के बीच संवाद होता है। इसलिए वहाँ आधिपत्य का प्रश्न, दूसरे पर हिंसा का प्रश्न बनता ही नहीं है। जैसे-जैसे आप दूसरे की अद्वितीयता या उसकी एकवचनात्मकता को अपने भीतर उद्घाटित और आलोकित होते महसूस करते हैं, आप अपनी एकवचनात्मकता को भी उद्घाटित होते महसूस करना शुरू कर देते हैं। उसमें युद्ध, हिंसा या आधिपत्य की स्थिति ही नहीं बनती। क्योंकि यह बिल्कुल अलग संवाद है। जबकि दूसरी जिज्ञासा, जहाँ आधिपत्य स्थापित किया जाता है, वह what की जिज्ञासा है। इसमें क्या है? हमारे anthropology के अध्ययन के केंद्र में भी यही है कि हम यह जानें कि तमाम आदिवासी समुदायों या लोक समुदायों में ऐसी क्या चीज़ें हैं, जिनका सहारा लेकर हम उन्हें नियंत्रित कर सकें। उनकी लोक-व्यवस्था कैसी है? उनकी सरकार कैसी बनती है? उनके यहाँ शक्ति का संचरण कैसे होता है? लेकिन प्रेम में तो singularity का प्रश्न है। और आधुनिकता में इस एकवचनात्मकता, इस who से what की तरफ की जो यात्रा है, उसने सबसे ज़्यादा हिंसा की है। इसीलिए मैं कलाओं को सबसे ऊपर मानता हूँ और आज के समय में सबसे बड़ा निदान मानता हूँ, क्योंकि वे हमारी जिज्ञासा के केंद्र में दोबारा ‘कौन’ या एकवचनात्मकता को ला सकती हैं। कोई दूसरा नहीं ला सकता। प्रेम और कलाएँ – इसके अलावा कोई रास्ता नहीं है। बाकी सब में आप what खोजते हैं – इसमें क्या है, उसमें क्या है – और आपके चाहे-अनचाहे आधिपत्य या अधिकार उसमें रूप ले ही लेता है। आप कुछ भी कर लो। प्रेम में भी ऐसा होता है कि थोड़े दिनों बाद वह who से what में shift हो जाता है। प्रेम की लंबी मृत्यु की प्रक्रिया वहीं से शुरू होती है। कई बार हो सकता है कि जीवन में ऐसा कभी न हो, लेकिन कई बार हो भी जाता है ।
तो एक तरह से जो साहित्यिक रचनात्मकता है, वह प्रेम और करुणा के जो सबसे बुनियादी मूल्य हैं, जिनको आधुनिकता ने सबसे ज़्यादा नष्ट किया ,उन पर टिकी हुई है ।
बिल्कुल, बिल्कुल।
प्रेम और कलाएं उसकी दोबारा स्थापना का काम करते हैं, उसके महत्व की तरफ हमारा ध्यान ले जाते हैं। एक तरह से फिर,आपके रचनात्मक लेखन के ही साक्ष्य पर यह कहना ठीक होगा कि साहित्य आधुनिकता का एक प्रतिपक्ष है?
हाँ, बिल्कुल। बल्कि आप देखेंगे कि आधुनिकता के जितने प्रतिपक्षी रहे हैं – चाहे वह साहित्य हो, कलाएँ हों या महात्मा गांधी जैसे चिंतक – आज ज्यादा बड़ी धारा बन गए हैं। यह ज्यादा उम्मीद से भरी हुई धारा है। क्योंकि आधुनिकता, जो उम्मीद के साथ शुरू हुई थी, पूँजीवाद और ज्ञानोदय के साथ, उसने तो दम तोड़ दिया है। उसका आखिरी चरण जैसे dead man walking का है। वह एक मरे हुए आदमी का चलना है।
और वह दूसरे को भी मार रहा है।
हाँ, वह तो भयानक रूप से बीमार है, रुग्ण है। इसकी पड़ताल भी बड़े लेखकों ने की है। Kafka का जो लेखन है, वह इस मरती हुई आधुनिकता पर विलाप ही तो है। यानी वह बताता है कि एक castle में घुसने के लिए खुद उस castle के आदमी को कितना संघर्ष करना पड़ता है और वह कभी उसके अंदर पहुँच ही नहीं सकता। आधुनिकता ने शक्ति के जो केंद्र तैयार किये उसके साथ ही उसकी पूरी रहस्यावली भी विकसित की। उसे एक तरह से बिना तोड़े निस्सार करने का काम तो कलाएँ और प्रेम ही कर सकते हैं। उसे तोड़ने की जरूरत नहीं है। उसे defunct करने की, निष्क्रिय करने की जरूरत है। जैसे disuse atrophy होता है – आप उसका इस्तेमाल ही करना बंद कर दें, तो वह अपने आप सिकुड़कर खत्म हो जाए।
मुझे समझ में आ रहा है कि अप्रत्याशित रूप से आपके रचनात्मक लेखन की – मैं हिंदी की दुनिया की बात कर रहा हूँ, बाहर की दुनिया अलग रही है – जो चर्चा और प्रतिष्ठा आपकी होनी चाहिए थी, वह शायद उस तरह नहीं हुई। शायद इसकी वजह यह भी है कि हिंदी की दुनिया में साहित्य और कलाओं को समझने और उनका मूल्यांकन करने का जो तरीका है, वह आधुनिकता से ही प्रसूत है। और अगर आधुनिकता के विकल्प में या उसके विरोध में साहित्य की कोई रचनात्मकता खड़ी होती हुई दिखाई पड़ती है, तो उसको वे बर्दाश्त नहीं कर पाते। या तो उसको प्रतिगामी समझते हैं या सामाजिक दृष्टि से उसका कोई महत्व उनके समझ में नहीं आता। फिर उसके प्रति या तो वे रुष्ट होते हैं, आक्रोश व्यक्त करते हैं या उपेक्षा का भाव अपनाते हैं।
बिल्कुल।
शायद एक बड़ा कारण यह रहा है कि आपकी रचनाओं को ठीक से समझा ही नहीं गया। आपके रचनात्मक लेखन की जो सबसे महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टियाँ हैं, उसकी संवेदनात्मक और वैचारिक कल्पनाएँ हैं, उनको समझने और खोलने का जो प्रयास होना चाहिए था, हिंदी की दुनिया में वह शायद अभी भी नहीं हुआ है। या अगर हुआ हो तो मुझे जानकारी नहीं है।
एक-दो लोग, समझ लीजिए, कुछ हद तक मदन ने कविताओं को उनकी पूर्णता में समझने की कोशिश की है।
जी।
और वागीश जी ने भी कुछ हद तक कोशिश की है । मेरी रचना समझी या नहीं समझी, यह बात एक मिनट के लिए छोड़ भी दें। लेकिन यह जिस किस्म की आलोचना को जन्म दे सकती थी, उसमें आप नए तरह से कृति और कृतियों को देख सकते थे। आप आखिरकार आलोचना करते हुए कृति की पुनर्रचना भी तो करते हैं। एक अच्छा आलोचक यही करता है कि वह कृति को नए तरह से पुनर्संयोजित कर देता है। अगर वह करने की प्रवृत्ति हममें आ जाती, अगर इतना भी काम इससे हो जाता, तो बहुत बढ़िया था।
बिल्कुल।
न सिर्फ़ इस अभाव के कारण हमारी जो रचनाएँ हैं, वे बोझिल हुईं, बल्कि हिंदी साहित्य की अधिकतर जो रचनाशीलता है, वह अपठनीय होती चली गई। उसमें ऊर्जा का अभाव होता चला गया। अगर ऐसी कृतियों से टकराने की आलोचना ने कोशिश की होती, तो जो कृतियाँ आज हमें बड़ी बासी जान पड़ती हैं, उनमें जो भी नवीन तत्व होता, आलोचना उसे उद्घाटित कर देती। आखिर ऐसा कोई रचनाकार नहीं हो सकता जिसमें थोड़ी-बहुत भी प्रतिभा हो और जिसमें कोई नवीनता न हो।
हाँ।
उस नवीनता का रेखांकन तो तब हो पाता जब आप आलोचना ढंग की करते। वह नहीं हो पाया।
अब शायद उसका एक कारण यह भी है कि यह कार्य आसान नहीं होत। कुछ नया सोचना होता है । कुछ नया सृजित करना होता है।
हाँ।
लेकिन हमारे पास तो पहले से बनाया हुआ एक ढाँचा है।
बस उसमें ही हर रचना को डाल दीजिए।
डाल दीजिए फटाक से एक सॉफ्टवेयर तो आपके पास है ही , तुरंत निष्कर्ष मिल जाएगा ।
बिल्कुल ,toolkit जैसा ।
अब कहानी के बाद अगर आपकी कविताओं के बारे में चर्चा करें, तो मेरे खयाल से आपके चार कविता-संग्रह हैं ।
जी।
‘कुछ वाक्य’, ‘केवल कुछ वाक्य’, वह पाँच हैं, ‘खुली आँख और अन्य कविताएँ’।
जी।
और ‘पागल गणितज्ञ ’ तो सबसे नवीनतम आपका संग्रह है।
जी।
तो जैसे कि आपने कहा था और वहाँ पर फिर मैं वापस आऊँ कि आपको पूरी की पूरी पंक्ति दिखाई पड़ती है। आपको प्रतीति होती है कि यह पंक्ति आ गई।
जी।
और फिर आपका लिखने का सिलसिला शुरू होता है। विशेष रूप से कविताओं को। तो कविताओं के बारे में आप थोड़ा-सा बताइए। शुरुआत यहाँ से हुई आपकी ,कि जब तक एक पूरी की पूरी पंक्ति आपको नहीं मिल जाती, आप नहीं शुरू करते।यह जो सिलसिला शुरू हुआ, उसकी कहानी क्या है?
मैं बहुत ज्यादा लिखता था और बहुत ज्यादा काटता था। लेकिन शुरुआती दिनों में, जब मैं 18-19 बरस का था, कॉलेज में रहा होऊँगा, तब जब कविता पहली बार छप गई, उसके बाद तरह-तरह की कविताएँ लिखने का प्रयास शुरू हो गया।
लेकिन हर कविता को लिखने के बाद मुझे यह जरूर लगता था कि मैं वहाँ तक नहीं पहुँच पा रहा हूँ, मैं वह नहीं कर पा रहा हूँ जो करना चाहता हूँ। ऐसी ही भावना हमेशा बनी रहती थी। हालाँकि वह कविता हो जाती थी। मेरे मित्रों को, प्रकाशित होने के बाद, बहुत से लोगों को शायद वह पसंद भी आती थी। लोग कहते भी थे। पहले लोग चिट्ठियाँ लिखते थे, तो वे चिट्ठियाँ भी आती थीं। लेकिन एक वक्त आया, मेरी उम्र तब 24 बरस की रही होगी। तब तक मैं पाँच-छह साल से कविताएँ लिख रहा था। उस वक्त मैंने एक गद्य कविता लिखी। मैं यूँ ही बैठा था। एक कविता थी जो मुझे लग रहा था कि मैंने लिख ली है, लेकिन यह ठीक से बन नहीं पाई है, इसमें कुछ गड़बड़ है। तो हफ्ते भर मैं उस पर काम करता रहा। फिर उसका एक स्वरूप बना। उसके ठीक बाद मुझे वह कविता सुनाई देनी शुरू हुई और काफी स्पष्ट रूप से मुझे वाक्य के वाक्य सुनाई पड़े। एक आता, फिर दूसरा आता। जब पूरा आ जाता, तब मैं उसे लिख देता । ऐसा करके मैंने कुछ तीन दिन में चार-पाँच कविताएँ लिखीं। जब वे कविताएँ मैंने लिख लीं तो मैं एक कविता-पाठ में गया। वहाँ कुंवर नारायण और विनोद जी और ऐसे ही पाँच-छह कवियों का काव्य-पाठ था। जब मैं उनकी कविताएँ सुन रहा था तो मुझे लगा कि ये लोग किसी पुराने युग की कविताएँ लिख रहे हैं। मुझे एक ऐसा फॉर्म मिल गया था, जिसके आलोक में मुझे लग रहा था कि ये जो कविताएँ कह रहे हैं, वो मुझे पुरानी लग रहीं थीं । मुझे ऐसा लगने लगा जैसे उन कवियों कि कविताओं में एक केंद्रीय थीम है, जिसके चारों तरफ कविता बनाई जाती है। मैं आपको बिल्कुल सच्ची बात बता रहा हूँ। अब मैं ऐसा नहीं सोचता। लेकिन तब मेरे मन में यह बात आई कि यह तो कविता का बिल्कुल पुराना फॉर्म है जिसका ये प्रयोग कर रहे हैं और मैं पहले ही कुछ नया कर चुका हूँ। यह जो अनुभव मेरे अंदर आया, यह मुझे बहुत काम आया। इसलिए नहीं कि मैंने कभी किसी का तिरस्कार किया हो,बल्कि इसलिए क्योंकि मैं उस पर बार-बार सोचता रहा। मुझे यह समझ में आया कि मैं जो लिख रहा हूँ और यह जो मैंने लिख दिया है यह उसके ज्यादा नजदीक है जो मैं लिखना चाहता था । और उसके कारण कविताओं की पहली बड़ी श्रृंखला मैंने लिखी, जिसका नाम था ‘कुछ वाक्य’, और जो ‘पूर्वग्रह’ में छपी। यह मैं डेढ़-दो साल तक लिखता रहा था। उन दिनों मैं बिल्कुल इस तरह कविता लिखता था – एक वाक्य आया और फिर दूसरा। ऐसे नशे में रहता था कोई डेढ़ साल। मुझे केवल ये वाक्य सुनाई पड़ते थे। दोस्तों से बात करते हुए भी मैं कभी भी उठकर कहीं से चला जाता था। अगर वह कविता पूरी हो गई हो तो फिर मैं कहीं ऐसी जगह चला जाता था जहाँ मैं उसे उतार दूँ। कविता उतारते वक्त, एक गद्य कविता लिखते वक्त, इन वाक्यों का एक-दूसरे के साथ संबंध है या नहीं, मैंने कभी नहीं सोचा। मैं उसको पूरा लिख देता था, क्योंकि मेरे मन में वह पूरी हो गई होती थी। मुझे एक ऐसी अनुभूति हो जाती थी कि यह अब ये पूरी हो गई, तो फिर मैं लिख लेता था। ऐसे करके मैंने कोई 25-26 कविताएँ लिखीं, जो सारी की सारी एक लंबी श्रृंखला के रूप में ‘पूर्वग्रह’ में छपीं। गहरे गुलाबी रंग के कागज में। तब मदन सोनी थे और ध्रुव शुक्ल संपादक थे। उनको बहुत ज्यादा अच्छी लगीं। उन्होंने वो कविताएँ उसमें छापीं और उन कविताओं को पढ़कर बहुत सारे लोगों की प्रतिक्रियाएँ भी आईं । प्रतिक्रियाएँ दोनों तरह की थीं। उन्होंने कहा, “अरे, ये तो कविता है ही नहीं ।” इसके लिए मैं थोड़ा तैयार था, क्योंकि मैंने उनको कविता कहा ही नहीं। मैंने उनको ‘कुछ वाक्य’ कहा। मेरे मन में यह था कि आचार्य विश्वनाथ ने कहा है कि रसयुक्त वाक्य काव्य होता है। तो मैंने कविता कहने की जगह वाक्य कहा। मैंने कुछ वाक्य कहा। जब वो ‘पूर्वग्रह’ में छपीं तो मुझे भी उन कविताओं को लिखकर ऐसा लगा कि हाँ, मैं आठ साल से इस तरह का कुछ लिखना चाहता था या इस तरह की कविता का इंतजार कर रहा था, जो अब आई। और उसमें जब पढ़ेंगे तो आप देखेंगे ; उसमें हमारी एक दोस्त हैं, तेजी ग्रोवर उन्होंने संयोग से एक बात कही। उन्होंने ये कविताएँ पढ़ीं तो उन्होंने कहा कि यह जो कवि है, ऐसा है जो मृतकों के साथ ज्यादा रहता है।
इस पर हम बात करेंगे।
मृतकों के साथ ज्यादा रहता है जीवितों की तुलना में। तो ये सारे जो हमारे पुरखे थे, वो सारे कविताओं के वाक्यों में विन्यस्त होकर आते चले गए। हमारा जो सागर का पुराना घर था, वो एक दूसरी तरह से दोबारा मेरे चारों तरफ बसने लगा ।बल्कि मैं आपको एक अजीब संयोग इसके साथ सुनाऊँ कि मेरी भाभी, रश्मि भाभी, उन्होंने ये कविताएँ अंग्रेजी अनुवाद के रूप में पढ़ीं। इन कविताओं में से पाँच कविताओं के अनुवाद एक किताब, Penguin Book of World Prose Poems, में छपे हैं। मेरी भाभी ने जब वो कविताएँ उस किताब में पढ़ीं – वो किताब मैंने तब देखी भी नहीं थी – तब वो दिल्ली में थीं। उन्होंने वो पढ़ीं तो काफी रुआँसी हो गईं, क्योंकि वो घर छूट चुका था। वो घर तो अब है ही नहीं , तब भी उनको नजर आया कि घर वहीं बसा हुआ है, ये पूरा घर । ये वो घर था जिसमें जीवित और मृतक सारे साथ-साथ रहते थे। और इन सारी कविताओं से मुझे एक नई चीज और समझ में आई थी और वो ये कि छंद, यानी कविता का जो संगीत है, वो टुकड़ों में नहीं बसता, वो मीटर में नहीं बसता। वो कहीं गहरे बसता है ,तब मुझे यह बात समझ में आई कि कविता में जो सांगीतिकता है, वो वाक्यों के एक किस्म के विन्यास में है, न कि तुकों में। तुक असल में ताल है। अगर आप एक ऐसी कविता की कल्पना करें जिसमें लय हो और इस लय की सांगीतिकता हो, तो यह आप अच्छे गद्य में भी ला सकते हैं, दूसरी तरह की कविताओं में भी ला सकते हैं, गद्य कविताओं में भी ला सकते हैं। यह संगीत मैंने गद्य और गद्य कविताओं में होता हुआ उन कविताओं को लिखते हुए महसूस किया।
एक बात मैं वहीं से पूछना चाहूँगा, जहाँ से शुरू में आपने जिक्र किया। कुछ कवियों की गोष्ठी में आप गए। कुछ लोग थे और उनकी कविताएँ आपको लगीं कि ये बहुत गुजरे जमाने की हैं। यह outdated है। तो ऐसा क्यों लगा आपको क्या उसमें एक तरह से closure था या idea की centrality थी? उस तरह का open-ended नहीं था। या time को लेकर आपकी बड़ी गहरी समझ थी, जिसकी वजह से आपको लगा कि ये कविताएँ काफी पीछे के दौर की हैं , बासी कविताएँ हैं?
आपने अपने सवाल में तीनों जवाब दे दिए।
अरे नहीं! मैं तो आपके कहने से थोड़ा-सा guess कर रहा था कि शायद कुछ इस तरीके का ही हो, ताकि दूसरे लोग जो पढ़ेंगे, उन्हें समझ में आए ।
बिल्कुल। मुझे यह लगा कि इन कविताओं में एक केंद्रीय कथ्य है, theme है और उस कथ्य को एक जगह से उठाते हैं और एक जगह लाकर उसको पूरा कर देते हैं। यानी उसमें closure हो जाता है। कविता में लेने लायक जो चीज थी, जो मुझे लगी तब, वह उस कविता के closure के बाद का एक विचार था। आप इस कविता में प्रविष्ट नहीं होते थे। आप उस विचार को ले लेते थे और उसके बाद आगे चलते थे। संयोग से यह कुंवर नारायण की कविता के विषय में आज भी सच है और वह तब भी था। और भी कुछ कवि थे, जिनमें यह था कि आपने कोई एक object लिया, मान लीजिए कोई एक वस्तु ली और उसके चारों तरफ आपने एक कविता का ताना-बाना बुना और उसको एक जगह ले जाकर खत्म कर दिया। यह वो कविताएँ थीं। नंबर दो, इसमें समय के साथ कोई छेड़खानी नहीं थी। कविता में chronology बराबर बनाए रखी जाती थी। तीसरा, इसमें एक तरह की भीतरी rationality थी। इन तीनों चीजों और समय के साथ छेड़छाड़ न होने और closure के कारण मुझे लगा कि यह तो कुछ पीछे के बीते हुए युग की बात है। यह जो कविताएँ अभी मेरी टेबल पर लिखी हुई रखी हैं, इनमें तो कुछ और हो गया है। तब मुझे लगा कि जो मैंने कविताएँ लिखी हैं, ये कविताएँ कुछ और हैं, बीते हुए जमाने से अलग। आज मैं अगर उसको कहूँ तो मैं कहूँगा कि मुझे संभवतः यह लगा कि यह किसी दूसरी पृथ्वी की हैं।
और ये गुजरे जमाने के लोग हैं, जो कविताएँ सुना रहे हैं आज के जमाने में।
जब मैं इनको सुनता था तो मुझे लगता था, अरे, ये तो ऐसे ही बस खत्म हो गई। तो मुझे इन कविताओं को लिखने के बाद अन्य कविताओं की जो रूपाकार, बल्कि जो structuring वो लोग कर रहे थे, वो और अच्छे से समझ में आने लगी। तब तक मैंने यह इतना गहराई से नहीं सोचा था कि elaboration केंद्र में होता है। लेकिन मैं लिख चुका था । आज मैं कह सकता हूँ कि इन कविताओं में वह जो बढ़त का विचार था, वह बिल्कुल केंद्रीय था। केवल विचार नहीं, उसकी प्रक्रिया । उसका संभवतः एक कारण यह रहा हो – अब तो हम कयास ही लगा सकते हैं – कि संगीत में हमारी जो रुचि थी, हमारी classical में बहुत गहरी रुचि थी। उसमें closures होते नहीं थे, तो कहीं न कहीं यह बात ध्यान में रही होगी। लेकिन एक बात जरूर थी कि ये वो कविताएँ थीं, जो मैंने लिखी थीं, और जिनको मैं बिल्कुल अलग पा रहा था। इसलिए मुझे लगा कि कोई बिल्कुल नई बात है। बल्कि मैं आपसे यहाँ तक कहूँगा कि मेरे मन में वो आर्किमिडीज वाली बात थी ना – यूरेका! ऐसा हर्ष आया था। और मैंने, अगर मुझे ठीक याद है, मदन या मेरे कई अन्य मित्र बता सकेंगे, उनसे कहा भी था कि मुझे कुछ यूरेका जैसी अनुभूति होती है जब मैंने पहली मर्तबा ये कविताएँ उनको सुनाई । और वो भी एक अजीब घटना थी। मैं आपको बताना चाहता हूँ कि एक कानूनगो करके एक व्यक्ति होते थे। हिंदू प्रकाश कानून। वो अनुवाद करते थे। अंग्रेजी से ही अनुवाद करते थें । वो काफी अपठनीय अनुवाद करते थे। लेकिन वो व्यक्ति बड़े अच्छे थे । वो बिल्कुल वाक्य मक्खी पर मक्खी रखकर बनाते थे।
तो अपठनीय होंगे।
हाँ, अपठनीय थे । लेकिन उनके घर में मदन सोनी आते रहते थे। तो यह तय हुआ कि उदयन अपनी नई कविताएँ कानूनगो जी के घर पर पढ़कर सुनाए। आज अगर मैं उसका सिलसिला बिठाने का प्रयास करूंगा तो मैं बिठा नहीं पाऊँगा। यह बिल्कुल संयोग से हुआ था । उस समय वहाँ तीन-चार- लोग बैठे थे। फिर कविताएँ पढ़ी गईं और उसके बाद लोग इतने हतप्रभ थे कि यह क्या हो गया? यानी यह कोई बात हुई? यह क्या हो गया? और यह मैं आपको बताऊँ कि मेरे दोस्तों का इस दृष्टि से मेरे जीवन पर बहुत उपकार है कि उन्होंने इस बिल्कुल नवीनता को जिज्ञासा के साथ धारण किया, जानने की कोशिश की। उन्होंने यह नहीं कहा कि आपने यह क्या कर दिया! इसका कारण उनके अच्छे आलोचक होने या उनके अच्छे कवि होने में भी है। तो यह एक शुरुआत हुई, उसके बाद इन कविताओं की। और ये अकेली वो चीजें थीं जो मेरी अब जो पत्नी नहीं हैं, अंजना, उनको अच्छी लगीं। क्योंकि जाहिर है, जब वो ब्याह होकर आई थीं तो उनके सास-ससुर नहीं थे आसपास। पुराना घर नहीं था, कुछ नहीं था। अकेले एक आदमी से शादी। हमारे भाई-बहन जरूर थे, उन सबको वो देखती थीं। उन्हें लगा कि मानो वो अपने उस घर में प्रवेश कर गई हैं, जो कहीं था ही नहीं। जो बे-दर-ओ-दीवार का घर था, उसमें वो भी ज्यादा नहीं, थोड़ा रह सकीं – चार-पाँच महीने। इसी दौरान वो गर्भवती थीं और उसके बाद वो चली गईं। उनकी मृत्यु हुई। जब उनकी मृत्यु हुई तब मेरे दिमाग पर इतना ज्यादा असर पड़ा, इतनी चोट लगी मेरे दिमाग में कि शब्द और अर्थ के बीच का जो संबंध होता है, वो टूट गया। मुझे यह समझ में नहीं आता था कि लोग कुछ कर क्यों रहे हैं। मैं सड़क पर जाता था तो सारी मानवीय क्रियाकलाप, जिनके हम लोग अर्थ ढूँढ़ लेते हैं, वो दिमाग को कुछ समझ ही नहीं आते थें । मेरे तीनों गुरुओं ने मुझे बहुत सहारा दिया। मेरे दिमाग में एक फिल्म आनी शुरू हो गई। मैं सोचने लगा कि recreate कैसे की जाए । मैं इस पर सोचता रहा। तो मनी ने कहा, तुम्हें लिखना चाहिए। और फिर धीरे-धीरे एक की कविताओं की श्रृंखला, जो मैंने करीब 38 बरस लिखी है, वो आना शुरू हुई मेरे दिमाग में। फिर ये दो-तीन श्रृंखलाएँ मैंने एक साथ सालों-साल लिखीं। एक श्रृंखला शायद मैंने 38-39 साल लिखी है, एक 36-37 साल लिखी है। यह मैंने लिखना शुरू कर दिया। और ये वो कविताएँ हैं जिन्हें लिखते-लिखते मैंने दोबारा अपनी जो खोई हुई पत्नी है, उसके साथ बिल्कुल नए स्वरूप में एक बिल्कुल नया संबंध बनाया। और जिन्होंने पढ़ा उन कविताओं को, उनके भी जैसे संबंध उसके पहले तक उनसे थे, नए संबंध उनसे बनने लगे। जिन्होंने उनको जाना नहीं था, उन लोगों ने अपने मृतकों से संबंध बनाना, अपने खोए हुए लोगों से संबंध बनाना शुरू किया। और इसमें मुझे फिर से, राजकुमार, बहुत गहरी मदद एक फ्रांसीसी लेखक Marcel Proust के एक कथन से मिली। वो यह था कि कवि या लेखक का काम जीवन और मृत्यु के बीच की जो रेखा है, उसके आर-पार तस्करी करना होता है।
वाह!
तो इतना सारा लिखने के बाद जब मैंने यह वाक्य पढ़ा तो आप सोच सकते हैं कि मुझमें और भरोसा आया। और जाहिर है, बहुत बाद जब नवज्योति सिंह से मेरी मुलाकात हुई – वो तो आपकी उपस्थिति में ही हुई थी। एक बार, दो बार पहले हो चुकी थी, लेकिन बहुत गहरा संवाद तो मेरा बनारस में ही हुआ था उनसे – तो फिर उसका एक कारण विचार-विमर्श करने का यह भी था कि मैं यह सोचने लगा कि इनकी स्वीकृति या इनका सहज स्वीकार क्यों नहीं होता। तो फिर एक दूसरे किस्म की चिंताएँ भी शुरू हुईं। फिर सभ्यता का स्वरूप, और उसमें बहुत सारी चीजें जुड़ जाती हैं। लेकिन उसका core, ये कविताएँ कहानियाँ और उपन्यास ही हैं ।
बिल्कुल। आप ठीक कह रहे हैं। कविताओं ही नहीं, आपकी कहानियों, उपन्यासों को भी देखिए तो यह लगता है कि कहीं न कहीं, हिन्दी की चाहे वो कविताएँ हों, चाहे वो कहानियाँ हों या उपन्यास हों – जिस ढंग की कविताएँ, कहानियाँ, उपन्यास लिखे जा रहे थे, उनके प्रति जो एक आपका गहरा असंतोष था कि ये काफी गुजरे हुए जमाने की चीजें हैं ,काफ़ी स्पष्ट रूप में बाहर आया।
जी।
और आज दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई है। आप भारत से वाकिफ हैं, भारत की कथा-परंपरा से। और पश्चिम में भी बहुत सारी चीजें बदल गई है । लेकिन हिन्दी में एक बहुत ही औसत किस्म के Positivist Realism के आसपास पूरा साहित्यिक कारोबार आज भी चल रहा है।
बिल्कुल।
उसको लेकर जो एक गहरा असंतोष था, वो आपकी रचनात्मकता के सारे आयामों में दिखाई पड़ता है – कविता में भी, कहानी में भी और उपन्यास में भी। मैं यहाँ पर एक चीज रुककर आपसे पूछना चाहूँगा और वो है मृत्यु के बारे में । आपकी कविताओं में और कहानियों में भी, या फिर उसकी चर्चा थोड़ी बाद में करेंगे, ‘कयास’ में भी मृत्यु की उपस्थिति बहुत गहरी है। लगता है कि आपकी संवेदना को प्रभावित करने वाली जो चीजें हैं, उनसे मृत्यु का एक बहुत गहरा संबंध है। अब जैसे आज, जैसा कि आपने जिक्र किया कि शायद आप 11 साल के थे जब पिताजी की मृत्यु हुई और फिर पहली पत्नी की मृत्यु। तो ये दो व्यक्तिगत जीवन के प्रसंग हैं। लेकिन कई बार व्यक्तिगत जीवन के प्रसंग भी हमारी संवेदना को और फिर परोक्ष तौर से हमारी रचनात्मकता को बहुत गहरे प्रभावित करते हैं।
शायद वो प्रभाव आपकी रचनात्मकता में इस वजह से भी आया हो या उसके दूसरे कारण भी हों। लेकिन मुझे जो चीज कहनी है, वो यह कि सामान्य रूप से यह होता है कि किसी की मृत्यु या मृत्यु अगर न कहें तो उसकी अनुपस्थिति का एहसास, धीरे-धीरे स्मृति का हिस्सा बन जाता है। यानी वो पिघलता है और पिघलते-पिघलते कहते हैं ना कि रोने से, आँसू निकलने से दुख हल्का हो जाता है। जैसे आपकी कविताओं में तो विशेष रूप से, लेकिन और दूसरी जगह पर भी, मुझे लगता है कि वो जो अनुपस्थिति है, जो अब नहीं रहा, वो उस तरह से स्मृति का हिस्सा नहीं बनता है। वो हमेशा वर्तमान में ही रहता है। वो वर्तमान में साथ ही साथ है और कई बार उसको अगर आप स्मृति का हिस्सा बनाना भी चाहें तो वो इनकार करता है कि नहीं, हम स्मृति का हिस्सा बनकर विस्मृति के गर्त में जाने के लिए तैयार नहीं हैं। हम आपके साथ ही रहेंगे। और आपकी जो बहुत गहरी मार्मिक रचनात्मकता है, जो और लोगों की तरह मुझे भी बहुत अपील करती है । गद्य कविता में, कविता से जो रसानुभूति होती है, वहाँ कई बार बहुत सचेत होने पर भी आपकी आँखें छलछला आती हैं, वो शायद इस वजह से है कि आप जो अनुपस्थित हो गया है, उसको ओझल नहीं होने देना चाहते हैं ।वो ओझल होता ही नहीं है। तो ये जो दोनों की उपस्थिति है – जो है और जो नहीं है – उसके बीच जो आपकी कविताएँ बुनी जाती हैं, उसके बारे में थोड़ा सा आप और कुछ बताए । क्योंकि ये बहुत अलग है, मैंने ऐसा कुछ इस रूप में देखा नहीं है कहीं और ।
मैं आपका इस प्रश्न के लिए आभारी हूँ । जो आपने अभी कहा कि वो स्मृति का अंग नहीं बनती, इसलिए क्योंकि वो nostalgia नहीं है। Nostalgia बन जाएगी तो फिर धीरे-धीरे आप उससे दूर हो जाएंगे और वो साधारण हो जाएगी । और दूसरा, वो समय की linearity में आ जाएगा।
हाँ।
वो छूट जाएगा।
हाँ।
ये एक बुनियादी बात हम सबके, मनुष्य मात्र के अस्तित्व में है कि हमारे भीतर लगातार एक अभाव रहता है। अभाव इस चीज का है कि हम किसी विराट के अंश के रूप में रहे होंगे। आप प्रकृति कह लीजिए, कुछ लोग ब्रह्म कहेंगे, कुछ कुछ और कहेंगे। वो जो कबीर का रूपक है कि मटके में पानी है, पानी में आकाश नजर आ रहा है, मटका जो है समुद्र में रखा हुआ है अब जैसे ही मटका टूटता है पानी पानी में मिल जाता है।
“जल में कुम्भ , कुंभ में जल है, बाहर भीतर पानी।”
Correct. तो जब तक मटके के भीतर पानी है, और मटका टूटा नहीं हम अलग हैं । यानी जब तक हम जीवित हैं, तब तक हममें ये एक विराट अभाव है। इस विराट अभाव को हमारे जीवन में जो भी दूसरे अभाव आते हैं, वो आलोकित करते हैं। उस बड़े अभाव को ये जो वैयक्तिक अभाव है, ये आलोकित करते हैं। आप उस विराट के अभाव से अपना संबंध जोड़ो। ये सब में है। ऐसा कोई मनुष्य पैदा ही नहीं हुआ जो इस अभाव की धारणा लेकर, अभाव की गहरी अनुभूति लेकर पैदा न हुआ हो ।हमारे दोस्त थे सुरेश शर्मा, समाजशास्त्री, वैज्ञानिक। वो कहते थे – The Grand Absence. ये भव्य अभाव है। हमारे जीवन में जब जो अभाव पैदा होते हैं, वो इस भव्य अभाव को आलोकित करते हैं । इन कविताओं में ये जो आपको एक तरह की अनुभूति है, जो व्यापक, बड़ी अनुभूति है इनको पढ़ते हुए, वो इसीलिए होती है कि ये चाहे-अनचाहे, ये छोटे, ये जो वैयक्तिक अनुभव-अभाव हैं, ये विराट अभाव को बार-बार मेरे सामने लाकर खड़ा कर देते हैं।
दूसरा, मेरे मन में यह बात बहुत गहरी तक बस गई है इतनी गहरे कि वो मेरा शायद अवचेतन हो गया है कि मृत्यु के बाद व्यक्ति खत्म नहीं होता। मृत्यु के बाद उसकी पुनर्रचना करनी होती है। बार-बार उसको रचना पड़ता है। वो जाता है, फिर रचा जाता है, फिर रच के आ जाता है। ये बहुत सी कलाकृतियों में मैंने स्वयं पढ़ा है, आपने पढ़ा है। । हम जो भी अभाव जिंदगी में पाते हैं , हम अगर उसको स्वीकार न करें तो फिर हमारे पास रास्ता क्या बचता है?यही न कि उस अभाव की पुनर्रचना की जाए। उसको पुनः एक तरह के प्राण दिए जाएँ। उसकी प्राण-प्रतिष्ठा दोबारा हो, दोबारा उसके शरीर को बनाया जाए । अगर यह प्रयास आप कर रहे हैं, अगर आपसे यह प्रयास हो रहा है,तो यह आपकी creative spirit है। अगर आपके भीतर है तो आपके पास बहुत सारे जो रास्ते होंगे, उसमें लिखना एक तरह का रास्ता होगा । इस तरह का लिखना जहाँ मृत्यु एक तरह के अर्धविराम के रूप में आएगी। जहाँ मृत्यु आपको नए सृजन के लिए प्रेरित करेगी और आप मृत्यु के साथ इतने सहज हो जाएँगे जितने आप अपने किसी मित्र के साथ होते हैं। यह वाक्य लिखने से नहीं होता कि मौत मेरी दोस्त हो गई है। इस वाक्य का कोई मतलब नहीं है, लेकिन रचना ऐसी हो, उसमें समय का स्वरूप ऐसा हो, उसमें भाषा का विन्यास ऐसा हो। उसमें जो लोगों के आपसी संबंध हैं, चरित्र हैं , उसका जो संगीत है, उसका स्वरूप ऐसा हो कि यह एहसास कि मृत्यु कहीं जाकर मृत्यु, मानवीय जीवन या किसी भी अस्तित्व का अंत नहीं होता है, यह बात उद्घाटित हो सके। और इसी के कारण जो करुणा का अनुभव है, वो हो । क्योंकि करुणा उन रसों में है जो inclusive होती है। करुणा कभी किसी भी व्यक्ति को अपने दायरे से बाहर नहीं करती। क्यों बुद्ध का इतना बड़ा स्थान भारतीय परंपरा में है और पूरी दुनिया में है? क्योंकि करुणा से बड़ा, अगर मैं इसको political शब्दावली में कहूँ, anti-nationalist कुछ नहीं है। क्योंकि nationalism हमेशा exclusive होता है। करुणा हमेशा inclusive होती है। उसमें देश का बंधन नहीं होता। उसमें दुश्मन नहीं होता। वो शामिल करती है। तो यह जो अभाव की अनुभूति है, यह इतनी विराट है हम सबके भीतर। और अगर आपका जो व्यक्तिगत अभाव है, अगर आप उसको आलोकित करने लगते हैं, तब ऐसी पंक्तियाँ बनना, मैं ऐसा कयास कर रहा हूँ, कि शुरू होती होंगी। जिसमें nostalgia नहीं होता, जिसमें कुछ पीछे नहीं छूटता।
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