पास्तीश की संस्कृति के चार अध्याय:हरी चरन प्रकाश भाग -2

सबसे बड़ी चिंता यह है कि वर्मा जैसे समर्थ कलाकार की रचना में आकर पास्तीश भारतीय साहित्य में वैधता प्राप्त करने की वह दावेदारी कर सकता है, जिसका वह हकदार नहीं है। उसकी अवज्ञा करना इसलिए कठिन हो जाता है क्योंकि वह अत्यंत सघन काव्यात्मकता की गद्य-तरंगों पर बिछलता हुआ आता है और आश्चर्यविजड़ित कर देता है। .....



.....उपर्युक्त कथन मृदुला गर्ग पर लागू नहीं होता है, जो सांस्कृतिक पास्तीश को बढ़ावा देने वाली एक अन्य लेखिका हैं। चूँकि उनके पास निर्मल वर्मा जैसी सम्मोहक और समर्थ प्रतिभा नहीं है, इसलिए उनके साहित्य में पास्तीश का असुन्दर चेहरा साफ-साफ दिखाई पड़ता है। जहाँ वर्मा हमें पास्तीश के पड़ोस में ले जाते हैं, वहीं मृदुला गर्ग के साथ हम पास्तीश के खोखले शोर में रहते हैं। 'पास्तीश ऐज प्रिटेंस: थ्री नॉवेल्स ऑफ़ मृदुला गर्ग' के अंतर्गत उनके तीन उपन्यासों—'उसके हिस्से की धूप', 'मैं और मैं' तथा 'चित्तकोबरा' पर अपनी बात रखते हुए प्रो. जयदेव पहले ही प्रस्तर में यह घोषणा करते हैं कि मृदुला गर्ग बिना किसी विवेक के ही हर चमकदार चीज़ झपट लेती हैं जो उन्हें सतह पर दिखाई देती है। वर्मा के साहित्य के विपरीत, उनके कथा-साहित्य में न तो कोई सार्थक अंतर-सांस्कृतिक संपर्क है और न ही किसी संस्कृति को गहराई से समझने की इच्छा। गर्ग के लेखन में तरह-तरह के संकेत हैं जैसे-पाश्चात्य नारीवाद, उच्च आधुनिकतावाद, अस्तित्ववाद और मार्क्सवाद जिनका प्रदर्शन वह बस घिसे-पिटे जुमलों के जरिए करती हैं। हालाँकि निर्मल वर्मा अक्सर अपने चरित्रों के सामाजिक संदर्भ की उपेक्षा करते हैं, लेकिन वे जो कुछ पश्चिमी साहित्यिक संस्कृति से लेते हैं, उसकी गुणवत्ता बनाए रखते हैं। मृदुला गर्ग पश्चिम से जो कुछ भी ग्रहण करती हैं उसका प्रदर्शन तो करती हैं, परंतु उनकी इस अभिरुचि में सामर्थ्य का अभाव है। वह कभी-कभी वर्मा की नकल करती हैं, लेकिन उन्हें 'पुअर मैन्स वर्मा' भी नहीं कहा जा सकता; लगता है वह 'लुम्पेन्स वर्मा' हैं। प्रो. जयदेव स्पष्ट करते हैं कि उन्होंने अपने अध्ययन के लिए मृदुला गर्ग को इसलिए चुना क्योंकि उनके उपन्यास हमें एक सांस्कृतिक बंजर भूमि में ले जाते हैं और वे इस बात का सबसे मौजूँ उदाहरण हैं कि सतही प्रभावों से ग्रस्त पास्तीश किसी भी संस्कृति का बट्टाधार कैसे करती है। खास तौर पर 'चित्तकोबरा' में तो यह पास्तीश अत्यधिक उद्धत है।

'उसके हिस्से की धूप' इस लिहाज से कुछ संतोषजनक है कि उसका फॉर्म सरल, साफ और विडंबनात्मक है। मनीषा के दो विवाह होते हैं—एक अरेंज्ड और दूसरा रोमांटिक। दोनों में ही उसे बोरियत मिलती है और दोनों ही स्थितियों में वह विवाहेतर संबंध बनाती है। विवाहेतर प्रेम में उसे पूर्णता और स्वतंत्रता का बोध होता है, लेकिन जैसे ही वह अपने प्रेमी से विवाह करती है, यह पूर्णताबोध गायब हो जाता है। मर्द प्रेमी के रूप में अच्छे हैं, लेकिन पति के रूप में नहीं। पाश्चात्य नारीवाद का यह एक परिचित दृश्य है।

उपन्यास के शुरुआती अंश में मनीषा की रूमानी विडंबना को मृदुला गर्ग ने अच्छी तरह निभाया है, जब अपने दूसरे पति के साथ नैनीताल गई मनीषा अपने पहले पति से मिलती है और एक किशोरी की तरह प्यार में ढ़ेर हो जाती है। इसके बाद का उपन्यास मनीषा के कृत्रिम और बनावटी रूप की प्रस्तुति का उपन्यास है। सारी की सारी आधुनिकतावादी, अस्तित्ववादी और नारीवादी रूढ़ियाँ मनीषा पर लाद दी जाती हैं; उसे सारे सामाजिक संदर्भों से विलग कर दिया जाता है। इस अस्तित्ववादी अकेलेपन में मनीषा जीवन को 'एक पत्नी की स्थिति' और 'एक कामिनी की निजता' के युग्मज विरोध के माध्यम से देखती है। घर पिंजड़े हैं, वह कमरे जहाँ वह अपने प्रेमियों से मिलती है, मुक्ति-स्थल हैं। उसे अपने पतियों से बहुत उम्मीदें हैं, हालाँकि वैवाहिक जीवन में वह देह के अलावा और कुछ ख़र्च करने के लिए उत्सुक नहीं है। इसके साथ ही यह अजीब शिकायत भी है कि पत्नियाँ अपने पतियों की यौन तृप्ति का साधन और उद्देश्य हैं; पति के साथ जो कुछ है वह वासना है, और प्रेम तो कुछ और ही है। इस तरह प्रेम और विवाह के बीच एक ध्रुवात्मक दूरी बनाई जाती है, जिसमें एक बौद्धिक चटपटापन है। मृदुला गर्ग के उपन्यासों में विवाहेतर प्रेम सत्य की भाँति अपने आप में औचित्यपूर्ण है। परंतु इससे भी अधिक गौर करने योग्य बात यह है कि विवाहेतर प्रेम का उनके लिए कोई सार्थक पाठ लेकर नहीं आता है जो रात दिन हमारे पितृसत्तात्मक समाज की यौन-राजनीति की पीड़ा भोगते हैं। गर्ग के यहाँ विवाह की संस्था खाहमखाह और खामख्याली में अपदस्थ हो जाती है। यहाँ तक कि जब अंत में मनीषा अपने लेखन में स्वयं की पूर्णता ढूँढती है, तो वह भी केवल इसलिए कि उपन्यास की ऐसी सजावट अस्तित्ववादी भी है और सौंदर्यवादी भी। 'उसके हिस्से की धूप' का अंत डोरिस लेसिंग के 'द गोल्डन नोटबुक' की याद दिलाता है, जहाँ नायिका लेखिका का 'राइटर्स ब्लॉक' उस समय टूटता है जब उसका अमरीकन प्रेमी उसे नोटबुक देता है और उसके नए उपन्यास का पहला वाक्य भी। मनीषा की मानसिक स्वच्छंदता उसकी बौद्धिक ऋणग्रस्तता का ही पर्याय है और वह मात्र एक पास्तीश है।

गर्ग के उपन्यास 'मैं और मैं' में तमाम चीजों की ढेरियाँ लगी हैं—अति-नाटकीयता, सतही भावुकता, फूहड़पन, अहंकार, कृत्रिम भोलापन और पश्चिमी संकेत-चिन्ह। इसमें पास्तीश का वैध उपयोग नहीं, बल्कि उसका लालची उपभोग है। इसके दोनों प्रमुख चरित्रों की बुनावट में पाश्चात्य व्यंजनात्मकता का उपभोग बिना उन्हें अनुकूलित किये हुए किया गया है, जिसके कारण ये चरित्र केवल शोर पैदा करते हैं।

'मैं और मैं' की यह अभिलाषा है कि उसे 'मेटाटेक्स्ट' और 'सोशल टेक्स्ट' दोनों समझा जाए। यह दो कलाकारों की कथा है जिसमें स्त्री (माधवी) उच्च मध्यवर्ग से है और पुरुष (कौशल कुमार) निम्न वर्ग से है। उपन्यास में इन दो चरित्रों के बीच जो विवाहेतर यौनता है, वह अवचेतन के स्तर पर है। कौशल माधवी का शारीर भोगने में तो असफल है, अलबत्ता वह उसके दिमाग पर खाशा दख़ल रखता है। दोनों के बीच का आकर्षण-विकर्षण सामाजिक विमर्श की पृष्ठभूमि तैयार करता है, जो आर्थिक व्याख्याओं से ओत-प्रोत है। उपन्यास का मुख्य सामाजिक सम्पर्क कौशल कुमार के जरिए है, जो एक जीवंत चरित्र कम और लेखिका की एक बहुउद्देश्यीय लेखकीय युक्ति अधिक है। वह एक साहित्यिक माध्यम है जिसके जरिए लेखिका-नायिका का दोस्तोएव्स्की, काफ्का और कामू से सतही परिचय प्रकट होता है। कौशल का रूप-रंग और माधवी के प्रति उसकी यौनासक्ति जिस वर्गीय ढंग से दिखाई गई है, वह वर्ग-चेतना का मखौल उड़ाने जैसा है।

'चित्तकोबरा' पास्तीश की संस्कृति का पूरी भयावहता के साथ प्रतिनिधित्व करता है। एक गंभीर अंतर्दृष्टा उपन्यास माने जाने के लिए इसमें अप्रामाणिक संकेत-चिन्हों को जिस तरह प्रदर्शित किया गया है, वह लगभग अविश्वसनीय है। 'चित्तकोबरा' की नायिका 'मनु' भी 'उसके हिस्से की धूप' की मनीषा की तरह लेखिका है। मनु एक विवाहित स्त्री है, जिसका पति 'महेश' उसकी अन्वेषणात्मक नैतिकता को चुपचाप स्वीकार करता है, लेकिन इसके बावजूद बात बनती नहीं है। यानी, अभी भी विवाह एक गड़बड़ी  है। वह महसूस करती है कि महेश के साथ यौन संबंध उसे हीन बनाते हैं, जबकि अपने प्रेमी 'रिचर्ड हचिन्सन' के साथ बिताए गए ऐसे ही क्षण उसका उदात्तीकरण करते हैं।

'चित्तकोबरा' की प्रस्तावना में मृदुला गर्ग दो मुद्दे उठाती हैं। पहला कुछ-कुछ आचार्य रजनीशात्मक है, जो 'संभोग से समाधि तक' का मार्ग प्रदर्शित करता है। इस मामले में मनु अपनी पूर्ववर्ती मनीषा से बढ़-चढ़ कर ही है; क्योंकि न केवल वह विवाहेतर संबंध रखती है, बल्कि प्रेमी की मृत्यु के बाद कुछ मसीहाई अंदाज़ अख्तियार कर लेती है। प्रस्तावना में दूसरा मुद्दा उपन्यास की संरचना को लेकर है। यह उपन्यास पारंपरागत सुनिर्मित उपन्यास से भिन्न है। हालाँकि गर्ग इसे 'स्ट्रीम ऑफ कॉन्शसनेस' का उपन्यास नहीं कहतीं, लेकिन उपन्यास की आधुनिकतावादी आकांक्षाएँ आरंभ से ही स्पष्ट हैं। उपन्यास का कालानुक्रम खंडित है, इसका रूप अभिव्यंजक है और यह तमाम रीतियों और जेनरिक नकूश का उपयोग करता है। इस उपन्यास में कलाकार-नायिका की दो कविताएँ हैं और इसके अलावा अनेक साहित्यिक संकेतों और अनुगूँजों का स्वाद है।

मनु मनीषा की चटकदार संस्करण है और एक ऐसे शून्य में स्थित है जहाँ सामाजिक रिश्तों की गुंजाइश बेहद कम है। भले ही उसके पास एक पति और दो बेटियाँ हैं, पर वे पारिवारिकता का भाव रचने के बजाय उपन्यास के कथानक की महज एक मददगार आवश्यकता नज़र आते हैं। प्रेमी से प्रेम और परिवार के प्रति कर्तव्य का निवेदन मनु कुछ इस तरह से करती है कि किसी विश्वसनीय स्त्री के बजाय किशोर-कल्पना से निर्मित एक अवधारणा प्रतीत होती है।

मनु और रिचर्ड के बीच सामाजिक, राजनीतिक और दार्शनिक मुद्दे रूमानी संवादों की शैली में आते हैं, और उच्चस्तरीय प्रभाव पैदा करने के लिए बड़े-बड़े विचारकों के नाम उनकी ज़ुबान पर फुदकते रहते हैं। मनु के लिए 'स्व' ही सर्वस्व है। वैचारिक रूप से वह ग़रीबों की मदद करना चाहती है, पर वे ग़रीब लोग एक भीड़ हैं और उस समाज का हिस्सा हैं जो जीना दूभर कर देता है। समाज, सामाजिक प्राणियों और संबंधों के विरुद्ध मनु की कटूक्तियाँ और भारी-भरकम वाकपटुता उसकी स्वपरकता का ही परिणाम हैं। उपन्यास का एक दृश्य, जिसमें मनु अपने पति के रिश्तेदारों के लिए खाना बनाती है, इस दृष्टि से काफी शिक्षाप्रद है। उनके स्वादों के हिसाब से खाना बनाना इतना कष्टप्रद है कि दृश्यावली में अचानक काफ्का के 'ग्रेगर साम्सा' (The Metamorphosis का पात्र) की अवतारणा होती है। काश वह ग्रेगर की तरह कीड़ा बन जाए! यह कल्पना कई पृष्ठों तक चलती है और इस बात का भली-भाँति आभास दे जाती है कि यह काफ्का का अनुपयुक्त उपयोग है। ग्रेगर साम्सा का अलगाव और अमानवीकरण उसके इस गहरे अहसास से उपजा था कि वह केवल एक बेनाम पुर्जा (Function) है। इसके बरक्स, मनु अपने पति द्वारा उपेक्षित नहीं है और एक अच्छी माँ होना भी उसे बुरा नहीं लगता है। इसलिए ग्रेगर और काफ्का का इस तरह दृश्य में घुसना मौजूँ नहीं है; सिवाय यह असर पैदा करने के, कि लो भई, काफ्का के कल्पनालोक में प्रवेश करने की योग्यता रखने वाली इस महिला पर भी खाना बनाने की सामाजिक-पारिवारिक बंदिश है!' इस लिहाज से यह दृश्य पास्तीश के खाली शोर से भरा हुआ है।

'चित्तकोबरा' में एक संभोग का दृश्य भी है, जिसमें नायिका की गुब्बारे जैसी बढ़ती काम-कल्पना उसे एक विशालकाय उरोज में बदल देती है। यह दृश्य सनसनीखेज तो है ही, नैतिक और साहित्यिक कारणों से पास्तीश भी है। इस दृश्यालेख्य को बहुविधि पढ़ने के बाद भी यह ज़ाहिर नहीं होता है कि प्रेम-विहीन सेक्स के प्रति नायिका की दैहकीयता में कहीं कोई दुःख है। विडंबना यह है कि नायिका मारे आनंद के मरी जा रही है, जबकि उपन्यास के बारे में लेखिका की प्रस्तावना पढ़ें तो ऐसा लगता है कि वे प्रेम-विहीन सेक्स की यांत्रिक-दैहिक स्थिति का चित्रण करना चाहती थीं.. यह दृश्य फिलिप रोथ की 'द ब्रेस्ट' की साहित्यिक पास्तीश है, जिसका मुख्य पात्र डेविड केपेश तुलनात्मक साहित्य का अध्यापक है, गोगोल और काफ्का में खास दिलचस्पी रखता है और मानसिक भ्रम का शिकार होकर खुद को एक उरोज समझ लेता है।

प्रो. जयदेव के अनुसार, 'चित्तकोबरा' का रिचर्ड हचिन्सन कोई जीवंत चरित्र नहीं बल्कि एक पास्तीश है जिस पर चिपकी हैं तमाम और तमाम भूमिकाएँ। वह एक राष्ट्रवादी स्कॉट भी है, फोटोग्राफर भी, शानदार प्रेमी, ड्रामा प्रोड्यूसर, अठारहवीं सदी का बाँका (Dandy), अस्तित्ववादी, मिशनरी और एक दुस्साहसी यात्री भी। वह विविध संकेतों का ऐसा घालमेल है कि एक मनुष्य के रूप में उसकी विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाती है। अलबत्ता वह एक ऐसा 'ओरिएंटलिस्ट' प्रतीत होता है जो यह संदेश देता है कि पूर्व तभी बचा रह सकता है जब उसे पश्चिम की दृष्टि से देखा और संवारा जाए।

'चित्तकोबरा' प्रेम और विवाह की ध्रुवात्मकता को सार्वजनीन बनाता है। रिचर्ड एक शाश्वत प्रेमी  है क्योंकि वह मनु से विवाह नहीं कर सकता है ; उसका विवाह जेनी से हुआ है जिसे वह प्रेम नहीं करता। इसी क्रम में गर्ग 'व्यक्ति' और 'भीड़' की ध्रुवात्मकता भी स्थापित कर देती हैं। निर्मल वर्मा की तरह उनका भी यह प्रयास मिथ्या मान्यताओं पर आधारित है। मनु की 'मदर टेरेसा की शिष्या' बनने की इच्छा उतनी ही आरामदेह कल्पना है जितनी 'एक चिथड़ा सुख' की बिट्टी की इच्छा; अंतर यह है कि जहाँ बिट्टी की यह इच्छा एक संवेदनशील और मोहक लयात्मकता में निबद्ध है, वहीं मनु की इच्छा थकी हुई रूढ़ियोक्तियों  के साँचे में ढली है। गर्ग के उपन्यासों में सामाजिक वक्तृता बड़ी ध्वन्यात्मक है, जो न तो उनके चरित्रों की संस्कृति से मेल खाती है और न ही उसमें कोई अंदरूनी निष्ठा है। एक उपन्यासकार के सामाजिक सरोकार केवल इस कारण स्थापित नहीं हो जाते कि उसने अपने कथा-भवन पर कुछ सामाजिक पोस्टर लगा रखे हैं। मनीषा, मनु और माधवी जैसे चरित्र अस्तित्ववादी स्वायत्तता और वैयक्तिकता को अतार्किक तथा श्रद्धा-मूलक बनाते हुए अपनी एक समाजेतर परिभाषा रचते हैं। एक नारीवादी लेखिका में यह सोच दुर्भाग्यपूर्ण ही कही जा सकती है। कोई भी जिम्मेदार स्त्री-विमर्शकार ऐसी किसी भी स्थिति के प्रति सतर्क रहना चाहेगी जहाँ किसी स्त्री विशेष की अद्वितीयता स्थापित करने के लिए उसे समाज और यथार्थ से काटकर एक कृत्रिम दूरी पर खड़ा किया जाए।

पाश्चात्य संस्कृति के पारेषण के संदर्भ में लिखते हुए कॉनराड लोरेन्ज अपनी पुस्तक 'ऑन अग्रेशन' में कहते हैं कि किशारों अपचारियों के अतिवादी उत्साह और उनकी सांस्कृतिक अभावग्रस्तता में एक सीधा संबंध होता है, जो उनके जीवन में असीम ऊब पैदा करता है। गर्ग के चरित्र यद्यपि तरुणाई के पार हैं, लेकिन उनका उत्साह उपर्युक्त किशोरों की तरह असीम आत्मिक ऊब से पैदा हुआ लगता है। सांस्कृतिक अपमिश्रण के विरुद्ध हमें सचेत करते हुए लोरेन्ज दिखाते हैं कि सांस्कृतिक संरचनाएँ जनजीवन के विशिष्ट परिवेश में सन्निविष्ट होती हैं; और जहाँ दो संस्कृतियों का मेल होता है, वहाँ अक्सर लोग दूसरी संस्कृति की सतही साज-सज्जा की नकल करते हैं। अगला अध्याय एक ऐसे ही लेखक (कृष्ण बलदेव वैद) की रचनाओं के बारे में है, जो पूर्ण आत्म-चेतना के साथ पश्चिम को दुहराते हैं। वे उसे बड़े पैमाने पर किंतु बेहद उथले ढंग से ही दुहरा पाते हैं; क्योंकि पश्चिम के अधिक मूल्यवान और गंभीर प्रतिमानों की नकल करना अपेक्षाकृत कठिन काम है। वैद निश्चित रूप से मृदुला गर्ग से कहीं अधिक प्रतिभाशाली हैं, लेकिन उनकी रचनात्मक ऊर्जा पास्तीश के चक्रव्यूह में पड़कर अंततोगत्वा निष्प्रभावी ही साबित होती है।... 


लेखक
हरी चरन प्रकाश  

                                                           



#पाठकगण इस लेख का तीसरा भाग अगले ब्लॉग में पढ़ सकते हैं । 

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