पास्तीश की संस्कृति के चार अध्याय:हरी चरन प्रकाश

 


अध्याय-1

इण्डियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडी, शिमला द्वारा 1993 में प्रकाशित प्रो. जयदेव के विनिबंध 'द कल्चर ऑफ़ पास्तीश: एक्जिस्टेंशियल एस्थेटिसिज्म इन द कन्टेम्परेरी हिंदी नावेल' में पास्तीश, उच्च आधुनिकतावाद और अस्तित्ववाद के अधिरूढ़ प्रभाव में लिखे गए हिंदी उपन्यासों का आलोचनात्मक विश्लेषण किया गया है। इसके लिए प्रो. जयदेव ने चार प्रमुख उपन्यासकारों–निर्मल वर्मा, मृदुला गर्ग, कृष्ण बलदेव वैद और मोहन राकेश के प्रतिनिधि उपन्यासों का चयन किया है। इन उपन्यासों में पाश्चात्य सांस्कृतिक संकेतों (Cultural Codes) की प्रचुर मौजूदगी के बावजूद उन्होंने प्रत्येक लेखक को अलग-अलग श्रेणियों में रखा है। अध्यायों के शीर्षनाम के अनुसार, जहाँ निर्मल वर्मा पास्तीश के सुंदर और कलात्मक आस-पड़ोस में दिखाई देते हैं, वहीं मृदुला गर्ग के यहाँ पास्तीश का छद्म और दिखावा है; कृष्ण बलदेव वैद में पास्तीश का असह्य ऊबाऊपन है, तो मोहन राकेश के यहाँ पाश्चात्य प्रभावों का विवेकशील और आलोचनात्मक उपयोग दिखाई देता है। चूँकि पास्तीश पूरी तरह से एक पश्चिमी साहित्यिक अवधारणा है, इसलिए स्वाभाविक रूप से इस निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए प्रो. जयदेव ने पश्चिमी आलोचनाशास्त्र के प्रतिमानों का ही उपयोग किया है। इसके बावजूद, वे पश्चिमी आलोचनाशास्त्र की शर्तों और परिभाषाओं के उपयोग में सतर्कता बरतने की सलाह देते हैं।

यह निश्चित है कि 1993 में लिखी गई यह पुस्तक हिंदी के अकादमिक क्षेत्र के संज्ञान में अवश्य आई होगी, अतः आज इसके बारे में कुछ लिखना केवल एक पुनर्परिचय ही होगा। परंतु यह एक  परमावश्यक पुनर्परिचय है; खास तौर से इस समय जबकि पश्चिमी साहित्य की प्रबल धारा इंटरनेट पर बुलबुलों की शक्ल में पूरी तरह सुलभ है और उससे प्रभावित लेखन हिंदी साहित्य की जनवादी परंपरा पर आघात कर रहा है। यहाँ यह स्वीकार करना आवश्यक है कि यह पुस्तक पिछले वर्ष ही मेरी जानकारी में आई और इसके लिए मैं जे.एन.यू. के प्रोफेसर सत्यपाल गौतम, जो मूलतः दर्शनशास्त्र के विद्वान हैं, का आभारी हूँ।

चूँकि 'पास्तीश' अपने आप में एक जटिल व्याख्यापरक शब्द है, इसलिए इसका शब्दकोशीय अर्थ—'दूसरे या दूसरों की शैली में किया गया कलाकर्म'—न केवल अपर्याप्त है, बल्कि भ्रामक रूप से सरल भी है। प्रो. जयदेव के मंतव्य को समझने के लिए पुस्तक की उस भूमिका में प्रवेश करना पड़ेगा, जो पास्तीश के इस तिलस्म की कुंजी है। भूमिका का आरंभ वे मार्गरेट एटवुड की कृति 'सरफेसिंग' के निम्न उद्धरण से करते हैं:

"ताकत मेरी आँखों में बह आई थी, मैं उसके भीतर तक देख सकती थी। वह एक छद्मवेशी था, एक पास्तीश! राजनीतिक इश्तहारों की परतें और पत्रिकाओं के पृष्ठ उसके ऊपर चिपके हुए थे और अब उखड़ रहे थे। उसकी मूल सतह पर चिथड़े और चिप्पड़ बिखरे हुए थे... वह नहीं जानता था कि किस भाषा का प्रयोग करे, वह अपनी भाषा भूल चुका था, उसे नकल करनी थी। सेकंड हैंड अमरीकीपन किसी शैवाल या खारिश की तरह उसके ऊपर चकत्ता- चकत्ता फैल रहा था। उसमें कीड़े पड़ गए थे, वह विकृत हो चुका था और मैं उसकी कोई मदद नहीं कर सकती थी। उसे ठीक करने में, उसे सामने लाने में और छील-छालकर उसकी सत्यता तक पहुँचने में बहुत समय लगेगा।"

उपर्युक्त उद्गार 'सरफेसिंग' की कनाडावासी नायिका के हैं, जो 'डेविड' नाम के व्यक्ति के बारे में हैं। डेविड अमरीका से लौटा हुआ एक प्रौढ़ शिक्षा अनुदेशक है, जो लगातार कामसंकेत फेंकता रहता है। डेविड उससे प्रेम नहीं करता। डेविड की पत्नी ने नायिका के प्रेमी को फँसा लिया है और बदले में वह नायिका को फँसाना चाहता है। विवाह की उसकी अवधारणा में प्रेम, मैत्री और विश्वास का कोई स्थान नहीं है। उसका मानस शीतयुद्धक वाग्मिता से आक्रांत है, इसलिए उसके लिए यदि कोई चीज़ मायने रखती है, तो वह है विवाह का शक्ति-संतुलन।

पास्तीश का प्रयोग उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में अंग्रेजी साहित्य में आया। प्रारंभ में इसे उतना ही सम्मान मिला, जितना किसी बाजीगरी या ट्रिक को मिल सकता है। हालाँकि, एक स्तर पर इसके चातुर्यपूर्ण प्रमाद को मनोरंजक माना जाता था। यह एक प्रकार का शैलीगत अभ्यास था, जिसके तहत जानबूझकर पूर्ववर्ती लेखकों की लेखन शैली की नकल की जाती थी। आधुनिकतावाद के दौर में पास्तीश को कुछ सम्मान मिलने लगा और वह एक ऐसी साहित्यिक युक्ति के रूप में प्रयुक्त होने लगी, जिसके कई उपयोग थे। यह पूर्ववर्ती महान लेखकों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने की एक युक्ति थी, तो कभी एक अपरिहार्य प्रभाव से जूझने का तरीका भी। कभी-कभी यह एक अंतर-पाठीय (Inter-textual) संकेत भी होती थी, इस आशा के साथ कि मूल आलेख की स्मृति के आलोक में पाठक सराबोर हो सके। इन सबके अलावा, यह 'विमुखता' के प्रभावों को रचने की एक शैलीगत युक्ति भी हो सकती थी।

 प्रूस्त ने 'पास्तीश ए मेलान्ज' में सां. बव और लोवर की करीबी नकल इसीलिए की थी ताकि वे पूर्ववर्ती महान लेखकों के प्रभावों से मुक्त हो सकें। उनका मानना था कि यदि वे यह उपचार नहीं करेंगे, तो जीवन भर अनजाने में दूसरों की ही नकल करते रहेंगे। 'यूलिसिस' के 'ऑक्सेन ऑफ द सन' अध्याय में जेम्स जॉयस ने एक बच्चे के जन्म को जिन शैलियों में वर्णित किया है, वे शैलियाँ अंग्रेजी भाषा के विकास के महत्त्वपूर्ण चरणों को दर्शाती हैं। यहाँ बच्चे का जन्म महत्त्वपूर्ण नहीं है, बल्कि महत्त्वपूर्ण है लेखक की वह इच्छा, जिसके तहत वह न केवल अंग्रेजी साहित्य की अभिवृद्धि कर रहा है, बल्कि उसमें जो कुछ भी श्रेष्ठ है, उसे घेरकर सुरक्षित कर रहा है।

यहाँ ध्यान देना योग्य है कि पास्तीश का अर्थ 'पैरोडी' (Parody) नहीं है। जहाँ पैरोडी का उद्देश्य मूल पाठ की सत्ता को अपदस्थ करना होता है और इस हेतु उसमें असल का उपहास और अवमूल्यन किया जाता है, वहीं पास्तीश का उद्देश्य किसी तरह का तख्तापलट करना नहीं है। पास्तीश यह नहीं मानती कि कला में पूर्ण मौलिकता संभव है। वह यह भी नहीं मानती कि यथार्थ को सीधे-सीधे छुआ जा सकता है। पास्तीश की मान्यता है कि हर पाठ और लेखक का अपनी पूर्ववर्ती रचना और लेखक से रिश्ता होता ही है, और हर नई रचना पुरानी रचना का कौशलपूर्ण पुनर्संघटन है। पास्तीश मूलतः आत्मवाचक है। इसमें ऐसे संकेत-चिह्न (Codes) होते हैं, जिनके कारण एक पास्तीश रचना का तात्कालिक संदर्भ अन्य संदर्भों से जुड़कर उन्हें एक नया पुनर्संदर्भ प्रदान करता है। इसी कारण पास्तीश में शैली और प्रस्तुतीकरण का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थान हो है।

पास्तीश के चिन्हों पर कुछ ज्यादा कुछ कम की तर्ज़ पर साहित्यशास्त्रियों में पर जो सहमति है, उसके अनुसार प्रथमतः यह माना गया है कि पास्तीश मौलिकता का दावा नहीं करती और पूर्ववर्ती कला तथा सांस्कृतिक सामग्री का खुला उपयोग करती है। यह अपने पूर्ववर्ती संसार से जो भी सामग्री प्राप्त करती है, उसे संश्लेषित नहीं करती, बल्कि उनका घालमेल और प्रस्तितीकरण चाहती है। चूँकि यह प्राप्त संकेत-चिह्नों को बदलती नहीं बल्कि केवल प्रदर्शित करती है, इसलिए यह कल्पना से अधिक मन की तरंग  के नजदीक है। पास्तीश अक्सर मन, वाणी और कर्म के बीच एक तीव्र विभाजन का अहसास पैदा करती है; क्योंकि जहाँ वैयक्तिक संकेत-चिह्न अपने आप में भले कुछ मायने रखते हों, किंतु जब उन्हें साथ निभाया जाता है, तो वे कोई सार्थक या संयोजित संदेश नहीं दे पाते। यह मानना अनुपयुक्त न होगा कि संकेत-चिह्नों के बेमेल और अनियमित उपयोग के द्वारा पास्तीश लोगों का ध्यान आकर्षित करना चाहती है। सामान्यतः पास्तीश एक सचेतन गतिविधि है, परंतु कभी-कभी इसकी अचेतन सक्रियता भी देखने को मिलती है। पास्तीश गहराई में जाने के बजाय लोगों को सतही प्रभाव से आनंदित करती है। पास्तीश के समर्थक मौलिकता की अवधारणा को ही खारिज करते हैं। उनके अनुसार मौलिकता एक भ्रम है, समस्त लेखन वास्तव में पुनर्लेखन है और सारे पाठ अंतर्पाठ हैं। उनकी दृष्टि में पास्तीश एक कला है क्योंकि वह किसी बाहरी दुनिया का संधान नहीं करती, बल्कि अपनी ही भाषा को संदर्भित करती है, जिसमें समस्त पूर्ववर्ती कला और उसके संकेत समाहित हैं। अतीत के इन संकेतों का उपयोग सांस्कृतिक इतिहास में रुचि जाग्रत करता है।

पास्तीश के विरोधी इसके अराजक और स्वतन्त्रताकामी आवेगों को रेखांकित करते हैं। उनका कहना है कि प्रभावोत्पादकता के लिए पास्तीश सांस्कृतिक संकेत-चिन्हों(Cultural Codes) को उन ऐतिहासिक और मानवीय संदर्भों से च्युत कर देती है, जो उन संकेतों को सार्थकता प्रदान करते हैं। गहराई और सार के बजाय पास्तीश सांस्कृतिक संकेत-चिन्हों को चमकीले विवरणों वाली सतही और उथली पहचान देती है। मनुष्य के लिए संस्कृति एक फैशनेबल उत्पाद हो जाती है, जिसे खरीदकर वह  पूँजी के शासन को बढ़ावा देता है। मनुष्य एक ऐसा उपभोक्ता बन जाता है जो अवधारणाओं, प्रवृत्तियों यहाँ तक कि विचारों को भी खरीदता है, वह भी अपने लिए नहीं वरन् पूँजी के शासन को बढ़ावा देने के लिए। यदि संसार एक 'वैश्विक ग्राम' (Global Village) हो गया है, तो इसका आशय केवल यह है कि संस्कृति का उद्योग संसार के दूरस्थ इलाकों में भी लूट-खसोट मचा सकता है। पास्तीश इस प्रकार की विभिन्नताओं के स्वर देती है जिनसे अतीत में गंभीर रुचि जाग्रत ही नहीं हो सकती। इतिहास का उपयोग कुछ इस तरह से होता है कि उसके संकेत-चिह्नों की जीवंतता समाप्त हो जाती है और अतीत केवल कुछ उक्तियों में बदल जाता है।

जीवन-स्थितियों में पास्तीश के पक्षधर नगण्य हैं, हालाँकि इसकी व्याप्ति का चित्रण कुछ उपन्यासकारों ने किया है। सॉल बेलो की कृति 'मि. सैमलर्स प्लैनेट' में ऐसे ही पास्तीश व्यक्तित्व को खारिज किया गया है, जो एक अद्वितीय 'स्व' की रचना के चक्कर में दिखावटी और नकलची हो जाता है। कर्ट वोनेगुट ने 'मदर नाइट' की भूमिका में लिखा है कि—"हम वही हैं जो हम होने का दिखावा करते हैं, इसलिए हमें इस बात के लिए सतर्क रहना चाहिए कि हम क्या दिखावा कर रहे हैं।" इस स्याह सुभाषित से पास्तीश की जीवनलीला के तर्क समझ में आ जाते हैं।

प्रो. जयदेव के अनुसार समस्या तब पैदा होती है जब किसी एक व्यक्ति का अनोखा किंतु दिलचस्प आचरण एक सामाजिक दृग्विषय में बदल जाता है, जिससे खरीद-फरोख्त की एक ऐसी संस्कृति का जन्म होता है जिसमें केवल सतही मुद्राभिनय होता है और कोई आधारभूत सच्चाई नहीं होती। कालान्तर में इस तरह से उत्पन्न हुआ सांस्कृतिक उद्योग जनता की रुचियों का निर्धारण करने लगता है। अस्तित्ववाद की धारणा से ग्रस्त होकर कैसे कोई व्यक्ति पास्तीश का आचरण करने लगता है, इसका उदाहरण प्रो. जयदेव ने डेविड स्टोरी के उपन्यास 'पासमोर' के नायक कोलिन पासमोर के उल्लेख से दर्शित किया है, जो एक सुखमय वैवाहिक जीवन के बावजूद 'अस्तित्ववादी ढंग' से समसामयिक दिखने के चक्कर में अपना परिवार तोड़ देता है।

जीवन में पास्तीश का व्यवहार आम तौर पर मूर्खतापूर्ण और अनावश्यक होता है, परंतु इस संभावना को हल्के में नहीं लिया जा सकता कि विचारशील भाषा के बजाय चटकीले उद्धरणों के द्वारा ऐसे व्यवहार को एक सर्वदेशीय संस्कृति के रूप में प्रस्तुत करने की चेष्टा की जाए। खास तौर पर तीसरी दुनिया के साहित्य के लिए यह गहरी चिंता का विषय होना चाहिए, जहाँ इस फैशनेबल संस्कृति के पनपने की बुनियादी शर्तें तो नदारद हैं, लेकिन इसकी आँख मूँदकर अगवानी केवल इसलिए होती है क्योंकि अस्तित्ववाद और उच्च आधुनिकतावाद इसके स्वागत की शहनाई बजाते हैं।

प्रो. जयदेव ने लेखक-त्रयी–निर्मल वर्मा, मृदुला गर्ग और कृष्ण बलदेव वैद के संबंध में खुद ही यह सवाल उठाने में सावधानी बरती है कि किस तरह से और क्यों ये लोग पासमोर और सरफेसिंग के लेखकों से भिन्न हैं। वस्तुतः अपने पूरे आलेख में प्रो. जयदेव ने नकल का कोई सरल या सीधा दोषारोपण नहीं किया है। उन्होंने मुख्य रूप से पाश्चात्य सांस्कृतिक और साहित्यिक प्रभावों के अवांछित उपभोग की शिकायत की है। ऐसा करते समय उन्होंने यह स्पष्ट करना ज़रूरी समझा कि उनकी पुस्तक भारतीय और पश्चिमी संस्कृति के बीच सम्मानजनक संवाद के विरुद्ध नहीं है; वह केवल पश्चिमी संदेशों और प्रवृत्तियों के नासमझ और भ्रामक विज्ञापन के विरुद्ध है। प्रो. जयदेव के अनुसार, हमारी उक्त लेखक-त्रयी इसलिए पासमोर और सरफेसिंग के लेखकों से भिन्न है क्योंकि यहाँ सहायक जीवन-स्थितियाँ न होने के बावजूद वे पास्तीश की संस्कृति में चंचल व्यवहार करते हुए दिखाई देते हैं। उनमें एक कृत्रिम पश्चिमी पहचान की ललक दिखाई देती है। पश्चिम में पास्तीश का उपयोग करने वाला कलाकार कभी यह छिपाने का प्रयास नहीं करता कि वह ऐसा क्यों कर रहा है। जहाँ पश्चिमी पास्तीशकार अपनी उपभोगी मानसिकता के बावजूद अतीत और इतिहास दोनों को आहूत करते हैं, वहीं भारतीय पास्तीशकार के लिए भारतीय इतिहास और साहित्यिक परंपरा निरुपयोगी है। पश्चिम का लेखक खूब सचेत होकर और खुले ख़जाने की तरह पास्तीश का उपयोग करता है, इसलिए उसमें कोई बड़बोलापन नहीं है; लेकिन भारतीय पास्तीशकार तमाम पर्दों का इस्तेमाल करता है और चाहता है कि उसे महान समझा जाए। एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि उत्तर-आधुनिकता के दौर में जहाँ पश्चिमी पास्तीशकार ने अपने लिए एक 'अभिजात्य-विरोधी' भूमिका बनाई है, वहीं भारतीय पास्तीशकार अभी भी अभिजातवर्गीय है।

प्रो. जयदेव निर्मल वर्मा की लेखन शैली को उनकी सबसे बड़ी ताकत मानते हैं और यह भी स्वीकार करते हैं कि यह ताकत उनकी अपनी है। गहरी संवेदना और परिष्कार के इस साहित्य की कुछ जोड़ि निर्मल वर्मा की तरल प्रगीतात्मक शैली के मेल से बनी है कि उनकी हर रचना उनका व्यक्तिगत हस्ताक्षर हो गयी है। इस विचक्षण साहित्यिक प्रतिभा के बावजूद, अस्तित्ववाद और उच्च आधुनिकतावाद उनके नैतिक संसार को कुछ इस तरह प्रभावित करते हैं कि भारतीय यथार्थ की तुलना में पाश्चात्य संकेत-चिह्न उनकी रचनाओं में विशिष्टतम् स्थान रखते हैं, जिसके कारण वे पास्तीश से ग्रस्त हो जाती हैं।

'एक चिथड़ा सुख' एक 'कुन्स्ट्लररोमन' (Künstlerroman) है, जैसे कि जेम्स जॉयस का 'अ पोर्ट्रेट ऑफ़ द आर्टिस्ट एज़ ए यंग मैन' और प्रूस्त का 'रिमेंबरेंस ऑफ़ थिंग्स पास्ट' है। कुन्स्ट्लररोमन उपन्यास का वह प्रकार है जिसका केंद्रीय चरित्र कोई कलाकार होता है। एक समय जर्मनी में ऐसे उपन्यास काफी लोकप्रिय रहे और इनके विकास में गेटे का बड़ा योगदान था। 'एक चिथड़ा सुख' का कज़िन ऐसा ही एक चरित्र है जो बीते हुए समय को नहीं, सिर्फ उसकी 'याद' को याद करता है। एक उपन्यासकार के रूप में जब वह खुद 'अपना ही गवाह' बनता है, तो उसमें प्रूस्त के 'टाइम रिगेन्ड इन रिमेंबरेंस ऑफ़ थिंग्स पास्ट' की झलक साफ दिखाई देती है। 'एक चिथड़ा सुख' में आर्थर शोपेनहावर के दर्शन के प्रभाव की भी अनदेखी नहीं की जा सकती। जीवन दुःख का भोग है और इस दुःख से मुक्ति उस कला-संसार में जाकर मिलेगी जहाँ व्यक्ति अपने अहं और इच्छाओं को निलंबित रख सके।

टोनी बेनेट ने 'इंटर-टेक्सचुअलिटी' (Intertextuality) और 'इंटर-टेक्सचुअलिज्म' के बीच विभेद की वकालत करके बड़ा उपकार किया है। साहित्यिक अनुकूलन, अनुगूँज और प्रतीकों को यदि कोई रचना आत्मसात कर लेती है, तो वह 'इंटर-टेक्सचुअलिटी' है; परंतु यदि ऐसे सारे विवरण जो पाठ में रचे-पचे नहीं हैं और केवल दिखावे तथा नक्शेबाज़ी के लिए गढ़े जाते हैं, तो उससे 'इंटर-टेक्सचुअलिज्म' की स्थिति पैदा होती है। प्रो. जयदेव ने निर्मल वर्मा के यहाँ इसी अनावश्यक 'इंटर-टेक्सचुअलिज्म' को पाया है और यह भी रेखांकित किया है कि 'एक चिथड़ा सुख' ऑगस्ट स्ट्रिंडबर्ग के विचारों से अत्यधिक ग्रस्त (Obsessed) है। कहानी स्ट्रिंडबर्ग के नाटक के मंचन से शुरू होती है, जिसके रिहर्सल भी होते हैं। 'एक चिथड़ा सुख' में थिएटर ही जीवन को परिभाषित करता है और यह आधुनिकतावादी संदेश देता है कि अच्छा जीवन वही है जो कला की शर्तों के सादृश्य हो। इस सौंदर्यवादी दृष्टिकोण का प्रभाव यह है कि निर्मल वर्मा ने जो चरित्र बनाए हैं वह 'होने' और 'अभिनय करने' के अंतर को धूमिल कर देते हैं।

'एक चिथड़ा सुख' के चरित्रों में सबसे पहले उनका सामाजिक अलगाव दिखाई पड़ता है। इन चरित्रों को किसी पारिवारिक या सामाजिक पहचान की स्वाभाविक आवश्यकता नहीं है। उनका यथार्थबोध नितांत आंतरिक और वैयक्तिक है। वर्मा के चरित्र अपनी आलोचना भी करते हैं, परंतु यह आत्मालोचना उन्हें चीजों को बदलने के लिए कुछ करने की दिशा में अग्रसर नहीं करती, बल्कि एक आत्ममुग्ध प्रस्तुति बनकर रह जाती है। यह आत्म-प्रताड़ना बड़े ही नफ़ीस ढंग से आत्म-विस्तार का माध्यम बन जाती है। 'जायकेदार दुःख' इन चरित्रों को प्रिय और संवेदनशील बना देता है। ये चरित्र अपने जीवन को एक कलाकर्म में तब्दील करना चाहते हैं और इस कारण अपनी प्रवृत्ति में 'बोवारीज़्म' (Bovarysm) के शिकार हो जाते हैं। टी.एस. इलियट ने बोवारीज़्म के सिलसिले में शेक्सपियर के 'ओथेलो' की आखिरी और लम्बी वक्तृता का उल्लेख किया है, जिसमें ओथेलो कुछ इस प्रकार अपनी आत्मघृणा को प्रकाशित करता है कि वह वक्तृता एक शानदार आत्म-विज्ञप्ति हो जाती है। इलियट ने बोवारीज़्म को एक सौंदर्यपरक प्रवृत्ति माना है, नैतिक नहीं। वर्मा के चरित्रों का स्वयं से असंतोष इसी प्रकृति का है। वे समाज से विमुख हैं। यह विमुखता इस या उस सामाजिक-सांस्कृतिक इकाई से नहीं हैजिसे बहाली प्रकार संदर्भित किया जा सके। इसलिए परिवार, समाज और समुदाय जैसी इकाइयों का बस उदासीन उल्लेख है। वस्तुतः वर्मा ने अपने चरित्रों को वास्तविक समाज के उन संदर्भ-बिंदुओं पर अनुपलब्ध कर दिया है जहाँ उन पर सर्वाधिक सामाजिक दबाव रहता है। ये चरित्र पहले वस्तुनिष्ठ यथार्थ का शून्यीकरण करते हैं, फिर उसकी सौंदर्यपरक निर्मिति करते हैं और अंत में उसे अपने सुरक्षित, व्यक्तिवादी आत्मबोध के भीतर पुनर्संदर्भित कर लेते हैं। इस प्रसंग में 'बिट्टी' का सौंदर्यबोध 'एक चिथड़ा सुख' के समस्त चरित्रों का कमोवेश प्रतिनिधित्व करता है। उपन्यास में बिट्टी भिखारियों के चेहरों पर भी 'विराग और निरासक्ति की आभा' देखती है। यह आध्यात्मिक-रूमानी दृष्टि वस्तुनिष्ठता का शन्यीकरण करते हुए मानवीय अभाव और दुःख को शुद्धतः व्यक्तिनिष्ठ बना देती है। बिट्टी के लिए वे तीन भिखारी आघात हैं और मोहक भी। उनकी उपस्थिति में उसे भोजन करने में परेशानी होती है। इसका उपचार यह है कि वह उस यथार्थ से भागे। वह इस यथार्थ को पहले थिएटर से और बाद में वीतरागी संतों की कल्पना द्वारा निरस्त करती है। हीगेल ने भी म्युरिलो के भिखारी बच्चों के चेहरों पर ऐसी ही पवित्र देवदूतीय प्रसन्नता खोजी थी। स्पष्टतया यहाँ निर्मल वर्मा पास्तीश के प्रभाव में हैं। समाज से वैमुख्य के कोई भी सांस्कृतिक मूल्य तभी हो सकते हैं जब यह विमुखता अपने समय की विकृत संस्कृति के विरोध में नज़र आए। इस विरोध में ही मुक्ति है और ऐसी मुक्ति ही उसकी वैधता का आधार होनी चाहिए। एक ऐसी समाज-विमुखता जो अंधप्रेरणा से उपजी हो न कि किसी स्थिति से, गंभीर और आवश्यक सामाजिक मुद्दों को पूरी तरह महत्त्वहीन बना देती है।

वर्मा अपने चरित्रों की संस्कृति में कोई सामाजिक समस्याजनकता इसलिए नहीं पाते क्योंकि उनके चरित्र उनके उपन्यास की विन्यस्ति से पूरी तरह मेल खाते हैं।

उनके चरित्रों के लिए बाहरी संसार प्रसंगहीन है, और उनके अपने सघन व्यक्तिनिष्ठ संसार में जो सामग्री उपलब्ध है, वह वर्मा की स्फटिक रूप-रचना के लिए पर्याप्त है। उनके चरित्रों में द्वंद्व है लेकिन संवाद नहीं है। संवादहीन द्वंद्व में पतनशील आत्मोन्मुखता निहित है। वर्मा के चरित्रों में एक ध्रुवात्मकता भी है। उदाहरण के लिए, नित्ती भाई कुछ गरीब-परवर योजनाओं के साथ प्रकट होते हैं, परंतु उनका अंत एक पद्यात्मक आत्महत्या में होता है। डैरी एक 'अल्ट्रारेडिकल'  के रूप में शुरुआत करते हैं, परंतु अंततः एक 'अल्ट्राअथीष्ट' हो जाते हैं। यह ध्रुवात्मकता उन्हें एक साथ मोहक और निरर्थक बनाती है। यद्यपि 'एक चिथड़ा सुख' पश्चिमी साहित्य के औपचारिक पास्तीश से मिलता-जुलता नहीं है क्योंकि इसमें प्रदर्शन के साथ कोई खिलंदड़ापन नहीं है। दरअसल, उसका पास्तीश पश्चिमी संकेत-चिन्हों की अनावश्यक स्थापना से पैदा हुआ है, वह भी पश्चिम की ही सांस्कृतिक शर्तों के साथ। इस उपन्यास का रूप, दृश्यबंध, शैली और बुनावट सब कुछ ऊँचे दर्जे की कलात्मक प्रतिभा को दर्शाते हैं और यह शैली और बुनावट निर्मल वर्मा की अपनी है। यहाँ यह भी कहना होगा कि पास्तीश निर्मल वर्मा के रचना-संसार की संपूर्ण हकीकत नहीं है, लेकिन एक विदेशी परंपरा की स्थापना जिस तरह भारतीय यथार्थ की अवहेलना करते हुए की गई है, उसकी वजह से उनका कला-संसार पास्तीश का पड़ोसी हो जाता है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि वर्मा जैसे समर्थ कलाकार की रचना में आकर पास्तीश भारतीय साहित्य में वैधता प्राप्त करने की वह दावेदारी कर सकता है, जिसका वह हकदार नहीं है। उसकी अवज्ञा करना इसलिए कठिन हो जाता है क्योंकि वह अत्यंत सघन काव्यात्मकता की गद्य-तरंगों पर बिछलता हुआ आता है और आश्चर्यविजड़ित कर देता है। .....#                                                      

लेखक
हरी चरन प्रकाश  

                                                           






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