बिल्कुल। जिसे आप recover नहीं कर रहे, बल्कि आप जिसका पुनर्सृजन कर रहे हैं। आप एक सृजन के बाद दूसरा सृजन करते हैं, फिर तीसरा। क्यों? क्यो...
बिल्कुल।
जिसे आप recover नहीं कर रहे, बल्कि आप जिसका पुनर्सृजन कर रहे हैं। आप एक सृजन के बाद दूसरा सृजन करते हैं, फिर तीसरा। क्यों? क्योंकि अब एक ऐसा शरीर प्राप्त है उन अभावों को, जिसे लगातार बनाना पड़ता है। जैसे हमारे पुराने मकान होते थे, कच्चे मकान। तो कच्चे मकानों को बार-बार बनाना पड़ता था। लेकिन आप अगर पुराने, जिनको अंग्रेजों ने बहुत ही बेहूदा ढंग से vernacular architecture कहा था, जो हमारी अपनी वास्तुकला है, उसमें खास तौर पर मैंने कुछ आदिवासी मकान ऐसे देखे हैं जिनको वो लगातार बनाते हैं। तो अभावों के साथ रहने के लिए एक लेखक को, एक व्यक्ति को, हमेशा उसको बार-बार बनाना पड़ता है। एक के बाद दूसरी कविता में वो चीज़ आती जाती है । फिर आप नए-नए तरह के ढंग खोजते हैं और इसी के आसपास आपकी जिंदगी सक्रिय रहती है।
अब सीधे-सीधे तो ये आपके उस बात से नहीं जुड़ेगी, लेकिन आपने जो कहा उससे मेरे मन में एक चीज आ रही है। मैं उसका जिक्र कर लेता हूँ। एक तो वो अभाव है जो कहीं न कहीं वास्तविक जीवन में हर व्यक्ति के साथ अलग-अलग रूपों में होता है।
जी, बिल्कुल।
लेकिन एक दूसरे अभाव की आपने बात की जो ज्यादा विराट और व्यापक है और इन दोनों को हम कहीं न कहीं एक-दूसरे के साथ जोड़कर, देख सकते हैं। तो मेरे मन में ये आ रहा था कि अगर हम बहुत सारे अपने पुराने कवियों को देखें या भक्त कवियों को देखें, तो उनके जीवन में श्रृंगार शायद नहीं रहा होगा, यानी उनके जीवन में श्रृंगार का अभाव है, लेकिन उनकी रचनात्मकता श्रृंगार से भरी हुई है।
बिल्कुल, बिल्कुल। ये बिल्कुल ठीक बात है। इसका कारण है। इसका एक बड़ा कारण है। इसमें भी अभाव से बात आएगी। मैं बताता हूँ कैसे। हमें ये जो अभाव है हमारे अंदर प्रकृति से जुड़ाव का, इसको भी बार-बार जोड़ना पड़ता है प्रकृति से। और श्रृंगार एक ऐसा रस है, उसको रसराज भी इसीलिए कहते हैं कि श्रृंगार-रस की जो अनुभूति है और रसास्वादन की प्रक्रिया है , वो यही है कि जब मैं एक कलाकृति पढ़ता हूँ तो मेरे मन का जो वैयक्तिक भाव है, मेरे अंदर जो भाव है, जो सूक्ष्म रूप में भी हो सकते हैं वो बहुत व्यापक रूप में आप महसूस कर सकते हैं । ये भाव सब में हैं, ये ऐसे भाव नहीं हैं जो किसी में हैं, किसी में नहीं हैं, जो रति का भाव है, वो सब में है,पशु-पक्षियों में भी है, पेड़-पौधों में भी है, सभी में है। तो श्रृंगार रस के वक्त क्या होता है? अनुभूति के वक्त ?जब आप श्रृंगार रस का अनुभव कर रहे होते हैं, तब चूँकि आप अपने रति के भाव को रति मात्र की तरह अनुभव करते हैं, इसलिए उस रति मात्र में सारे जीव-जंतुओं के रति के भाव का आपको अनुभव होना शुरू हो जाता है। उससे आपका जुड़ाव पैदा होता है। इसीलिए श्रृंगार का जो अनुभव है, उस अनुभव के दौरान, रसास्वादन के दौरान मनुष्य और प्रकृति के बीच में एक निरंतरता स्थापित हो जाती है। और उस निरंतरता के दौरान जो अभाव आप अपने साथ लेकर आए थे, वो कुछ क्षणों के लिए अभाव के रूप में आलोकित भी होता है और दूर भी हो जाता है । क्योंकि ये वो क्षण है जब, जैसे बिजली चमकी हो दो बादलों के बीच, मानवीय मनुष्य के अस्तित्व, पाठक या कवि के अस्तित्व और अस्तित्व मात्र के बीच में एक बिजली की तरह एक निरंतरता स्थापित हो जाती है। जिसको कबीर ने कहा कि हम हैं सब माँ, सब हैं हम माँ ,उस क्षण आप अपने भीतर समूची प्रकृति का अनुभव कर सकते हैं, कर पाते हैं। और इससे, प्रकृति के लिए आपका जो अभाव है, उसको आप एक क्षण के लिए overcome कर लेते हैं। उसके पार निकल जाते हैं। इसलिए आप ये जो श्रृंगार की बात कह रहे हैं, ये नहीं कि वो दूर का प्रश्न है, वो यही प्रश्न है। वो यहीं से आया है। इसी अभाव से ही पैदा हुआ है। सिर्फ़ ये है कि उसका स्वरूप अलग है। लेकिन है वो यही।
तो उसके लिए उस तरह के कथित यथार्थवादी आलंबन की जरूरत नहीं है।
जरूरत ही नहीं है। बिल्कुल जरूरत नहीं है। सूरदास कह रहे हैं कि भाई, “निरख पिय प्यारी अंग-अंग बिरह सोभा।” तो इसमें जो श्रृंगार की बात पैदा हो रही है, उसे सूरदास प्रकृति से जोड़ रहे हैं। उस वक्त वो link पैदा हो रहा है और वो आपको भी संभवतः जोड़ रहे हैं , यही कविता करती है।
कविता पर थोड़ी और बात करेंगे, लेकिन अब बात जहाँ तक पहुँची है, उसमें मुझे लग रहा है कि ‘कयास’ उपन्यास की चर्चा करनी चाहिए। ‘कयास’ के उपन्यास के केंद्र में भी एक अभाव है।
जी।
उसका जो protagonist है, उसकी मृत्यु है और उस मृत्यु का जो अभाव है, वो अभाव ही एक खास तरह की रचनात्मकता को, रचनात्मक कल्पनाशीलता को, उससे जुड़े हुए लोगों के अंदर इस तरह की एक कल्पनाशीलता को पैदा करता है जहाँ हर व्यक्ति अपने ढंग से उसको रच रहा है।
जी, बिल्कुल।
अपने ढंग से उसको आयत कर रहा है कि ये, ये है। तो इसके बारे में आप थोड़ा बताना चाहेंगे ।
इसका बड़ा दिलचस्प किस्सा ये है कि मुझे Switzerland में एक छोटा-सा गाँव है, Levini। वहाँ तीन महीने रहने की fellowship मिली और मैंने ऐसे ही तुफैल में ये लिख दिया कि मैं वहाँ आकर उपन्यास लिखने की कोशिश करूँगा। और फिर आगे ये लिख दिया कि अगर William Faulkner छह हफ्ते में उपन्यास पूरा कर सकते थे तो मैं इन नौ हफ्तों में आधा तो लिख ही लूँगा। ऐसा कुछ करके मैंने लिख दिया और मैं चला गया वहाँ।
अब मैं जब जहाज में बैठा हुआ था और London जा रहा था – मैं भोपाल से गया London, फिर London से Geneva। फिर वहाँ से बस में बैठकर वो गाँव गया। इस दौरान मेरे मन में उपन्यास का जो स्वरूप निकलकर आया, वो कुछ hazy-सा था। दूसरी एक बात और मैं जोड़ दूँ कि उपन्यास लेखन को मैं अपने जीवन में बहुत बड़ी बात मानता रहा हूँ। क्योंकि मैं जितनी कविताएँ भारत की, अनेक ,दुनिया भर की पढ़ता रहा हूँ , मैंने उससे कम उपन्यास नहीं पढ़े हैं । यात्राएँ मैंने बहुत कीं, तो पूरे वक्त कुछ न कुछ पढ़ता ही रहता था। मैंने हिन्दी के और दुनिया के बहुत अच्छे उपन्यास पढ़े। मेरे लिए एक ऐसा उपन्यास लिखना, जिसका संयोजन निराला हो, ये बहुत बड़ी बात थी। और क्योंकि मैंने उपन्यास दुनिया भर के पढ़ रखे थे, इसलिए मुझे पता था कि मुझे क्या नहीं करना है। तो ये एक उपन्यास वहाँ लिखते-लिखते लिखा मैंने । Switzerland था, ठंडा प्रदेश है । जिस दिन पहुँचा, मैंने अपना bag अपने कमरे में रखा। वहाँ क्या होता था, छह लेखक होते थे, एक साथ रहते थे। अलग-अलग लेखकों के नाम पर कमरे थे। मुझे जिस कमरे में उन्होंने जगह दी थी, वो Faulkner के ही नाम से था।
अरे वाह!
जी । क्योंकि मैंने उन्हीं का उदाहरण लिया था तो मैं उसमें जाते ही, इस उपन्यास का पहला अध्याय बना बैठा ।इस उस अध्याय को ही लिखते-लिखते उपन्यास का बाकी जो स्वरूप बनेगा, उसकी धुंध थोड़ी -थोड़ी मेरे सामने से हट गई । मैं वहाँ ढाई महीने रहा उसी में उसका एक स्वरूप-सा बन गया। लेकिन यह बात जो आप कह रहे हैं कि उसमें एक आदमी नहीं है और वहाँ एक मृत्यु के संदर्भ में लोग अपने को उद्घाटित कर रहे हैं, यह बात उसमें धीरे-धीरे आना शुरू हो गई। फिर उसके बाद कई सालों मैं लिखता रहा। फिर मैं बहुत बीमार पड़ा। renal failure हो गया। दोनों किडनियाँ fail हो गईं। मैं एक naturopathy के संस्थान में, केरल में, त्रिशूर गया। उस अस्पताल में एक महीने रहने का सौभाग्य मिला । छोटा-सा अस्पताल था, गांधी जी के नाम पर बापू naturopathy संस्थान। उसमें एक छोटी-सी कुर्सी थी और एक table थी। उस पर बैठकर मैं उपन्यास के chapter, जो अध्याय हैं, उन पर काम करता रहता था और डेढ़ महीने में मैंने उसका एक स्वरूप बना लिया । फिर मैं काम करता रहा। लेकिन यह उपन्यास लिखते-लिखते लिखा गया है। जब मैंने पहला अध्याय लिखा तब उसमें मुझे पता चला कि इसमें जो चरित्र है, वो जा चुका है। और उसके बाद फिर दूसरा अध्याय, क्योंकि उसमें कुछ और चरित्र उस अध्याय में आए। एक मृतक व्यक्ति तो आया ही आया। फिर उसमें कुछ और चरित्र थे। उनको जब लिखा तो कुछ और आ गए। वो उपन्यास धीरे-धीरे फैलता गया। जो विकसित संस्कृति का वास्तविक अर्थ है, वो यही है – उसका फैलना, न कि वैसा अर्थ जैसे हम लोगों ने लगा रखा है। तो वो फैला, इस तरह कि एक अध्याय में जो चरित्र आए, फिर हम दूसरे अध्याय में उसका पीछा करने लगे। फिर तीसरे में कुछ नए, उसका पीछा, और इस तरह से उसका एक स्वरूप बना । लेकिन यह बात सच है कि उसको भी एक तरह से केंद्र कहना तो ठीक नहीं है, लेकिन उसमें धुंध की तरह एक व्यक्ति का अभाव फैला हुआ है और उसके उस फैलाव में लोग अपने को देखने की कोशिश कर रहे हैं।
अच्छा, उसमें जो library का पूरा संदर्भ है, library को फिर से establish करने का कि वो उसको ठीक करने के लिए आ रहा लेकिन मुझे लगता है कि वो library सिर्फ library नहीं है। वो library का एक तरह से जीवनोद्धार करने के लिए आया है, तो क्या library भी कुछ वहाँ अपने भौतिक स्वरूप से आगे कुछ कहती है। वो क्या है, उसपर आप थोड़ी सी रोशनी डालें ।
ऐसा है कि वो लौटा तो लाइब्रेरी के लिए ही है । वो Europe में पढ़ा है। Europe में लाइब्रेरी का कितना महत्व ये हम जानते हैं । हम सब लोग जानते हैं कि हमारी अपनी जो ज्ञान-परंपराएँ हैं भारत की, वो तो library कल्चर से बाहर हो गई हैं ।
बिल्कुल।
तो वो library को फैलाना चाहता है। वो देश आता ही इसलिए है। वो अध्येता दर्शन का है। दर्शन के अध्येता को यह तो अंदाज है ही कि उसकी परंपरा की अब हालत क्या है ?तो क्या वो जो करने आया है वो कर पाएगा? ये लिखने से बात नहीं बनती। यह आज मैं पाठक के रूप में कह रहा हूँ कि वो उस library में जो पारंपरिक ज्ञान-परंपराएँ हैं, क्या उनको किसी रूप में शामिल कर सकेगा? हमारे रोजमर्रा के चिंतन-विमर्श में?वह उसी के लिए लौटता है। उसके लिए library सबसे कारगर जगह है। इसलिए भी क्योंकि संस्थाओं में – आप स्वयं एक संस्था में हैं – उन संस्थाओं में आप बहुत ज्यादा विकास नहीं कर सकते। उसकी सीमाएँ हैं। Library में जो संभावना है, अगर वो librarian है तो उसकी संभावनाएं बहुत ज्यादा है। यानी यह नहीं कि वो वहाँ course नहीं पढ़ा रहा है, लेकिन पुस्तकें वो लोगों के जीवन के रास्ते में रख दे रहा है। Library में यह ज्यादा हो सकता है। दूसरा एक तरह के अनुभव की बात है कि भोपाल में जो एक पुरानी library है, जहाँ मैं गया भी हूँ एक बार, वो library कभी पुनर्नव हो नहीं पाई । पुरानी चीजें, किताबें रखी हैं तो रखी ही हैं। हमने उन colonial libraries को, जिनमें एक तरह की पुस्तकें एकत्र हुईं, उनको दोबारा बढ़ाने का प्रयास ही नहीं किया है। तो वो library एक तरह से ऐसी library की कल्पना है जिसमें ज्ञान-परम्पराएं योगदान कर सकें और उस ज्ञान-परंपरा को रखा जा सके, उपलब्ध कराया जा सके। और इस अर्थ में library का महत्व बहुत है। दूसरा, हमारे देश से जुड़ा है । एक तो library, मैं खुद बहुत जाता हूँ। Library मुझे बहुत ही intimate, बहुत ही आत्मीय जगह लगती है। मैं भोपाल में एक library है, उसमें जाया करता था। तो जब कई वर्षों बाद मेरा भतीजा उसमें सदस्यता लेने गया तो librarian ने कहा कि तुम अपने चाचा जैसे ही पागल library आने वाले तो नहीं बनोगे ? क्योंकि मैं वहाँ जाता ही नहीं था, मैं वहीं जाकर पढ़ता था। पढ़ते-पढ़ते सो जाता था, तो table पर सिर रखकर सो जाता। मैं 10-10 घंटे वहाँ रहता और अपनी किताब ले जाता था। वहाँ की किताब हमेशा पढ़ूँ, ये जरूरी नहीं था। लेकिन वो library मुझे अभी भी याद है । , राजकुमार, मैं किसी दूसरे शहर जाता हूँ तो library या पुस्तकों की दुकान में आकर ही मुझे, अगर मेरा कोई वहाँ दोस्त नहीं है, तो मुझे ऐसा लगता है कि मैं किसी आत्मीय के घर आ गया हूँ। तो library के प्रति भी एक आत्मीयता मेरे अंदर जो है, उसने भी एक भूमिका अदा की होगी। और library में केवल पढ़ना ही नहीं होता है। आप बहुत से पढ़ते हुए लोगों को भी देखते रहते हैं। वो भी एक social interaction है । थोड़े charged होते हैं लोग वहाँ । Library में पढ़ता हुआ व्यक्ति विचारशीलता के थोड़े ऊँचे सोपान पर होता है। तो वो भी, और उसका दिमाग भी अधिक खुला होता है। यही सब बातें रही होंगी ।
जो library के बारे में आपने बताया, उससे जुड़ा हुआ जो नायक है, नायक ही कहेंगे। फिर उसकी मृत्यु? क्या इस प्रकार के प्रयास या अभियान की मृत्यु का भी वो रूपक है कि केवल ऐसे ही ?
अब आप कह रहे हैं तो मैं उसको कह सकता हूँ – हम अपने ऐसे प्रयास, जो छोटे होते हैं, नए होते हैं, जिनसे कोई बड़ी चीज हो रही होती है, हम उसको ऐसे ही तो मारते हैं। भारत में क्या ये सच नहीं है कि हमें एक बहुत ही अच्छा शिक्षक कोई मिला हो जिसने हमारे सोचने-समझने को बहुत हद तक समृद्ध किया हो , बहुत हद तक आपको कुछ नई अंतर्दृष्टि दी हो , हम क्या उसको इसी तरह अकेला नहीं छोड़ देते हैं ?, इसी तरह उसका तिरस्कार नहीं करते रहते हैं?
अर्थात एक तरह से किसी भी बेहतर संभावना की मृत्यु का भी ये रूपक है ।
बिल्कुल है। उसको फिर दूसरा कोई उठा लेता है। वो फिर कोशिश करता है और फिर ये मृत्यु होती है । मृत्यु ग्रीक अर्थों में ट्रैजिक इसलिए नहीं बनती कि इसमें जो बढ़त का हिसाब है, वो यह है कि हम एक potential पर चलते हैं, संभावना पर। वो खत्म हो गया तो फिर एक नई संभावना । उसमें वो एक अलीम करके जो लड़का है, वो आता है। जो उसका सहायक रहा है , अब वो प्रयास करेगा। फिर कोई और नया प्रयास होगा, क्योंकि अलीम का जो cultural access है, सांस्कृतिक उसकी धुरी है, वो थोड़ी-सी भिन्न है। तो अब उस प्रयास से भी हो सकत है कुछ हो । फिर तीसरा प्रयास होगा -ज्ञान-परंपरा को अपने लोगों तक पहुंचाने के लिए , अपने साधारण लोगों के लिए।
तब ये चलता रहता है , उस प्रयास की श्रृंखला का कोई अंत नहीं है।
हाँ, बिल्कुल। इस अर्थ में वो त्रासद नहीं है। वो अपने classical अर्थ में ट्रैजिक नहीं है। Tragedy में थीम खत्म होता है और उसका closure हो जाता है।
मैं सोच रहा था कि जैसे आपके लेखन में जो मृत्यु आती है, वो स्वाभाविक मृत्यु है।
हाँ।
लेकिन यहाँ पर उसकी हत्या होती है। मैं समझ नहीं पा रहा था कि भई, यहाँ पर उसकी हत्या क्यों दिखाई गई। स्वाभाविक मृत्यु भी तो दिखाई जा सकती थी।
जी, जी।
अब वो बात खुली।
जी।
बात स्पष्ट हुई कि क्यों यहाँ पर इस उपन्यास में उसकी हत्या दिखाई गई है, उसकी एक स्वाभाविक मृत्यु नहीं।
जी ।
सायास उसको मारा गया है। उसकी हत्या की गई है, क्योंकि हमने ये पूरा हमारा जो उपनिवेशी वृत्तांत है और जिसको हमने विकास के नाम पर ओढ़ लिया है, वो इस तरह की जो भी सार्थक, सर्जनात्मक, वैकल्पिक संभावनाएँ हैं,उनकी हत्या करता ही है और उनकी हत्या किए बगैर शायद उसका काम ही नहीं चल सकता।
और हमें पता भी नहीं होता है कि हम ऐसा कर रहे हैं । चोर आकर छुरा चलाता है, जो उसको लग जाता है और वो मर जाता है। ये जो चोर है, इसको नहीं पता है, लेकिन हत्या हम भी इसी तरह करते हैं। हमारे देश में इतने प्रयास हुए हैं। आप भारत भवन देख लीजिए, भोपाल शहर में। वो इसी तरह खत्म हुआ । एक पूरे संस्थान के प्राण इसी तरह लिए गए कि उनको लगा कि अब हम इन सबको हटा देंगे और फिर हम इसे चलाएंगे । लेकिन वो हत्या कर रहे थे उस वक्त। आपको पता ही नहीं था कि आपने उसकी—
ज्यादा बड़ी हत्या की है।
ये बहुत बड़ी हत्या थी, क्योंकि उसमें पता नहीं कितनी संभावनाओं की हत्या हो गई। लेकिन हुई ऐसे नहीं थी मानो किसी ने घेरकर मारा हो।
जी ।
मारा इसी तरह – धीरे-धीरे। इन चीजों को हटा दो और वो खत्म हो गया। एक संस्थान जो जीता-जागता, साँस लेता संस्थान था, वो निष्प्राण कर दिया गया । तो हम यही करते हैं। कई बार अपनी ideology, जैसे दक्षिणपंथी ideology या फलानी, हम इन्हीं के सहारे करते हैं। हम अपने लेखकों को मारते हैं। आप देखिए, आज कितने लोग वासुदेव शरण अग्रवाल की बात करते हैं।
नाम भी शायद नहीं सुना होगा।
नाम भी नहीं सुना होता है बहुत सारे लोगों ने। हम चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानियाँ या उनके निबंध – उसने कहा था, कहानी एक बहुत ही उत्कृष्ट कोटि की कहानी थी। उत्कृष्ट कहानी हम कितने लोग याद करते हैं? और नहीं करते हैं तो क्यों नहीं करते? हम हत्याएँ इसी तरह करते हैं, उस चोर की तरह कि हमें पता भी नहीं चलता कि अरे, हमने तो हत्या कर दी और एक संभावना, कई संभावनाएँ हम इस तरह खत्म करते चले गए।
यह मुझे लगता है कि बहुत ही महत्वपूर्ण चीज है और शायद उससे ज्यादा घातक है जहाँ हम बहुत सोच-विचार के नियोजित तरीके से हत्या करते हैं।
बिल्कुल।
इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है कि शायद हम जानते हैं या शायद हम उस तरह सचेत भी नहीं हैं कि हमारे हाथों यह हत्या होने जा रही है।
हो गई।
लेकिन हो रही है।
हाँ, बिल्कुल। संस्थाएँ हमने ऐसे ही मारी हैं। हमने व्यक्तियों को ऐसे ही दरकिनार किया है – अलग-अलग नामों से, अलग-अलग तरह से, अलग-अलग मूल्य-व्यवस्था के सहारे।
मुझे लगता है बात यहीं समाप्त करनी चाहिए ।
कुछ बातें अभी रह गईं हैं । मैंने आपका उपन्यास काफी पहले ही पढ़ लिया था। फिर इधर आशुतोष ठाकुर की समीक्षा मैंने पढ़ी।
जी।
जो अंग्रेजी में लिखी है। मुझे लगा कि वाकई उसने बहुत अच्छा लिखा है।
जी।
कुछ चीजें तो उसके सहारे भी मुझे समझने में मदद मिली। कुछ चीजें मेरे भी दिमाग में आई होंगी और कुछ चीजें तो अभी आपसे बात करते हुए उसकी अंतर्ध्वनियाँ निकली हैं। उपन्यास जो कहीं उस तरह से फतवे के रूप में नहीं है, कई बार बहुत हल्के से एक संकेत के रूप में है। कहीं पर बिल्कुल gaps के रूप में है कि उस gap को, अंतराल को अगर आप पढ़ सकें तो पढ़ लीजिए।
जी।
अगर इशारे को आप समझ सकते हैं तो समझ लीजिए, नहीं तो जाइए। तो इस तरीके से जो उपन्यास लिखा गया है, जिसमें उसकी ज्यादातर जो बड़ी रचनात्मकता है—
जी।
वो इस तरह से विन्यस्त हैं कि उसको पढ़ने के लिए एक अलग तरह की संवेदनशीलता चाहिए।
बिल्कुल।
और अगर वो संवेदनशीलता नहीं है तो कोई इब्ने-मरियम हुआ करे, कोई आलोचक हुआ करे, उससे वह छूट ही जाएगी । क्या है भाई? तो एक आदमी की हत्या हुई । Library वगैरह के काम से आया था।
बिल्कुल
तब तो वो रचना के भीतर बिल्कुल गया ही नहीं ।
ठीक बात।
बस इधर-उधर अपना टहल-वहल करके चला आया। अंत में एकाध आपकी जो प्रेम कविताएँ हैं , आप, उनका जिक्र करके समाप्त करें तो कैसा रहेगा?
चलिए। मैं बताता हूँ। एक तो हमने sequence कविताएँ लिखीं लेकिन हैं वो प्रेम कविताएँ ही। उसमें एक कविता ऐसे आती है कि वो कविता तो मुझे याद नहीं है, अभी पूरी पढ़ नहीं सकता। लेकिन उसमें वो जा रही है। ब्रह्मांड में वह , वो जा रही है कहीं और जाते-जाते वो ब्रह्मांड में छेद करती है। उसमें सुराख करती है। वो सुराख कर रही है लगातार, ताकि वो जो लिख रहा है, कविता-आख्यान, इसकी जिंदगी में दोबारा आ सके। तो मृतक भी कोशिश करते हैं कि वो दोबारा जीवन में पहुँच सके और जीवित कोशिश करते रहते हैं कि लगातार मृतक को अपनी रचना में बनाए रख सकें ।
वाह!
जो जीवित है, वो अपनी रचना करता है। इससे मुझे बड़ी एक राहत भी मिली थी। जब आप किसी के विषय में सोचते हैं और जब आपको लगता है कि वो भी आपके विषय में सोच रहा हो सकता है, तब एक किस्म की सांत्वना आती है। ये ही नहीं, ऐसी कई कविताएँ हैं जो linked हैं, जुड़ी हुई हैं। तो ये एक मेरे लिए बड़ी सांत्वना जिससे मैं आनंद ले सकता हूँ । वैसे आनंद तो लिखते वक्त होता है।
हाँ।
लेकिन ये एक बड़ी गहरी सांत्वना है , जिससे आपका जीवन चलता रहता है, जिससे आप जीते रहते हैं । और दूसरा,जो ‘खुली आँख करके’ जो संकलन है, उसमें मैं बिल्कुल, जब मैं उसमें गया, एक पूरी नई राह मेरे सामने आई और मैंने उस पर चलना स्वीकार कर लिया। इसका मुझे बहुत संतोष है।
क्योंकि आमतौर पर जब बिल्कुल नया रास्ता कोई होता है तो उसमें चलने से संकोच होता है । उस तरह की कविताएँ सुनना जब मैंने शुरू किया, वो मुझे भी काफी अटपटी लगती थीं। लेकिन मैंने उनको फिर भी लिखा और लिखता रहा, लिखता चला गया। मुझे आज इसकी बड़ी खुशी होती है कि ये बिल्कुल अलग तरह की थीं। कविताएँ जब आप पढ़ेंगे, वो ‘खुली आँख’ कविताएँ जो हैं, वो बिल्कुल मंत्रात्मक हैं। वैसे भी मेरी कविता के एक वाक्य और दूसरे वाक्य के बीच में कभी कोई traditional संबंध होता नहीं है। इनमें भी नहीं था, लेकिन इनमें तो दूर का संबंध भी बड़ी मुश्किल से बनता था। ये उस तरह की थी। और एक बड़े संयोग की बात है कि इन कविताओं को जब मैं लिख रहा था तो मेरे खुद के जो मित्र हैं, वो उससे बड़े असंतुष्ट थे, हालाँकि उन्होंने कहा नहीं। बहुत अच्छे मित्र का ये भी एक लक्षण होता है। अब वो इसके बहुत बड़े प्रशंसक हो गए हैं । उनको पाँच साल लगे। इन कविताओं को लिखते-लिखते चार-पाँच साल हो गए थे, मुझे । मुझे जब तक, राजकुमार, सुनाई नहीं पड़ती कविता, मैं नहीं लिखता। मैं पढ़ता रहता और दूसरे शब्दों पर सोचता रहता , concepts सोचता रहता । उसमें से कभी कुछ रास्ता निकल जाता । इसके लिए मैं lectures देता रहता या अपने निबंध लिखता। दूसरी चीजें जिनमें अगर आप थोड़ा मेहनत करें, अगर आप थोड़ा पत्थर तोड़ने की कोशिश करें, तो उसमें से कुछ सोता, पानी का फूट जाता है लेकिन कविता ऐसे नहीं फूटती। वो खुद आती है, वो एक तरह से ज्यादा यादृच्छिक है। वो ज्यादा, क्या कहना चाहिए, आवारा है।
उस पर आपकी जबर्दस्ती –
जबर्दस्ती नहीं चलती। उसका मतलब यह है कि वो आपके करीब से गुजरी और निकल गई। वो बोदलेयर की एक कविता है, Passerby उसका का नाम है – गुजरती हुई लड़की के लिए वो कविता। उसमें एक लड़की है। वो एक पोशाक, बड़ी-सी जो घेरदार frock जैसी होती है ना, उसके flounces पकड़कर सड़क पार कर रही है। तो उसमें यह कहता है बोदलेयर कि क्या हम फिर कभी मिलेंगे? क्या हम अनंतकाल तक कभी मिल सकेंगे? कविता की उस पंक्ति की हालत इस सड़क पार करती खूबसूरत लड़की की तरह ही होती है। वो खुद आती है, गुजर जाती है। आपने अगर थाम लिया तो थाम लिया, नहीं तो गई। जब तक वो नहीं आई, तो मैं नहीं लिखता और मैं सचमुच नहीं लिखता। मैं कविता कभी बनाता नहीं। लेकिन निबंध या कहानियों में क्या होता है कि plots मेरे दिमाग में बहुत आते हैं, तो फिर मैं उसको कल्पना करता रहता हूँ कि यह कुछ बन जाएगा, बन जाएगा। अगर नहीं बनता है तो मैं पढ़ता रहूँगा। पढ़ने में, आपको भी पता है, आप खुद लेखक हैं, आप जानते हैं, पढ़ना लिखने से भी ज्यादा आनंद देता है। इसमें कोई शक नहीं।
फिर अपने आप में अगर कोई सचेत न हो तो जीवन भर पढ़ता ही रहेगा।
पढ़ता ही चला जाएगा।
लिखना तो बहुत फालतू काम है।
है ना! बिल्कुल। तो इसलिए फिर मैं पढ़ता रहता हूँ। इसलिए ये कविताएँ मुझे ज्यादा पसंद हैं क्योंकि इनमें गहरी सांत्वना थी और जिस शब्द और अर्थ के बिलगाँव को मैं भोग रहा था अंजना के न रहने के बाद, किसी हद तक मैं उसके परे जा सका। और बिल्कुल नई तरह की कविताएँ लिखने का आनंद यह था कि सभी की अस्वीकृति के बावजूद मैं लिखता रहा । क्योंकि इन कविताओं ने ही मुझे वो हिम्मत दे दी कि मैं लिखता चला गया। और अब जाहिर है, मुझे जब ‘खुली आँख’ छपी तो बहुत लोगों ने, मेरे बहुत internet के मित्रों ने भी जब उसके बारे में बात की तो मुझे लगा कि समय लगता है कुछ कविताओं के अंतःस्थ होने में। अगर मैं एक तरह से लिख रहा हूँ और मुझे वो ठीक-ठीक तरह से सुनाई पड़ी है, मैंने उसको बनाने का झूठ-पाखंड नहीं रचा है तो बस मुझे तो पता है। किसी और को ना भी पता हो तो क्या , मैं उसके पक्ष में खड़ा रह सकता हूँ ।
अच्छा, एक बात आपने कही, थोड़ा-सा उसको स्पष्ट कीजिए। यह शब्द और अर्थ के परे जाने वाली जो बात है।
जी। वो ऐसी है -एक तो कविता लिखना मुझे ऐसा लगता है कि भाषा के परे होता है । कविता में जो लिखने की कोशिश कर रहे हैं या जो प्रयास चल रहा है कविता के भीतर – वो भाषा के परे ही होता है। और मैं यह समझता हूँ कि जितना अलंकारशास्त्र है, सौंदर्यशास्त्र है, वो युक्तियाँ हैं जिनसे आप भाषा में—
भाषा के परे जा सकते हैं।
परे जा सके, उसमें cracks पैदा कर सके। अगर हम भाषा को एक मटका मान लें तो उसको crack करने का काम करते हैं ये । तो ये असल में भाषा के भीतर उसके परे जाने की युक्तियाँ हैं। तो अगर आप ऐसा कर लेते हैं तब रस का अनुभव होता है। और रस का मतलब जब आप feel करते हैं, जब आप महसूस करते हैं कि सब शामिल हो गए आपकी भावना में, उससे ज्यादा democratic अनुभव कुछ नहीं है। रस से ज्यादा डेमक्रैटिक कुछ नहीं । जबकि देखिए, Europe में जो catharsis है, वो व्यक्तिगत है। व्यक्ति का catharsis होता है। मैं एक दुख से गुजर रहा था और मैं उस दुख से निकल गया। जबकि जब आप रस का अनुभव करते हैं तो सब है हममे । हर एक में खुद को देखना शुरू कर देते हैं। यह मैं समझता हूँ ज्यादा बड़ा अनुभव है Europe के उस एकांतिक अनुभव की तुलना में। यहाँ भी एकांत है, लेकिन यह भरा हुआ एकांत है। पूरे ब्रह्मांड से भरा हुआ । यही फर्क है।
मन तो नहीं भरा था, लेकिन मुझे लगता है कि नहीं, अब हम अंत के बहुत नजदीक पहुँच चुके हैं ।
जी ।
अंत को पा लिया है ।
जी।
‘पागल गणितज्ञ ’कविता-संग्रह पर मैं कुछ बात करना चाहता था, लेकिन अब छोड़ देता हूँ उसको।
जी, छोड़ दीजिए।
तो आज की बातचीत यहीं पर समाप्त करते हैं।
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