पास्तीश की संस्कृति के चार अध्याय:हरी चरन प्रकाश भाग -4

प्रो. जयदेव इस पुस्तक में कई स्थानों पर यह स्पष्ट करते हैं कि पाश्चात्य प्रभाव और पास्तीश एक ही सिक्के के दो पहलू नहीं हैं , बल्कि दो अलग-अल...


प्रो. जयदेव इस पुस्तक में कई स्थानों पर यह स्पष्ट करते हैं कि पाश्चात्य प्रभाव और पास्तीश एक ही सिक्के के दो पहलू नहीं हैं, बल्कि दो अलग-अलग सिक्के हैं। पाश्चात्य प्रभाव की अवहेलना नहीं की जा सकती, बल्कि भारतीय लेखन के विकास में उसकी एक उपादेयता भी है; लेकिन पास्तीश एक ऐसा फैशनेबल अभ्यास है जिसका भारतीय साहित्य के विकास में कोई योगदान नहीं हो सकता। मोहन राकेश के दो उपन्यासों—'अंधेरे बंद कमरे' और 'न आने वाला कल' के बारे में बात करते हुए वे कहते हैं कि मोहन राकेश के उपन्यासों पर पाश्चात्य प्रभाव तो गहरा है, परंतु उस प्रभाव के होते हुए भी उनका लेखन यह दिखाने में पूरी तरह सफल है कि पास्तीश  एक कुरुप  दृगविषय है।

मोहन राकेश का पूरा लेखकीय जीवन नए रूपों और नई तकनीकों की तलाश में बीता। उन्होंने पाश्चात्य कला-जगत से बहुत कुछ लिया, परंतु उसे भारतीय समाज की आवश्यकताओं के अनुसार अनुकूलित (Adapt) किया। उनके कार्यों में एक ऐसी कलात्मक संवेदनशीलता दिखती है जिसमें पाश्चात्य संवेदनाओं के लिए दरवाजे तो खुले हैं, लेकिन उन्होंने जो कुछ भी प्राप्त किया, उसे आत्मसात किया। यद्यपि उनकी रचनाओं पर हेनरी जेम्स, चेखव, दोस्तोएव्स्की, स्ट्रिंडबर्ग, इब्सन, पिरान्डेलो, हेमिंवे, कामू और सार्त्र का प्रभाव है, तथापि यह प्रभाव उन पर गालिब नहीं है। वे एक 'भारतीय आधुनिकतावादी' हैं जो अपने लेखकीय 'स्व' को भली-भांति परिभाषित कर सकते हैं। मोहन राकेश उच्च आधुनिकतावाद के अभिजात्य अस्तित्ववाद का अनुकरण नहीं करते, हालाँकि वे उसमें निहित चरित्र-निर्माण और वर्णनात्मक तकनीकों से पूरी तरह अवगत हैं। अस्तित्ववाद में मानवीय इच्छा और स्वतंत्रता के प्रति जो गहरा लगाव है, राकेश उसके कायल तो हैं, परंतु वे उससे प्रभावित टोटकेबाज़(Fetishist) लेखन के विरुद्ध हैं। उनके निकट अस्तित्ववादी प्रतिबद्धताएँ तभी महत्त्वपूर्ण हैं जब वे किसी लेखन को सोद्देश्य, उत्तरदायी और सान्दर्भित वैधता तक पहुँचाएँ। इसलिए उनकी कृतियाँ अंतःपाठ्यता (Intertextual) से युक्त हैं, न कि प्रदर्शनकारी अंतःपाठ्यवाद (Inter-textualism) से।

'अंधेरे बंद कमरे' में अनेक पाश्चात्य कृतियों की परछाइयाँ डोलती हैं, लेकिन वह इंटर-टेक्सचुअल संकेत नहीं देती है। इब्सन की 'नोरा' (A Doll's House) और स्ट्रिंडबर्ग के दांपत्य-दर्शन ने 'अंधेरे बंद कमरे' के केंद्रीय दंपत्ति—हरबंस और नीलिमा के चरित्रीकरण में योगदान दिया है। जिस तरह उपन्यास के पात्र हरबंस और मधुसूदन दिल्ली के कोहरे से आक्रांत होते हैं, वह सार्त्र की प्रसिद्ध रचना 'नॉज़िया' (Nausea) के चरित्र रोकोंतिन के सामने छाए  कोहरे के दृश्यों की याद दिलाता है। इटैलो कैलविनो के उपन्यास 'स्मॉग' (Smog) और 'अंधेरे बंद कमरे' में भी बहुत सीसमानताएँ  हैं। स्मॉग का नायक एक पत्रकार है जो पर्यावरण की चिंता में लगी हुई एक पत्रिका का संपादन करता है। विडंबना यह है कि उस पत्रिका का वित्तीय नियंत्रण उन्हीं पूँजीपतियों के हाथों में है जिनके उद्योग धुआँ (स्मॉग) पैदा करके पर्यावरण को नुकसान पहुँचा रहे हैं। दिलचस्प यह है कि वह धुआँ न तो उन उद्योगपतियों को परेशान करता है और न ही उस सुंदर उच्च-मध्यवर्गीय स्त्री को जिस पर यह संपादक मोहित है। अंततोगत्वा, यह पत्रकार-नायक इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि स्मॉग का प्रतिरोध वही लोग करेंगे जो इससे पीड़ित हैं। इस निष्कर्ष की परिणति उस दृश्य में होती है जहाँ कपड़े धोने वाला मजदूर वर्ग कपड़ों को पीट-पीटकर उनसे धुआँ छाँटता है। यह दृश्य नायक को उस उच्च-भू प्रेमिका के व्यामोह से भी मुक्त कर देता है। 'अंधेरे बंद कमरे' के पत्रकार मधुसूदन को ऐसी ही स्थितियों से दो-चार होना पड़ता है। एक प्रत्यक्षतः प्रगतिशील संपादक उसे सांस्कृतिक और प्रगतिशील मन्तव्य के काम सौंपता है, जबकि वस्तुस्थिति यह है कि उस संपादक की वास्तविक राजनीति उसके पूँजीवादी मालिक तय करते हैं। 'सुषमा' नामक एक उच्चवर्गीय सुंदरी उसे आकृष्ट करती है, पर धीरे-धीरे उसे पता चलता है कि सुषमा के व्यक्तित्व में कुछ गहरे दोष हैं। अंत में सुषमा से उसका संबंध टूट जाता है और उसकी नौकरी भी खतरे में पड़ जाती है।

यद्यपि 'अंधेरे बंद कमरे' पाश्चात्य संकेत-चिन्हों का उपयोग करता है, तथापि यह उपन्यास पास्तीश नहीं है। इसके तीन कारण हैं—पहला, इसमें पाश्चात्य संकेत-चिन्हों को पूरी तरह कथा में आत्मसात कर लिया गया है और उन्हें पताका की तरह फहराया नहीं गया है। दूसरा, यह उपन्यास अपने चरित्रों में इन संकेत-चिन्हों से व्युत्पन्न आचार-विचार को मान्यता प्रदान नहीं करता है और उन कारणों पर भी प्रकाश डालता है जो समाज में ऐसे आयातित व्यवहार को बढ़ावा देते हैं। अंततः, यह उपन्यास पारंपरिक रूढ़ियों के प्रति एक आलोचनात्मक दृष्टि रखते हुए यह दिखाता है कि हमारी कुछ पुरानी मान्यताएँ अब मूल्यहीन हो चुकी हैं और समाज पर बोझ हैं। इसके साथ ही 'अंधेरे बंद कमरे' आयातित जीवन शैली और मूल्यों को भारतीय संस्कृति और समाज के परिप्रेक्ष्य में विवेकशील ढंग से जाँचता-परखता है। 'अंधेरे बंद कमरे' पर सबसे महत्त्वपूर्ण प्रभाव स्कॉट फिट्जगेराल्ड के महान उपन्यास 'द ग्रेट गेट्सबी' का पड़ा है। दोनों ही उपन्यास उत्तम पुरुष की आख्यानात्मक शैली में हैं और इस बात पर ज़ोर देते हैं कि वर्णनकर्ता और मुख्य चरित्रों के कार्य-व्यापार को अलग-अलग परिप्रेक्ष्य में देखा जाए। दोनों उपन्यासों में वर्णनकर्ता ('निक' और 'मधुसूदन') ईमानदार, विश्वसनीय और नैतिक प्राणी हैं। मधुसूदन दिल्ली की एक भीड़-भाड़ वाली, गंदी-संदी और रिहायशी कॉलोनी में रहता है और उस दिल्ली के प्रति आकर्षित है जहाँ हरबंस और उसकी पत्नी नीलिमा जैसे लोग रहते हैं। निक भी उसके दोस्तों की  जीवनशैली के प्रति आकृष्ट है। मधुसूदन सुषमा श्रीवास्तव के मोह में पड़ता है, जो 'द ग्रेट गेट्सबी' की 'जॉर्डन बेकर' के चरित्र पर आधारित है। मधुसूदन इस ऊँची दिल्ली में अपनी पहुँच तो बना लेता है, परंतु जब वह इस संभ्रांत दिल्ली के अपने आदर्श पात्रों को नज़दीक से देखता है, तो उसका मोहभंग हो जाता है और वह वापस अपनी नीची दिल्ली में लौट आता है; जैसे निक कैरावे न्यूयॉर्क से मिडवेस्ट लौट जाता है।

हरबंस और नीलिमा इस तथाकथित श्रेष्ठ दिल्ली के वातावरण में चमकने के लिए अपने तमाम संस्कारों का उल्लंघन करते हैं और ऐसा करते समय पास्तीश की तरह व्यवहार करते हैं। तथापि यह बात भी उल्लेखनीय है कि उनके संस्कार मृत नहीं हैं, केवल एक नई जीवनशैली के कारण सुप्त पड़े हैं। यहाँ सुषमा श्रीवास्तव कुछ अलग जीव है; उसके लिए जीवन केवल एक व्यवसाय है और शैली ही मूल्यवान है, क्योंकि उसके अच्छे दाम हैं।

मधुसूदन का आख्यान यथासंभव हर पहलू से जीवन की वर्तमान जटिलता का यथार्थवादी वर्णन करता है। उसके आख्यान में उस परिवेश का वर्णन है जिससे वह आया है। उसकी इच्छा और उसके प्रभाव का भी वर्णन है जिसके तहत वह 'नीची दिल्ली' से 'ऊँची दिल्ली' में आना चाहता है, और फिर उसका वापस लौटना है, लेकिन इस लौटने में कोई लाचारी या कृत्रिम भाव-भंगिमा नहीं है। यद्यपि उसके लौटने को कहीं-कहीं कुछ अधिक नाटकीय (Theatrical) बताया है, लेकिन यह बात निर्विवाद है कि इस निर्णय के पीछे कुछ नैतिक, सामाजिक और व्यावहारिक लक्ष्य हैं। लौटने का यह निर्णय कोई शून्यजनक बौद्धिक प्रलाप नहीं है, बल्कि संस्कृति के देसी-विदेशी नादिरशाहों की आधिपत्यवादी राजनीति को उजागर करने वाला एक ठोस क़दम है।

 'अँधेरे बन्द कमरे' के मधुसूदन में जिस प्रकार का मुक्तिकारक विश्वास उत्पन्न होता है वह 'न आने वाल कल' के मनोज सक्सेना में नहीं है। मनोज का किसी समाजनीति में विश्वास नहीं है और यह सस्कारहीनता उसे पास्तीश का आराधक बनाती है। वह म्योरसोल या रोकॉन्तै की तरह जीना चाहता है। मोहन राकेश इस परिवर्तन की इत्तला एक नामचीन पब्लिक स्कूल के सन्दर्भ में कामू की व्याख्या करते हुए देते हैं। यह स्कूल एक ऐसा रूपक है जो ऊँची दिल्ली और नीची दिल्ली से भी अधिक विभाजित है। मनोज म्योरसोल के रवैये की नक़ल करता है, जबकि दोनों की जीवन-स्थितियों में अन्तर है। राकेश जानबूझ कर और बताकर मनोज की भारतीय 'आउटसाइडर' बनने की इच्छा का वर्णन करते हैं। इसलिए और इस लिहाज से 'न आने वाला कल' 'आउटसाइडर' से प्रभावान्वित नहीं है वरन उस प्रभाव की समानुभूतिशील आलोचनात्मक व्याख्या है।

'आउटसाइडर' और 'न आने वाला कल' दोनों ही स्व तथा अन्य की धुवात्मकता से परिभाषित होते है। दोनों ही उपन्यासों में दो ऐसी बड़ी घटनाएँ हैं जो स्व तथा अन्य के परस्पर विरोधी परिप्रेक्ष्य का वर्णन करती हैं। 'आउटसाइडर' की पहली घटना म्योरसोल की माँ की मृत्यु के बाद उसका अजीबोगरीब व्यवहार है, वह माँ के शव पर एक अन्तिम दृष्टि डालने से इनकार करता है और शोक सम्वेदना प्रकट करने आए लोगों के सामने वह दुखी के बजाय बोर होता हुआ दिखता है। वह अपनी माँ की मृत्यु से असम्पृक्त नज़र आता है, इसके बरक्स कामू कुछ पड़ोसियों के परम्परागत सामाजिक व्यवहार का वर्णन करते है। नतीजतन म्योरसोल के रूप में एक अतिव्यक्तिवादी और प्रामाणिक अजनबी सामने आता है। उपन्यास की एक और बड़ी घटना म्योरसोल द्वारा सागर तट पर एक अरब व्यक्ति की हत्या किया जाना है। इस कृत्य से उसे किसी अपराध की अनुभूति नहीं होती है। उसके अनुसार धूप, गर्मी और उस अरब के चाकू की चमक इस हत्या के कारण हैं। यह कारण अन्य सामाजिक प्राणियों की समझ और सम्वेदना से परे हैं, लिहाज़ा यह एक प्रामाणिक अजनबी है, जिसके पक्षधर कामू हैं। बेशक इन सबसे एक सगतिपूर्ण चरित्र की निर्मिति तो होती है, लेकिन इस निर्मिति के आधार ऊलजलूल हैं।


यह कहना कि समाज का कोई भी मानव-संगठन न्यायपूर्ण नहीं है या त्रुटिहीन नहीं है एक अलग बात है, क्योंकि समाज कभी भी एक आदर्श संरचना नहीं रहा है। परन्तु, इसके बाद यह कहना कि व्यक्ति समाज के बाहर जा गिर सकता है, कई सवाल पैदा करता है। सच पूछा जाए तो यह पूरी अवधारणा एक अराजक किस्म की रुमानियत से ग्रस्त है।'आउटसाइडर' की कमी यह है कि वह स्व तथा अन्य के बीच सम्वाद की सम्भावना को नकारता है और परिणामतः सम्वाद की प्रक्रिया से स्व तथा अन्य के बीच उत्पन्न होने वाले द्वन्द्वात्मक तनाव की रचनात्मकता की अवहेलना करता है। उक्त के बावजूद यदि कोई 'आउटसाइडर' को अपेक्षाकृत उदार दृष्टि से पढ़ना चाहे तो कहा जा सकता है कि इसके पीछे अतिव्यक्तिवादी दार्शनिक परम्पराओं, अलजीरिया की सामाजिक राजनीतिक स्थिति के अलावा पश्चिमी समाज की एक विशिष्ट वर्गीय चेतना भी हो सकती है, जिसके तहत खाए-पिए-अघाए मनुष्य का यह पूछना लाजिमी हैं कि जीने का मकसद क्या है। कहने की आवश्यकता नहीं कि भारतीय समाज के लिए यह अस्तित्ववादी नमूना सर्वथा अवांछित है। यहाँ तक कि कामू को भी 'द प्लेग' में इस रवैए से परहेज़ करना पड़ा था।


'न आने वाला कल' का मनोज सक्सेना एक पास्तीश है क्योंकि वह कामू की विचारधारा और संरचना को अपने जीवन में ढ़ालने का प्रयास करता है। 'आउटसाइडर' की ही तरह मनोज सक्सेना का आचार-विचार दूसरों के परम्परागत और निष्ठावान जीवन-परिप्रेक्ष्य के निकट रखकर दिखाया गया है। स्व और अन्य की ध्रुवात्मकता उसके जीवन के दो प्रसगों के सन्दर्भ में दिखाई गयी है। पहला, पत्नी शोभा द्वारा उसे छोड़ना और दूसरा, मनोज का नौकरी से इस्तीफा। शोभा बहुत क्षुब्ध होकर उसे छोड़ती है लेकिन मनोज के लिए यह स्वतंत्रता का क्षण है। इस मामले में उसकी भावहीनता म्योरसोल की भावहीनता से मिलती जुलती है, जब लोग उसकी माँ के अन्तिम संस्कार के लिए एकत्र होते हैं। दोनों ही प्राणी इन घटनाओं द्वारा उत्पन्न सामान्य सामाजिक प्रतिक्रिया से उदासीन हैं।


मनोज का त्यागपत्र पूरे स्कूल को कुछ कुछ उसी तरह चकित कर देता है जैसे म्योरसोल द्वारा की गयी हत्या अल्जीरियन समाज को अचम्भित कर देती है। लोग मनोज को इस क़दम से विरत करने का प्रयास करते हैं, शब्दों का आदान-प्रदान होता है, लेकिन कुछ भी सम्प्रेषित नहीं होता है। उसे दूसरों की भावनाओं के प्रति निरपेक्ष होना है ताकि वह एक प्रामाणिक अस्तित्ववादी बन सके। स्व और अन्य की ध्रुवात्मकता सम्वाद की सम्भावना को तो नष्ट करती ही है, यह स्व की गरिमा को भी कम करती है। मनोज अपने अतीत को भी 'अन्य' मानता है, उससे उसका कोई सार्थक सम्बन्ध नहीं है। 'न आने वाला कल' उत्तम पुरुष में एक स्वीकार-आख्यान है, जिसमें सीधे लेखकीय हस्तक्षेप की गुंजाइश नहीं है लेकिन यहाँ राकेश सूक्ष्मतापूर्वक कुछ ऐसी घटनाएँ बुनते हैं, जिनकी वजह से मनोज का स्वआख्यान स्वयं को विखडित करता है।


इस तरह की कुल पाँच घटनाएँ हैं जो मनोज के अस्तित्ववाद को सन्दर्शित करती हैं और ऐसा करते समय उक्त अस्तित्ववाद के क्रूर अन्तरविरोधों को उजागर करती हैं। पहली घटना उसकी मौसी से सम्बन्धित है जो मलोज की दिवगन्त माँ का सामान एक बक्से में संजोए हुए रखे है और उसे मनोज को देने आती हैं। मनोज को इस सामान की कोई ज़रूरत नहीं है और उससे भी ज्यादा उसके पास मौसी की कोमल भावनाओं की क़द्र करने के लिए हृदय नहीं है। मनोज नौकरी छोड़ने के बाद अपना सामान साथ नहीं ले जाना चाहता है। उस सामान को गिरधारीलाल जैसे भले इनसान के मत्थे छोड़कर जाते समय अगर कोई बात उसके ध्यान में है तो वह है गिरधारीलाल की सीधी-सादी मूर्खता, जिसके कारण वह जगह न होते हुए भी अपने घर में मनोज का सामान रख लेता है। यह वही मनोज है जो लगातार यह महसूस करता है कि स्कूल का तंत्र और उसकी पत्नी उसका लगातार इस्तेमाल करते आए हैं और उनसे मुक्ति में ही उसके स्व की मुक्ति है। गिरधारीलाल का इस्तेमाल करने में मनोज को कोई हिचक नहीं है। एक विडम्बनापूर्ण औचित्य प्रतिपादित करते हुए वह कहता है कि हर आदमी ने गिरधारीलाल को बेबकूफ़ बनाया। उसने भी औरों की भाँति ऐसा ही किया। इस समय अचानक ऐसा लगता है कि स्व और अन्य की सारी धुवात्मकता एक किस्म की नक्शेबाजी है और मानो इन दो विवरणों के माध्यम से मोहन राकेश अपने पात्र मनोज सक्सेना के अस्तित्वबादी सोच और बोली-बानी की पोल खोल रहे हैं।


अगली दो घटनाएँ दो साधारण औरतों के बारे में हैं। शोभा अचानक मनोज के पास आती है और उसे बताती है कि वह उसे छोड़कर जा रही है। मनोज को उसकी अस्त-व्यस्त वेशभूषा याद है और उससे पैदा हुआ विकर्षण भी। उपन्यास के अन्त में शारदा नामक एक महिला का हाल दर्ज़ है जो विकर्षक दशा और रूप में मनोज के सामने खड़ी है। शारदा उसके पड़ोसी कोहली की दूसरी एवं युवा पत्नी है और पति द्वारा प्रताड़ित है। मनोज को लगता है कि यह उसके पास यौन सुख की कामना से आई है। शारदा एक तरह से शोभा का प्रतिरूप है, जिनके वैवाहिक निर्देशांक कुछ परिवर्तनों के साथ एक दूसरे में प्रकट होते हैं। दोनों की पत्नियाँ उत्पीड़ित हैं लेकिन इसकी कोई अहानुभूतिपरक समझ उनके पतियों में नहीं है। मोहन राकेश यह दिखाते में सफल रहे हैं कि घोर व्यक्तित्ववादी मनोज के लिए दूसरा व्यक्ति (पत्नी) एक वस्तु हो सकता है।


चौथी घटना मनोज के व्यक्तित्वाद और अजनबीपन का उपहास उड़ाती सी लगती है। गिरधारीलाल के फ्लैट में सामात डालकर मनोज खुद को हल्का और मुक्त महसूस कर रहा था। अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य से मुक्त होने की अस्तित्ववादी इपिफैनी (जेम्स ज्वाइस ने इपिफैनी नामक ईसाई अवधारणा को साहित्यक अभिप्राय दिए हैं, जिनका मोटा-मोटा अर्थ है-अचानक और आत्मिक प्रकटीकरण चाहे वह वाणी के माध्यम से हो, हाव-भाव में हो या मस्तिष्क की किसी प्रावस्था में हो और जिसे एक साहित्यकार द्वारा बड़ी सावधानी से अभिलिखित करना चाहिए) मनोज के अन्तरतम से मुखरित हुई। पहली बार वह हुआ यानी शुद्ध मनोज सक्सेना। इस इपिफैनिक क्षण से आपत्ति नहीं होनी चाहिए लेकिन दिक्कत तब पैदा होती है, जब यह क्षण उसे एक सनसनीखेज आकर्षण की ओर ले जाता है। शोभा और शारदा जैसी अस्त-व्यस्त पहनावे ओढ़ावे वाली औरतों को मुँह चिढ़ाने के बाद वह काशनी जो एक नौकर की बीवी है और उतनी ही बेमजा है, के पहलू में जा गिरता है। बचे खुचे खाने का लालच देकर लोग काशनी का उपभोग करते हैं। सज-धज से महरूम इस औरत को न अपने बारे में कोई भ्रम है और न दूसरों के बारे में। उसके लिए जीवन का मतलब है बिकना और ख़रीदना। उस एक मैथुनभाव में मनोज सक्सेना का समस्त बौदिक असाधारणपन भूलुंठित हो जाता है। काशनी के लिए वह दूसरों से अलग नहीं है। इपिफैनिक क्षणों के बाद की इस घटिया घटना के माध्यम से पाठक को यह अवसर दिया गया है कि यह मनोज सक्सेना की आडम्बरपूर्ण अस्तित्ववादी योजना पर प्रश्नचिह्न लगाएँ।


प्रो. जयदेव का यह मानना है कि जहाँ वेद, वर्मा और गर्ग के उपन्यासों में विवाह की संस्था पर चोट, मुक्तिमार्गी विवाहेत्तर सम्बन्धों को लुभावना बनाने के उद्देश्य से की गयी है, वहीं मोहन राकेश में इस संस्था की आलोचना तो है परन्तु उससे अलग अविचारी यौन सम्बन्धों को गरिमा नहीं प्रदान की गयी है। काशनी के प्रसंग में कुछ वर्गसंकेत भी है। राकेश को हाशिए पर रह रहे लोगों की संस्कृति के बारे में कोई रूमानी भ्रम नहीं है। वह यह जानते हैं कि सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा तब तक नहीं हो सकती है जब तक कि समाज के सारे वर्ग इसके लिए सचेष्ट न हो। खतरा है कि काशनी वैसे ही बनी रहेगी यदि बचे खुचे खाने का लालच देने वाले लोग वैसे ही बने रहेंगे।


पाँचवी घटना उपन्यास के अन्त में घटित होती है और 'आउटसाइडर' के अन्त से इसकी असमानता पूरी शिद्दत के साथ सामने आती है। कामू का उपन्यास एक कौतूहलपूर्ण जीवन संगीत के साथ समाप्त होता है। म्योरसोल अपने अन्त की प्रतीक्षा कर रहा है परन्तु जीवन का उत्सव मनाता है। इसके उल्टे 'न आने वाले कल' का नायक शोक में है और अपने को ठगा सा महसूस कर रहा है क्योंकि अभी भी उसका जीवन नियंत्रित और निर्धारित है। उसकी बस समय से नहीं आ रही है और वह भूखा है मुक्ति की सैद्धान्तिकी के उधार लिए हुए संकेत भी कुछ काम नहीं कर रहे हैं और उसे भूख का मुँह भरना है। अन्त में बासी सेब उसकी बासी पास्तीश से अधिक महत्त्वपूर्ण साबित होते हैं।


प्रो. जयदेव का यह मानना है कि मनोज की आत्म परिभाषा में खोट है परन्तु उसके रचनाकार में नहीं अस्तित्त्ववाद की परम्परा उसी समय ध्वस्त हो जाती है जब उसे जीवन की वास्तविक स्थितियों से गुज़रना पड़ता है। अन्ततोगत्वा 'न आने वाला कल' मनोज को शानदार नायक की बजाय सांस्कृतिक पास्तीश के मोह में विचलित प्राणी के रूप में चित्रित करता है। मनोज के चमकते झिलमिलाते हुए मुक्ति के क्षण उस कल के लिए हैं जो नहीं आने वाला है।


'न आने वाला कल' सांस्कृतिक पास्तीश को भीतर से दिखाने वाली एक सम्वेदनशील रचना है। यद्यपि इसका नायक इतिहास और समाज के बाहर गिरने की चेष्टा करता है, उसका रचनाकार इस प्रक्रिया के दबावों को समझता है, उन्हें प्रसंगबद्ध करता है और आख़िरकार उसके आउटसाइडर होने के बोध का रहस्यमंजन करता है। वस्तुतः यह उपन्यास हमसे यह विचार करने को कहता है कि क्यों और कैसे कोई शिक्षित और आत्मचेतना सम्पन्न व्यक्ति पहली दुनिया के सांस्कृतिक संकेत-चिह्नों के जाल में फँसता है। राकेश इस बारे में कोई तुरत फुरत का निर्णय नहीं देते हैं परन्तु मनोज के व्यक्तित्व का विखंडन और रहस्यभेदन कर के वह एक जिम्मेदार सांस्कृतिक दृष्टि का परिचय देते हैं।


ई. बैडफोर्ड बस्से की रचना 'लैटिन अमरीकाः अ कन्साइज इन्टरप्रेटिव हिस्ट्री' से प्रो. जयदेव ने निम्नानुसार उद्धृत करते हुए अपने विनिबन्ध का उपसंहार आरम्भ किया है। "(प्रगति और आधुनिकीकरण) दोनों ही धारणाओं में यूरोप और संयुक्त राज्य अमरीका के अधुनातन विचारों, तौर तरीकों, शैलियों और आविष्कारों के प्रति प्रशंसा अन्तरनिहित है। उन्हें अंगीकृत करते, न कि उन्हें अनुकूलित कर ग्रहण करते की इच्छा है। अभिजातवर्ग का यह विश्वास था कि प्रगति करने का मतलब है अपने राष्ट्र को यथासम्भव यूरोपीय और उत्तर अमरीकी प्रतिमानों के अनुसार सृजित करना। यह विश्वास करते हुए कि इस घुनसृजन से उसे फायदा होगा, उसने अपनी समझ का फैलाव करते हुए यह मान लिया कि इससे उनके राष्ट्र भी लाभान्वित होंगे। उसने सदैव अपने (अभिजात) वर्ग की भलाई को राष्ट्र की भलाई समझा है।"


प्रो जयदेव पुनः इस बात पर बल देकर कहते हैं कि उनका यह अध्ययन पाश्चात्य लेखकों और साहित्यिक आन्दोलनों के हिन्दी उपन्यासकारों पर पड़े प्रभाव के विरुद्ध नहीं है। पाश्चात्य सांस्कृतिक संकेत-चिह्नों को पूरी तरह से अस्वीकृत करना न तो सम्भव है और न वांछनीय। इसमें कोई अपमान नहीं है यदि हम इनका आदान विवेकशील और सोद्देश्य ढंग से करें। ऐसा करने से, यह पहले से ही ज़रूरी हो जाएगा कि हमारे पास एक सांस्कृतिक आत्म-परिभाषा और हमें दूसरों से क्या चाहिए इसकी एक स्पष्ट अवधारणा हो। अपनी संस्कृति के प्रति सजगता से ही यह क्षमता प्राप्त होती है। आलोच्य पास्तीश तभी सम्भव होती है जब हमारे अन्दर यह सांस्कृतिक आत्म-सजगता न हो। संक्षेप में यह अध्ययन पाश्चात्य संकेत चिह्नों को टोटके के रूप में इस्तेमाल करने के विरुद्ध है। कॉनरैड लोरेन्ज, 'आन अपेशल' में कहते हैं कि अन्तर सांस्कृतिक सम्पर्क उस दशा में सांस्कृतिक भक्षण में अपभ्रष्ट हो जाता है जब संस्कृतियों में असमानता की भावना हो। खुद को हीन समझने वाली संस्कृति दूसरी संस्कृति की विवेकहीन नकल करते हुए अपनी चीज़ों को छोटा समझने लगती है। पाश्चात्य सांस्कृतिक संकेत-चिह्नों के प्रति वर्मा, गर्ग और वैद का विवेकहीन मोह उन्हें पूस्त और बैकेट नहीं बनाता है, वरन् पास्तीश का कलाकार बनाता है। वह भी ऐसी पास्तीश जो पश्चिम की पास्तीश की तरह आत्म-चेतन गतिविधि न होकर एक सांस्कृतिक भंगिमा है। ऐसा नहीं है कि मोहन राकेश ने किसी से कम पाश्चात्य प्रभाव ग्रहण किया है, परन्तु वह इस प्रभाव को भारतीय सन्दर्भ में जाँचते और परखते हैं और इससे उत्पन्न समस्याजनक स्थितियों के प्रति किसी क़िस्म की शाहाना बेपरवाही नहीं दिखाते हैं।


इस बात को स्वीकार करने में कोई आपति नहीं है कि हमारे समाज में एक बहुत बहुत छोटा वर्ग ऐसा है जो वर्मा, गर्ग और वैद के पात्रों की तरह आचरण करता है या करना चाहता है। ऐसी दशा में उनकी साहित्यिक पात्रता अस्वाभाविक नहीं है। लेकिन जहाँ मोहन राकेश ऐसे पात्रों को अनुमोदित नहीं करते हैं वहीं यह लेखक त्रयी इन्हें ज़बरदस्त चरित्र प्रमाणपत्र देते हुए सर्वाधिक सुसंस्कृत भारतीय के रूप में प्रस्तुत करती है। हमारे देश में शोषण और अभाव का जो यथार्थ है उसमें ऐसे लेखन की लाईद उचित नहीं है। ख़ास तौर पर वैद को पढ़ने के बाद मार्गरेट ऐटवुड का यह कथन बहुत सार्थक हो जाता है कि अगर आप किसी दूसरे का सामाजिक पुराण इस्तेमाल करते हैं तो आप गये काम से। अगर आप अमरीकन या अंग्रेज नहीं हैं लेकिन उनकी तरह लिखते हैं तो आप पाश्तीश साहित्य ही उत्पादित करेंगे। जो साहित्य जीवन और कला, सत्य और सौन्दर्य, वैश्विक संस्कृति और स्थानीय संस्कृति में ध्रुवात्मक दूरी बनाता हो वह हमारे समाज में महत्त्वपूर्ण स्थान नहीं बना सकता है। यद्यपि यह अधिकार किसी को नहीं हैं कि वह हर लेखक से यह उम्मीद करे कि उसके पास सामाजिक अन्तश्चेतना हो परन्तु उस लेखन को वरीयता तो देनी ही होगी जिसमें सामाजिक अन्तर्रात्मा के साथ कलात्मक सौन्दर्य हो। पास्तीश की संस्कृति के साथ दिक्कत इसलिए नहीं है कि उसके सांस्कृतिक चिह्नों का उद्गम पश्चिम में है, दिक्कत इसलिए है कि इसका इस्तेमाल करने वाले ये लेखक इन संकेत-चिह्नों की समय और स्थान की विशिष्टताओं की पह‌चान नहीं करते, उनके विवरण और निहितार्थ को समझने का कष्ट नहीं करते, उसे अपने सामाजिक सन्दर्भ में जाँचते और परखते नहीं, और यदि अन्ततः कोई भारतीय अनुभव इन प्रभावों के विरुद्ध है तो उसकी समस्याजनकता को उद्घाटित करने के बजाय उसे बेपरवाही से ख़ारिज कर देते हैं। वर्मा, गर्ग और वैद के उपन्यासों में यह आग्रह है कि उन्हें अस्तित्ववादी, रूपवादी और उच्च आधुनिकतावादी प्रतिमानों के सादृश्य पढ़ा जाए। ऐसा कर भी लिया जाए तो भी यह पाठकीय आशा तो रहती ही है कि उनके उपन्यासों में पश्चिमी इन्टरटेक्सचुएलिटी की जो झड़ी है, काश उसके बीच कोई भारतीय इन्टरटेक्सचुएलिटी भी हो। इसके बरक्स हिन्दी की मुख्यधारा के अनेक ऐसे रचनाकार हैं जिन्होंने आधुनिकतम प्रयोग और भारतीय यथार्थ का सम्यक निर्वाह किया है। (प्रो. जयदेव ने इस सन्दर्भ में अनेक हिन्दी उपन्यासकारों और आलोचकों का आदरपूर्ण उल्लेख किया है, जो महत्त्वपूर्ण आन्दोलनों और क्षणभंगुर साहित्यिक फैशनों में फर्क़ करना समझते हैं।


अब यहाँ यह सवाल भी उठाया जा सकता है कि पास्तीश के बारे में इतनी चिन्ता क्यों की जाए जबकि कोई भी विवेकशील पाठक हिन्दी में बैकेट और मिलर को पढ़ने के बजाए सीधे-सीधे बैकेट और मिलर को पढ़ लेगा। यह निर्दोष आशा करने से पहले इस बात घर ध्यान देना होगा कि पास्तीश ने हमारे अनेक प्रतिभाशाली रचनाकारों को मोहा है। आख़िरकार कौन इस बात से इनकार कर सकता है कि निर्मल वर्मा प्रथम श्रेणी के कलाकार हैं और कृष्ण बलदेव वैद ने 'उसका बचपन' जैसी उत्तम रचना हिन्दी को दी है। इसके दृष्टिगत इस बात की आशंका बनी रहती है कि हमारी इस तरलित सांस्कृतिक अवस्था में आगे भी पास्तीश उन लेखकों को आकृष्ट करती रहेगी जिनके लिए भावनाओं की भारतीय संरचना सिर्फ तलछट है और पाश्चात्य भावाभिव्यक्ति की नक़ल आधुनिकता का प्रतीक है। हालाँकि यह सम्भव नहीं है कि मुख्यधारा का हिन्दी साहित्य कभी अपना आकर्षण खोएगा लेकिन यह सम्भव है कि पास्तीश का साहित्य अपनी समानान्तर पहचान बना ले।


यह सोचने का लोभ होता है कि पाश्चात्य साहित्यिक आलोचक हिन्दी की पास्तीश रचनाओं के प्रति क्या रवैया अपनाएँगे। मुमकिन है कि साहित्य के प्रति उनका रवैया शिष्ट और रियायतपूर्ण हो क्योंकि ऐसा साहित्य उन तक जल्दी से पहुँचता है, उनकी भाषा में आसानी से अनूदित होता है और परिचित सा लगता है। अनुवाद की पहुँच की इस दिक्कत को शीघ्रातिशीघ्र दूर करना चाहिए नहीं तो पास्तीश का कथा संसार ही अन्तर्राष्ट्रीय साहित्यिक सम्वादों में हिन्दी साहित्य का प्रतिनिधित्व करने का अवसर पाएगा और ऐसा होने की दशा में पास्तीश एक चित्र-विचित्र सनक से उपर का दर्ज़ा प्राप्त कर लेगी।


पास्तीश साहित्य के मर्मात्मक संसार के उद्‌घाटन के लिए आवश्यक है कि आलोचकगण इसकी ओर सतर्क रहें। इसके लिए साहित्य के मूल्यांकन की पश्चिमी शर्तों और परिभाषाओं की जाँच-परख के बाद ही उनकी वैश्चिक प्रासंगिकता को स्वीकार करना चाहिए। हम लोग पश्चिमी शर्तों की परिभाषाओं से इस कदर घिरे हुए हैं कि अपेक्षाकृत देरी से यह समझ पाए हैं कि 'मैला आँचल, आधा गाँव' और 'ज़िन्दगीनामा' जैसे उपन्यास कितनी बड़ी उपलब्धि हैं। शुरुआती दौर में इन उपन्यासों की प्रशंसा के साथ यह शिकायत भी थी कि इनमें स्मरणीय नायक नहीं है और इनकी केन्द्रीयता कमज़ोर है। आज जबकि केन्द्रीयता किसी रचता की अधिमान्य शर्त नहीं रही है तो शायद हम अपने को बधाई देना चाहें कि हिन्दी में उत्तरआधुनिकता की चर्चा से पहले ही मैला आँचल लिखा जा चुका था। हालाँकि इस बात से हमें कोई राहत नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि प्रकारान्तर से इससे यही साबित होगा कि हम अवधारणाओं और परिभाषाओं के लिए पश्चिम का मुँह जोहते हैं।


आज के दौर में यह आशंका निर्मूल नहीं है कि एक मौसमी बहार होने के बजाय, पास्तीश कोई गहरी और मज़बूत जगह हमारे साहित्य में बना ले इसका कारण यह है कि पूँजीवादी और बहुराष्ट्रीय-पूँजीवादी संरचना के हितों की आवश्यकताओं का पास्तीश की संस्कृति के साथ सह‌योजन आसान है। इसका अर्थ यह नहीं है कि पूँजीवादी संरचना और पास्तीश की संस्कृति के अनुगामियों के बीच कोई समझौता है, आशय यह है कि इन दोनों के बीच अच्छी-खासी समरसता है।


बहुराष्टीय पूँजीवाद एक सगाली संरचना है, जिसमें सम्बन्धों का ऐसा जटिल परिचय है जहाँ प्रत्यक्षतः बिल्कुल अलग-अलग पड़ी चीजों में भी अन्तर्सम्बन्ध होता है। चूँकि पास्तीश साहित्य में जनाकांक्षा और जनसक्रियता के प्रति सहानुभूति नहीं है, इसलिए इसके मुख्य पात्र अमूर्तता के भक्त है। याद रखने योग्य है कि संस्कृति न तो अमूर्त है और न ही कोई मूर्तित बाज़ार। आज स्थिति यह है कि हममें से कुछ लोग इस देश और समाज की परिभाषा गढ़ने के लिए हज़ारों बरस पीछे जाना चाहते हैं जैसे कि संस्कृक्ति कही जमी हुई पड़ी है और उसे समय और इतिहास ने बदला नहीं होगा। वहीं कुछ लोग सदैव पश्चिम की ओर देखते हैं। यह स्क्रीजोफेनिया सांस्कृतिक लापरवाही पैदा करती है। संस्कृति तो अनवरत आलोचना और व्याख्या की माँग करती है। निस्सन्देह पास्तीश साहित्य के लिए मैत्रीपूर्ण आर्थिक वातावरण का सृजन लेखकों ने नहीं किया है लेकिन उनसे यह आशा तो की ही जा सकती है कि वह इसके प्रदूषण से बचें।


दिलचस्प बात है कि इस अध्ययन के बीच में पूर्ण गम्भीरता के साथ मनोहर श्याम जोशी के 'कुरु कुरु स्वाहा' की निम्न पंक्तियाँ प्रो. जयदेव ने उद्धृत की हैं।

"जोशीजी, इंडियन अलाँ और इंडियन फलाँ बन जाने के चक्कर में सतत अनुवादक हैं। बहुत प्रेमपूर्वक घोटा लगाते हैं पश्चिमी साहित्य का अंग्रेजी में, और फ़िर हिन्दी में लिखते हैं। कुछ न कुछ अपने आराध्य ओरिजनल अलाँ या फलाँ के इस्टाइल में कि कोई फ़िर उनका साहित्य अंग्रेज़ी में अनुवाद करे और ओरिजनल अलाँ-फलाँ से दाद दिलाए। इन्हें दिक्कत यह है कि पढ़-पढ़कर इनके लिए साहित्य क्या, ससुरा जीवन तक मौलिक नहीं रह गया, जब देखो गुरुजी यही कहते हैं कि सन्दर्भ यह पुस्तक, सन्दर्भ यह नाटक, सन्दर्भ यह फ़िल्म, गोया किताबें इनके लिए ज़िन्दगी हो गयी हैं और ज़िन्दगी इनकी ससुरी किताबी हो चली है।"



लेखक- हरी चरन प्रकाश

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शब्देन्द्रिय: पास्तीश की संस्कृति के चार अध्याय:हरी चरन प्रकाश भाग -4
पास्तीश की संस्कृति के चार अध्याय:हरी चरन प्रकाश भाग -4
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