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निवेदन

निवेदन  [उनके प्रति जो मेरी कृतियों में मुझे ढूँढ़ेंगे] ये कविताएँ, यह कथा-कहानी-उपन्यास,इनके अन्दर तुम नाहक मुझको ढूँढ़ रहे! ये गलियाँ थीं, इनसे होकर मैं गुजर चुका, यह केंचुल है, जो धीरे-धीरे छूट रही! 'मैं' और 'कला' इनकी कुछ भी अहमियत नहीं! इन दोनों से ज्यादा विराट्  कोई तीसरा सत्य है जिसको आत्मसात् कर पाने को  मेरी आत्मा धीरे-धीरे जीवन की यज्ञ-शिखाओं में पकती जाती। ओ मेरे बेजाने-पहचाने दोस्त, कौन जाने शायद मुझसे पहले तुम पा जाओ वह जिसको खोज रहा हूँ मैं! तुम भी जाने या अनजाने चल रहे वहीं! दुःख, दर्द और संघर्षों के माध्यम से जब तुम भी उस सच्चाई की मंजिल तक पहुँचो जब एक विराट् सत्य की छाया में अभिषेक तुम्हारा हो तब अपने चरणों पर बिखरे  क्षत-विक्षत पूजा-फूलों में ढूँढ़ना मुझे शायद तुम मुझको पा जाओ नाहक तुम ढूँढ़ रहे मुझको इन कथा-कहानी-उपन्यास-कविताओं में! ¤ ¤ ¤ स्रोत- ठण्डा लोहा(99-100) रचनकार- धर्मवीर भारती प्रकाशक- भारतीय ज्ञानपीठ  

पास्तीश की संस्कृति के चार अध्याय:हरी चरन प्रकाश

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  अध्याय-1 इण्डियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडी , शिमला द्वारा 1993 में प्रकाशित प्रो. जयदेव के विनिबंध ' द कल्चर ऑफ़ पास्तीश: एक्जिस्टेंशियल एस्थेटिसिज्म इन द कन्टेम्परेरी हिंदी नावेल ' में पास्तीश, उच्च आधुनिकतावाद और अस्तित्ववाद के अधिरूढ़ प्रभाव में लिखे गए हिंदी उपन्यासों का आलोचनात्मक विश्लेषण किया गया है। इसके लिए प्रो. जयदेव ने चार प्रमुख उपन्यासकारों–निर्मल वर्मा , मृदुला गर्ग , कृष्ण बलदेव वैद और मोहन राकेश के प्रतिनिधि उपन्यासों का चयन किया है। इन उपन्यासों में पाश्चात्य सांस्कृतिक संकेतों ( Cultural Codes) की प्रचुर मौजूदगी के बावजूद उन्होंने प्रत्येक लेखक को अलग-अलग श्रेणियों में रखा है। अध्यायों के शीर्षनाम के अनुसार , जहाँ निर्मल वर्मा पास्तीश के सुंदर और कलात्मक आस-पड़ोस में दिखाई देते हैं , वहीं मृदुला गर्ग के यहाँ पास्तीश का छद्म और दिखावा है ; कृष्ण बलदेव वैद में पास्तीश का असह्य ऊबाऊपन है , तो मोहन राकेश के यहाँ पाश्चात्य प्रभावों का विवेकशील और आलोचनात्मक उपयोग दिखाई देता है। चूँकि पास्तीश पूरी तरह से एक पश्चिमी साहित्यिक अवधारणा है , इसलिए स्वाभाविक रूप ...

नाख़ून क्यों बढ़ते हैं?

बच्चे कभी-कभी चक्कर में डाल देने वाले प्रश्न कर बैठते हैं। अल्पज्ञ पिता बड़ा दयनीय जीव होता है। मेरी छोटी लड़की ने जब उस दिन पूछ दिया कि आदमी के नाख़ून क्यों बढ़ते हैं, तो मैं कुछ सोच ही नहीं सका। हर तीसरे दिन नाख़ून बढ़ जाते हैं, बच्चे कुछ दिन तक अगर उन्हें बढ़ने दें, तो माँ-बाप अक्सर उन्हें डाँटा करते हैं। पर कोई नहीं जानता कि ये अभागे नाख़ून क्यों इस प्रकार बढ़ा करते है। काट दीजिए, वे चुपचाप दंड स्वीकार कर लेंगे, पर निर्लज्ज अपराधी की भाँति फिर छूटते ही सेंध पर हाज़िर। आख़िर ये इतने बेहया क्यों हैं? कुछ लाख ही वर्षों की बात है, जब मनुष्य जंगली था; वनमानुष जैसा। उसे नाख़ून की ज़रूरत थी। उसकी जीवन-रक्षा के लिए नाख़ून बहुत ज़रूरी थे। असल में वही उसके अस्त्र थे। दाँत भी थे, पर नाख़ून के बाद ही उनका स्थान था। उन दिनों उसे जूझना पड़ता था, प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ना पड़ता था। नाख़ून उसके लिए आवश्यक अंग था। फिर धीरे-धीरे वह अपने अंग से बाहर की वस्तुओं का सहारा लेने लगा। पत्थर के ढेले और पेड़ की डालें काम में लाने लगा (रामचंद्र जी की वानरी सेना के पास ऐसे ही अस्त्र थे)। उसने हड्डियों के भी हथियार बनाए। ...