उदयन वाजपेई के सर्जनात्मक लेखन के बारे में चर्चा : राजकुम...
उदयन वाजपेई के सर्जनात्मक लेखन के बारे में चर्चा : राजकुमार
राजकुमार: तो आज नौ तारीख है। एक तरह से उदयन वाजपेयी जी के साथ हमारी जो बातचीत पहले हुई थी, उसकी आज यह दूसरी कड़ी है। यहाँ हम उनके रचनात्मक लेखन के बारे में चर्चा करेंगे। मैं उनसे कुछ प्रश्न पूछूँगा, कुछ बात करूँगा। मेरा मानना है कि लेखक अपनी रचना के बारे में स्वयं बोले यह सबसे बेहतर तरीका है उसे जानने का, बजाय शुरू कर सकते हैं कि दो तरह के लेखक होते हैं। एक वे जो केवल रचनात्मक लेखन करते हैं - कहानी, उपन्यास, कविता वगैरह - और दूसरे वे जो रचनात्मक लेखन के साथ-साथ वैचारिक लेखन भी करते हैं, सभ्यता-समीक्षा करते हैं, कला, संस्कृति, साहित्य और दूसरी कलाओं के बारे में विचार करते हैं।
मेरे ख्याल से आप उस दूसरी श्रेणी में आते हैं, क्योंकि साहित्य के अतिरिक्त दूसरी कलाओं में भी आपकी उतनी ही गहरी दिलचस्पी है। संगीत हो, फिल्म हो, लोक-कला हो या चित्र-कला, इन सभी विधाओं और कलाओं में आपकी गहरी दिलचस्पी रही है और आपने उनके बारे में लिखा भी है। मेरी पहली जिज्ञासा यह है कि जब एक ऐसा लेखक, जो वैचारिक किस्म का लेखन भी करता है, रचनात्मक लेखन करता है, तो इन दोनों व्यक्तित्वों के बीच क्या संबंध बनता है और क्या अंतर आते हैं ? जब आप एक विचारक के रूप में होते हैं और जब एक रचनाकार के रूप में होते हैं, तो इन दोनों व्यक्तित्वों के बीच क्या फ़र्क होता है ?
उदयन : यह मेरे जैसे लेखक के लिए एक ऐसा सवाल है, जिस पर मैं लगातार अलग-अलग तरीके से विचार करता रहा हूँ । क्योंकि आपने जिस तरह से यह प्रश्न किया है, उसमें यह खतरा रहता है कि या तो रचनात्मक लेखन को विस्थापित करने के लिए इसका इस्तेमाल हो या फिर उसका तिरस्कार करने के लिए। मेरे मन में इसको लेकर एक विचार है। जब आप लिखने बैठते हैं, जब आप कोई रचनात्मक लेखन कर रहे होते हैं - कविताएँ लिख रहे होते हैं, कहानियाँ लिख रहे होते हैं या उपन्यास लिख रहे होते हैं - उस वक्त रचना का जो स्रोत होता है, वह मानस नहीं होता। वह बुद्धि से नहीं लिखी जाती । इसे ऐसे कह सकते हैं कि जब आप रचनात्मक क्षण में होते हैं, तो जो प्रतिभा और स्वतःस्फूर्त चीज़ आपके भीतर है, वह सक्रिय होती है, तो वह बुद्धि के सहारे काम नहीं करती। वह बुद्धि के बावजूद काम करती है। बुद्धि का बुनियादी लक्षण यह होता है कि वह बने-बनाए विचारों में एक नई कल्पना को अनुकूलित करने का काम करती है। इसलिए जिस वक्त आप कहानी, कविता या उपन्यास लिख रहे होते हैं, उस वक्त बुद्धि कोशिश करती है कि आपकी नई कल्पनाओं और नए विचारों को किसी तरह अपने भीतर अनुकूलित कर ले। आपकी बुद्धि अपने खिलाफ सक्रिय होती है। एक तरह से रचना का क्षण मानस के विभाजन का क्षण होता है - जैसे आप दोनों तरफ से शतरंज खेल रहे हों। एक तरफ से प्रतिभाजन्य नई बात उत्पन्न हो रही होती है और दूसरी तरफ बुद्धि, जिसमें ज्ञात अवधारणाएँ और विचार होते हैं, उन्हें अनुकूलित करने में लगी रहती है। आपको उसे रोकना होता है। किन्तु रचनात्मक क्षण में भी आपका सोच-विचार करने वाला मस्तिष्क भी बहुत काम आता है। लेकिन नए विचार करने की जहाँ तक बात है, जब आप निबंध लिख रहे होते हैं, सभ्यता-समीक्षा कर रहे होते हैं या वैचारिक लेखन कर रहे होते हैं, तब भी बुद्धि नए विचारों को अनुकूलित करने का काम करती है। फर्क इतना है कि जब आप विचार लिख रहे होते हैं, कोई निबंध या इस तरह की किताब लिख रहे होते हैं, तब आपको विचारों की एक वंशावली बनानी पड़ती है। विचारों की उस परंपरा में आप ज्ञात को भी शामिल करते हैं और यह पता लगाते हैं कि उस नए विचार तक कैसे पहुँचे। नए विचार के आने के बाद आप पीछे आते हैं और उन विचारों को तलाशते हैं जिनके सहारे आप उस नए विचार तक पहुँचे होंगे। आप उसी परंपरा में उस विचार को रखते हैं और फिर उसका एक रूपाकार बनाने की कोशिश करते हैं। तो ये दो अलग किस्म के लिखने के ढंग हैं। एक में शुद्ध प्रतिभा की सक्रियता काम आती है और दूसरे में जो मानस है, उसमें मौजूद ज्ञात ज्ञान के खजाने का भी एक हद तक इस्तेमाल होता है। लेकिन मुख्य बात दोनों में यही है कि प्रतिभा कितनी सक्रिय है? प्रतिभा का काम हमेशा नव-नवोन्मेष करना है। वह हमेशा कोई नई बात पैदा करती है।
एक दूसरी बात है, जो नैतिक है। कम-से-कम भारत जैसे औपनिवेशिक अनुभव से गुज़रे देश में लेखक की जिम्मेदारी कई स्तरों पर होती है। इसमें जिसे मैं अपने आदर्श के रूप में देखता हूँ, वे हैं रवींद्रनाथ टैगोर। रवींद्रनाथ टैगोर केवल कविता नहीं लिखते थे। वे बहुत बड़े कवि थे, यह हम सब जानते हैं। लेकिन वे बहुत बड़े उपन्यासकार और कहानीकार भी थे। फिर ऐसा क्या था कि उन्होंने इतने वैचारिक निबंध लिखे? उन्होंने राष्ट्रवाद पर विचार किया, भारतीय मेलों पर विचार किया, तरह-तरह की चीज़ों पर विचार किया और भारतीय जीवन को बहुत गहराई से समझने की कोशिश की। मैं समझता हूँ कि एक भारतीय लेखक का जो धर्म है, जो नैतिकता है, वह अपनी सृजनशीलता को इन तमाम तरह से सक्रिय करने की है। हम यह नहीं कर सकते कि केवल उपन्यास, केवल कहानी या केवल कविता लिखकर काम चला लें और बाकी वक्त खाली रहें।
मैं अपनी कविताओं को उन पद्धतियों से लिखने की कोशिश करता हूँ जिनसे निबंध या वैचारिक लेखन नहीं किया जाता, किन्तु वैचारिक लेखन को त्याग नहीं देता। रवींद्रनाथ ने यह कभी नहीं किया। वे इससे हमेशा गुरेज करते रहे। इसका दूसरा उदाहरण हिंदी में निर्मल वर्मा हैं। वे इतने कमाल के कथाकार हैं कि अगर वे एक भी निबंध न लिखते, एक भी ऐसी किताब न लिखते जिसमें वैचारिक निबंध हों, चेकोस्लोवाकिया की स्थिति पर चिंतन हो, आधुनिक भारत की स्थिति पर विचार हो, तो भी केवल कहानियों के बल पर भी वे एक पर्याप्त लेखक थे। मैं अपने लिए भी ऐसे ही विचार रखता हूँ । मैं किस हद तक ऐसा कर पाया हूँ, यह अलग बात है, लेकिन यह मेरे लिए कम-से-कम आदर्श तो है ही । एक लेखक के रूप में मैं इसे अपना धर्म समझता हूँ। और इसके कारण मेरी कविताओं, कहानियों और उपन्यासों को बहुत नुकसान भी सहना पड़ा है। वैचारिक लेखन में जो लोग मुझसे असहमत हैं, वे तुरंत मेरी कविता की किताब की समीक्षा नहीं होने देंगे, उपन्यास का ज़िक्र नहीं होने देंगे। इसकी कीमत चुकानी ही पड़ती है। अगर आप एक नैतिक जिंदगी जी रहे हैं और धर्म का निर्वहन करते हैं , धर्म का अर्थ आजकल जिस तरह लिया जाता है, उस अर्थ में नहीं बल्कि ethics के अर्थ में, तो इतना तो देना ही पड़ता है। क्योंकि ऐसे देश में, जहाँ उपनिवेश खत्म होने को ही नहीं आता, ये सारे संघर्ष और रीज़िस्टन्स एक लेखक की जिंदगी में आते ही हैं। लेकिन ये दो अलग ढंग के लेखक हैं, एक वो जो रचनात्मक लेखन कर रहे और एक वो जो वैचारिक लेखन कर रहे हैं । इनके लिखने के ढंग अलग हैं। मेरे मन में दोनों के प्रति जो जिम्मेदारी है और दोनों को लिखने के बाद जो आनंद है, वह एक-सा है। ऐसा नहीं है कि कोई निबंध चलते-चलते लिख दिया। कोई भी निबंध गैर-जिम्मेदारी से या बिना प्रतिभा के नहीं लिखा जा सकता। अगर आप लिखेंगे तो बनी-बनाई बातें लिखेंगे। हमारे यहाँ ज्यादातर बनी-बनाई, पहले से स्वीकृत बातों को इकट्ठा करने को निबंध कह दिया जाता है। मैं संयोग से उसे निबंध नहीं कहता।
आपने अभी तक जो बात कही, उससे यह लगता है कि शायद आपने बहुत सोच-समझकर यह फैसला किया कि अपने रचनात्मक लेखन और वैचारिक लेखन को उनकी रचना-प्रक्रिया के अलग-अलग आयामों को ध्यान में रखते हुए अलग रखना है। क्योंकि आज के दौर में बहुत कुछ ऐसा दिखाई पड़ रहा है कि रचनात्मक लेखन के नाम पर भी ज्यादातर वैचारिक लेखन ही किया जा रहा है। जो औसत सामाजिक और राजनीतिक समझ है, उसी के आधार पर कविताएँ और कहानियाँ भी ढाली जा रही हैं। मुझे लगता है कि आपको इसकी एक गहरी प्रतीति रही होगी। इसीलिए आपने बहुत सचेत रूप से लाभ-हानि की परवाह न करते हुए यह निर्णय किया कि वैचारिक लेखन में जो कुछ है, वह एक अलग चीज़ है। उसमें भी परंपरा के बनने के खतरे हैं, जो अक्सर दिखाई पड़ते हैं। लेकिन जो रचनात्मक लेखन है, वह मनुष्य के व्यक्तित्व के एक दूसरे आयाम को - प्रभावित करता है। तो वहाँ पर वे चीज़ें उस तरीके से नहीं आनी चाहिए जिस तरीके से वैचारिक लेखन में आती हैं। शायद यह एक बड़ा कारण है कि हमारा आज का हिंदी का रचनात्मक साहित्य कई बार बड़ा बासी या वैचारिक लेखन का उलथा लगता है। पाठकों में कोई रुचि पैदा नहीं हो पाती, क्योंकि उन्हें लगता है कि ये सारी चीज़ें तो हम राजनीतिक चिंतन और विमर्श में पहले ही पढ़ चुके हैं। इसको अब हम कहानी के उलथे के रूप में क्यों पढ़ें या कविता के रूप में क्यों पढ़ें? दोनों में तात्त्विक रूप से कुछ अंतर नहीं होता। लेकिन ये अंतर मुझे आपके पूरे रचनात्मक लेखन में बहुत खास तौर पर दिखाई पड़ता है । आपने इन दोनों के अंतर को, इनकी भूमिका के अंतर को, कैसे संभाला है। अब हम थोड़ा आपके रचनात्मक लेखन की तरफ आते हैं। मेरी जिज्ञासा है यह जानने की , कि शुरुआत आपने कविता से की या कहानी से?
कविता से।
कविता से कयों ?
इसका एक छोटा-सा किस्सा है, जो मैं आपको सुनाना चाहता हूँ। पहली बात जो आपने अभी कही, वह एक तरह से प्रतिध्वनि है उस बात की जो मैंने शुरू में कही थी। यह बहुत सचेत रूप से हुआ हो, ऐसा नहीं है। यह होता चला गया। आज जब आपने सवाल पूछा तो मैं उस पर लौट रहा हूँ। और यह बड़ी अच्छी बात होती है कि जब ऐसा कोई संवाद होता है, खास तौर पर आप जैसे व्यक्ति से, तो फिर अतीत की ओर लौटने के लिए बहुत रोशनी मिलती है। उन गलियों को, जो अब तक अँधेरी थीं, प्रश्नों की रोशनी में देखने का मौका मिलता है। मैंने कविता लिखने से भी पहले एक बात महसूस की थी। जब तक किसी चीज़ का शब्दांकन - या तो मन में या किसी लिखित रूप में, डायरी वगैरह में - नहीं होता था, तब तक मुझे वह बात ठीक -ठीक समझ में नहीं आती थी। यह मेरे भीतर बचपन से ही था । जब मैं ग्यारह-बारह साल का था और मेरे पिता की मृत्यु होने वाली थी तब मैं उनके साथ बैठता रहता था। पता नहीं कितनी देर तक, मैं उनके पास बैठा रहता था। लेकिन जब तक मैं उस चीज़ को लिख नहीं लेता था, या उसके बारे में अपने दिमाग में उस तरह से विचार नहीं कर लेता था, तब तक वह वाक्य मेरे दिमाग में आता ही नहीं था। स्थिति स्पष्ट ही नहीं होती थी । मैं उस पूरी स्थिति को समझ ही नहीं पाता था। आज मैं उसके लिए एक अवधारणा, प्रत्यय या विचार बता सकता हूँ, लेकिन तब मुझे इसका कुछ पता नहीं होता था। मेरे लिए शब्द ने एक इंद्रिय का काम किया है। ऐसे कुछ लोगों से मैं अपने जीवन में मिला हूँ, जिनका पाँच इंद्रियों से काम नहीं चलता। उनके लिए शब्द की जो छठी इंद्रिय है, वाक्य बनाने की जो इंद्रिय है, वह बहुत जरूरी होती है। इसी कारण मैं लिखता रहा। बचपन से ही तरह-तरह की चीजें लिखता रहा । उसे ठीक-ठीक डायरी लिखना भी नहीं कह सकते, लेकिन मैं कुछ-कुछ लिखता रहा । इसलिए भी लिखता था कि लिखने के उस संसार में प्रवेश पा सकूँ जिसमें मुझे प्रकृत्या या सामाजिक रूप से धकेल दिया गया था। लेकिन जब मैं सत्रह बरस का रहा होऊँगा, तो कुछ हुआ । मुझे कुछ पंक्तियाँ सुनाई दीं। इसके पहले मैंने कुछ कविताएँ लिखने की कोशिश की थी। वे बहुत खराब थीं और मुझे समझ में आ गया था कि ये बहुत खराब हैं, इसलिए मैंने उन्हें फाड़कर फेंक दिया था । लेकिन एक समय ऐसा आया जब मुझे बिल्कुल साफ-साफ कुछ पंक्तियाँ सुनाई देने लगीं । मुझे लगा कि यह मैं लिख नहीं रहा हूँ, मैं इसे सुन रहा हूँ। उसके बाद मैंने उन्हें लिख लिया। उस समय में स्नातक के दूसरे वर्ष में था। चिकित्सा महाविद्यालय में था। मैंने अपना जीवन उस एक हफ्ते में ,जब मेरे साथ ऐसा घटित हुआ, के भीतर इस तरह व्यवस्थित कर लिया कि पूरा जीवन लिखने में बिता सकूँ। उसी क्षण मुझे पता चला कि मैं यही करते हुए पहली बार मानो अपने घर पहुंचा हूँ । कविता कैसी थी, इसे छोड़ देते हैं। लेकिन मुझे पहली बार लगा कि मैं अपने घर में हूँ और मैं इसी घर को पता नहीं कबसे खोज रहा था। इसी खोज के चक्कर में मैं अपने तमाम उस्तादों - मणि कौल, निर्मल वर्मा और जगदीश स्वामीनाथन - से मिला।
थोड़ा बीच में टोकूँ। यह जो “घर” की खोज है आपकी - शब्दों के बीच , रचना में या कविता की पंक्ति में – तो क्या यह एक तरह से आपकी सहज समाधि है?
जी, हो सकता है। अंजना -जो मेरी पहली पत्नी थीं, उनसे बात करने में मुझे बहुत घबराहट होती थी । पहली कविता लिखने के बाद ऐसा नहीं था कि मैं अचानक बहुत ही आत्मविश्वास से भर गया, लेकिन अपने ऊपर थोड़ा-सा भरोसा जरूर आया। मुझे पहले लगता कि मानो मैं अपने घर की छत पर खड़े होकर बात कर रहा हूँ। कोई भी भाव थोड़ी देर रहता था और फिर मिट जाता था। फिर एक नया भाव खोजना पड़ता था। एक अजीब घर था, जो बस ईंट, गारे और दीवारों का एक घर बनना चाहता था। वह बनता था और टूट जाता था। लेकिन मुझे उस क्षण पता लगा , जब मेरी कविता बनी ,कि यही वह जगह है जहाँ मैं आना चाहता था। उसके बाद से मैं कविताएँ लिखने लगा। एक कविता के बाद दूसरी लिखता फिर उसे फाड़ देता था। ऐसा करते-करते एक अवस्था आई जब मेरी कुछ कविताएँ मेज़ पर रखी हुई थीं। एक दिन संयोग से सुबह मैं उठा तो एक तरफ निर्मल वर्मा सो रहे थे और दूसरी तरफ जगदीश स्वामीनाथन। हम तीनों वहाँ रहते थे। मैं कॉलेज चला जाता था, फिर लौटता था तो हम लोग बातें करते थे। मेरी लिखी हुई कविताएँ मेज पर रखी थीं। मैंने कभी नहीं सोचा था कि उन्हें प्रकाशित करने के लिए कहीं भेजूँगा। दूसरी बात तो यह कि मैंने कभी यह नहीं सोचा था कि कविता को प्रकाशित कराने की भी एक यात्रा होती है । लेकिन निर्मल वर्मा ने मेरी कुछ कविताएँ, बिना मेरे कहे, उठाकर एक पत्रिका को भेज दीं । बाद में उन्होंने मुझे बताया कि उन्हें लगा कि ये प्रकाशित होनी चाहिए, इसलिए उन्होंने भेजीं । मैंने कभी उनसे नहीं कहा था कि वे ऐसा करें। लेकिन जब वे कविताएँ प्रकाशित हुईं, उसके बाद से मैं कविताएँ लिखने लगा। कुछ समय बाद मेरे मन में एक लेखक की तरह कुछ बातें चलने लगीं और कुछ ऐसी चीजें भी घटित हुईं । एक तो मैंने मणि कौल के कहने पर योगवासिष्ठ पढ़ी। हमारे उस्ताद ने मुझे योगवासिष्ठ की एक कहानी सुनाई थी - गाधि ब्राह्मण की कहानी। वह कहानी जब मैंने सुनी थी तो समय का एक ऐसा स्वरूप मेरे सामने आया कि जिन समय के धागों से मैं बँधा हुआ खड़ा था, वे सारे धागे टूट गए। उस दिन उस कहानी ने मुझे इतनी गहराई से आलोड़ित किया कि समय की बँधी-बँधाई, एकरेखीय धारणा मेरे भीतर से निकल गई।
बहुत सारे ऐसे भी पढ़ने वाले हो सकते हैं, जिनको यह कहानी न मालूम हो। थोड़ा सा उसका ज़िक्र कर दें, उनके लिए।
हाँ -हाँ मैं ज़रूर सुनाता हूँ। यह कहानी है गाधी ब्राह्मण नाम के एक चरित्र की। वह भक्ति करता है और विष्णु से यह आग्रह करता है कि ‘मुझे माया का स्वरूप पता लगे’। विष्णु कहते हैं कि ठीक है, एक समय आएगा जब तुम्हें माया का स्वरूप पता लग जाएगा। उसके बाद वह घूमता रहता है। एक दिन वह एक सरोवर में नहाने जाता है। जब वह नहाने जाता है तो उसकी मृत्यु हो जाती है और वह पानी के नीचे ही रहना शुरू कर देता है । उसे नज़र आता है कि उसका पुनर्जन्म होता है। पास में एक गाँव है और इस बार वह एक डोम के घर में पैदा होता है। वहीं बड़ा होता है, उसके बाल-बच्चे होते हैं, पोता-पोती होते हैं। उसके बाद वहाँ अकाल पड़ता है। अकाल पड़ने के बाद वह गाँव छोड़ देता है और एक ऐसे प्रदेश में, एक ऐसे राज्य में जाता है जिसमें केवल ब्राह्मण रहते हैं। उस समय उस राज्य का राजा मर गया है। एक हाथी घुमाया जा रहा है कि वह जिसको भी अपनी पीठ पर बिठा लेगा, वह राजा हो जाएगा। वह हाथी इस डोम को अपनी पीठ पर बिठा लेता है और वह राजा बन जाता है। राजा बनकर वह थोड़े समय तक राज्य करता है। उसके बाद उसके गाँव के कुछ लोग वहाँ आते हैं। जब वे उसके करीब आते हैं तो देखते हैं कि ये तो उनके गाँव का व्यक्ति है और इसका डोम होना उजागर हो जाता है। ब्राह्मणों को लगता है कि यह तो बहुत बड़ी गलती हो गई ,यह तो डोम राजा है । उन्हें लगता है कि हमने गलती की है, इसलिए वे एक चिता बनाते हैं और उसमें कूदने लगते हैं। डोम राजा सोचता है कि जिस राजा के राज्य के नागरिक आत्महत्या कर रहे हों, वहाँ राजा को जीने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए। यह भी उनके साथ आग में कूद जाता है। जब यह आग में कूदता है तो सरोवर में डूबे हुए गाधी ब्राह्मण को गर्मी लगती है। वह बाहर आता है। बाहर आकर वह सोचता है कि मैंने तो बस दो क्षण पानी के भीतर बिताए और मैंने इतना बड़ा जीवन देख लिया। उसके बाद वह यह सोचता हुआ घर आ जाता है। कुछ दिनों बाद एक युवा ब्राह्मण बालक उसके पास कुछ सवाल पूछने आता है। वह कोई विद्वान है। वह लड़का बहुत दुबला है। गाधी ब्राह्मण उससे पूछता है कि तुम इतने दुबले क्यों हो? वह कहता है कि मैं चांद्रायण व्रत कर रहा हूँ। गाधी पूछता है कि यह क्या होता है? वह कहता है कि मैं घूमते-घूमते एक राज्य में पहुँचा और वहाँ मुझे पता लगा कि वहाँ का राजा डोम बन गया था। उसके चलते वहाँ के सारे नागरिकों ने आत्मदाह कर लिया और राजा भी उसमें कूद गया। इस दुख में कि एक देश के नागरिक और राजा ने आत्मदाह किया है, हम यह व्रत कर रहे हैं। इसलिए मैं दुबला हो गया हूँ। तो गाधी ब्राह्मण को एकदम झटका लगता है कि कहाँ तो मैं उस घटना को सपना समझ रहा था और कहाँ यह घटना वास्तव में हुई है। यानी दो यथार्थ एक साथ अलग-अलग समय में चल रहे थे, जिनका एक-दूसरे से संबंध होते हुए भी उनकी सक्रियताएँ अलग-अलग थीं। यह कहानी जब मणि ने मुझे सुनाई तो मुझे वास्तविकता का स्वरूप ही एकदम भिन्न लगने लगा । मुझे अपने अंदर एक गहरी स्वतंत्रता महसूस हुई। एक लेखक जैसा चाहे, वैसे समय को बुन सकता है। मानवीय सत्य को जानने के अनेक तरीकों में यह भी एक तरीका है। और ऐसी कथा-परंपराएँ भारत में अनेक रही हैं। आप स्वयं जानते हैं। Arabian nights में भी इस तरह की चीज़ें थीं। इसके बाद संयोग से मैंने Jorge Luis Borges, जो Argentina के लेखक हैं, उनकी एक कहानी पढ़ी। उसका नाम था ‘THE WIZARD POSTPONED’ । उसमें एक जादूगर है। वह अपने नीचे के कमरे, यानी तहखाने में आकर बैठता है। तभी चर्च का एक Dean, जो चर्च में सबसे छोटा अधिकारी होता है, उसके पास आता है और कहता है कि जादूगर, तुम मुझे कम से कम अपने जिले का थोड़ा बड़ा पादरी बनवा दो, Priest बनवा दो। वह कहता है, चलो मैं कोशिश करता हूँ। मैं Bishop से बोलता हूँ, शायद वह तुमको Priest बना दे। वह उसको Priest बनवा देता है। जाते-जाते जादूगर अपनी नौकरानी से कहता है कि भाई, थोड़ा दलिया बनाना और नीचे चला जाता है। फिर वह Priest उसके पास आता है और कहता है कि Priest होने से तो कुछ नहीं होता ,Bishop मुझ पर हुकुम चलाता रहता है, मुझे Bishop बनवा दो। वह कहता है कि अच्छा, मैं Cardinal से कहता हूँ, वह तुमको Bishop बना देंगे। Cardinal से कहकर वह उसे Bishop बनवा देता है। फिर वह Bishop कुछ दिनों बाद आता है और कहता है कि मुझे Cardinal बनवा दो। फिर वह Pope से कहता है और उसे Cardinal बनवा देता है। उसके बाद वह अंततः Pope बन जाता है। जब वह Pope बन जाता है और Vatican शहर में पहुँच जाता है, तो जादूगर उसके पास जाता है और कहता है कि चलो, अच्छा हुआ अब तुम Pope बन गए। लेकिन Pope उसको अकड़ दिखाता है और कहता है – तुम कौन हो? तुम यहाँ कैसे आए? तुम यहाँ से जाओ। जादूगरों का यहाँ क्या काम? हमारी पूरी bureaucracy में तुम्हारा क्या काम है? जादूगर कहता है, अच्छा चलो, मैं चला जाता हूँ। लेकिन कम से कम मुझे खाना तो खिला दो। मैंने तुमको Dean से Pope बना दिया। वह कहता है – मैं तो अपनी योग्यता से बना हूँ। मैं तुम्हें कोई खाना-वाना नहीं दे रहा। तुम जाओ यहाँ से। जैसे ही वह कहता है कि मैं तुम्हें कोई खाना नहीं दे रहा , उतने में जादूगर कहता है – अरे भाई, मुझे कम -से -कम वो दलिया तो ला दो जो मैंने अपनी नौकरानी से बनाने को कहा था । ठीक उसी वक्त Dean देखता है कि वे दोनों उसी तहखाने में खड़े हैं और नौकरानी दलिया लेकर वहाँ आ रही है।
यह कहानी और गाधी ब्राह्मण की कहानी – इन दोनों को जब मैंने एक साथ पढ़ा, तो कहानी लिखने का मेरे भीतर भाव आया और मैंने ये निश्चय किया कि मुझे लिखना चाहिए। इन दो घटनाओं ने मेरे लिखने के ढंग को- कविताएँ लिखने के ढंग को भी और कहानी लिखने के ढंग को भी बहुत गहराई से प्रभावित किया। उसके बाद मुझे याद है, जिस दिन निर्मल वर्मा भोपाल छोड़कर दिल्ली जा रहे थे जो यहाँ Writer-in-Residence होते थे, मैं भागता-भागता अपनी कहानी का तीसरा ड्राफ्ट, जो हाथ से लिखा हुआ था, उन्हें देने स्टेशन पहुँचा था। पाँचवें दिन निर्मल वर्मा ने वह कहानी पढ़कर मेरे पास संदेश भेजा। उसकी पहली पंक्ति थी – “मैं तुम्हारी कहानी एक रो में पढ़ गया।”
वो कौन-सी कहानी थी?
वो ‘Identity Card’ नाम की कहानी थी।
अच्छा! यह किस संकलन में आई?
पहले ‘सुदेशना’ नाम के संकलन में भी और फिर ‘एक किनारे का घर’ में भी । दोनों में है। यह पहली कहानी थी। और वो मेरे लिए बड़ी भारी सीख भी थी, निर्मल जी का वो पत्र। क्योंकि उस पत्र में उन्होंने एक अद्भुत बात लिखी थी। उन्होंने कहा था कि कहानी में वर्णन उसकी आत्मा होती है। इस कहानी में तुम्हें और वर्णन लिखने की कोशिश करनी चाहिए थी। आगे तुम यह करना। अभी जो तुमने किया है, वह पर्याप्त है। अब जब तुम आगे कहानियाँ लिखो तो यह ख़याल रखो कि कहानी की आत्मा विवरणों और वर्णनों में बसती है, तफ़सील में बसती है। यह कहानी की बुनियादी चीज़ है। कहानी बिना विवरण के किसी एक विचार में, जो भले ही अच्छा विचार हो, संकुचित हो जाती है। उसको देह नहीं मिलती । कहानी में उस वैचारिक अंतर्दृष्टि को शरीर मिलना चाहिए। तुम्हारा काम सिर्फ अंतर्दृष्टि देना नहीं है, तुम्हारा काम उसको एक समूचा, मांसल देह देना भी है। और मेरे उस्ताद की ये बात मुझे याद रही ।
ये जो Borges की कहानी है और दूसरी कहानी है गाधी ब्राह्मण की ,इन दोनों के माध्यम से काल की अवधारणा को लेकर तो बहुत रोचक बात सामने आईं । मुझे लगता है कि आपकी कहानियों और कविताओं या लगभग समूचे लेखन में काल के साथ आपका एक बड़ा, अयथार्थवादी किस्म का संबंध है । लेकिन काल की एक पोसीटिविस्ट समझ भी होती है । उसका बाज़ार हिंदी में बहुत बड़ा है। वो अभी भी चल रहा है। तो काल का जो बंधन एक पोसीटिविस्ट समझ से तैयार होता है, उससे मुझे लगता है कि आपको इन दोनों कहानियों के माध्यम से एक मुक्ति मिली। कोई कहानी या कविता अपनी आप बताना चाहेंगे, जिसमें आपने भी ऐसा कुछ करने का प्रयास किया हो ।
हाँ। मेरी तीसरी या चौथी कहानी थी – ‘सुदेशना’। उसी नाम से मेरा संग्रह भी था।
उससे जुड़ा हुआ एक छोटा-सा किस्सा था। मुझे शुरुआती दौर में ये पता नहीं होता था कि आपको अपनी कहानी के मर्म की चर्चा नहीं करनी चाहिए। मैं 24–25 बरस का था, तो मैं मदन को भी बता देता था, अपने दोस्तों से भी कह देता था कि देखो, ऐसा है , मैं ऐसी कहानी लिख रहा हूँ और इसमें मैं यह कर रहा हूँ। ये मुझे बहुत बाद में पता चला कि कुछ चीजें नहीं बताईं जाती ।
फिर दूसरे लोग कभी -कभी उसी पर लिखने लग जाते हैं ।
हाँ। ऐसा ही होता था । हालांकि मुझे बाद में यह भी समझ या गया कि उससे फर्क कुछ नहीं पड़ता । और ऐसी गलती Borges भी करते थे । तो मुझे लगा कि नहीं, मेरी गलती की तो एक अच्छी वंशावली है, इसमें इतनी भी कोई बुराई नहीं [हँसते हैं] । तो एक कहानी है, ‘सुदेशना’। उसमें एक लड़का स्कूटर पर बैठकर अपनी मित्र से मिलकर लौट रहा है। उसकी जेब में एक कविता लिखी हुई है। उसके स्कूटर को तीन गुंडे रोक लेते हैं। उस कविता के सहारे वे उस लड़की तक पहुँचना चाहते हैं। तो वह लड़का उनको एक कहानी सुना देता है। वह एक काल्पनिक लड़की का ज़िक्र करता है, जिसका नाम उसने और उसकी प्रेमिका ने अपनी बातचीत में अपनी संभावित बेटी के लिए रखा हुआ है। ये लोग उस लड़की तक पहुँच जाते हैं, यानी भविष्य में चले जाते हैं। लेकिन वह ऐसा भविष्य है जो घटता ही नहीं है। फिर वहाँ से लौटते हैं। जब मैंने यह कहानी लिखी, उस वक्त संयोग से निर्मल वर्मा दो साल बाद फिर भोपाल आए थे और एक हफ्ते के लिए वहीं ठहरे थे। मैं पहले एक कहानी लिखकर खत्म कर चुका था। फिर पाँच, छह, सात ड्राफ्ट बनाए हुए थे, जितना मैं बनाता ही था । उस दौरान वह टाइप हो रही थी। निर्मल जी अपने बड़े भाई रामकुमार जी के साथ भोपाल में ही रह रहे थे। मैंने उन्हें कहानी दी। वैसे तो मैं उनको पोस्ट कर देता था। निर्मल जी और रामकुमार जी, दोनों ने उसे पढ़ा। फिर जब मैं उनसे मिलने गया तो निर्मल जी ने मुझसे वह वाक्य कहा, जो तब तक उन्होंने मुझसे कभी नहीं कहा था। उन्होंने कहा – “ Now this is a perfect story.” उन्होंने कहा कि अब तुम्हारा वर्णन बराबर हो गया है और बाकी सब चीज़ें भी ठीक हैं । यह मेरे कहानी -लेखन के जीवन में एक तरह से मील का पत्थर था। इससे कहानी लिखने पर और fictional गद्य लिखने पर मुझे भरोसा आया। रामकुमार जी भी उसके बारे में बोलते रहे। वे थोड़े आलोचनात्मक थे, बहुत बोलते नहीं थें , लेकिन वे अपना उल्लास और अपना आनंद बताते रहे। फिर निर्मल जी ने भी थोड़ी-बहुत बात की। एक तरह से निर्मल जी जैसे लेखक की प्रतिक्रिया से एक भरोसा आया। दूसरी बात यह कि जो चीज़ उन्होंने उसमे देखी वह ये कि उसमें एक किस्म की भारतीय कथा-परंपरा थी, जो realistic कहानी से टूटी हुई थी। वह हमारे यहाँ पहले से ही थी और वर्तमान तक एक तरह से चली आई थी। उस कहानी ने, मैंने नहीं, उस कहानी ने एक तरह से 20वीं शताब्दी के परे जाकर एक पुल बनाने का प्रयास किया था। और उस समय हमारे सबसे बड़े कहानीकारों में, दुनिया के बड़े कहानीकारों में निर्मल वर्मा गिने जाते थे। उन्होंने उसमें कुछ बात देखी थी तो थोड़ा भरोसा आ गया और फिर मैं ज़्यादा खुले रूप में लिखने लगा, संकोच थोड़ा कम हो गया।
बिल्कुल। तो आपके चार कहानी-संग्रह हैं – ‘सुदेशना’, ‘दूर देश की गंध’, ‘सातवाँ बटन’ और ‘रेत किनारे का घर’। तो इन चार कहानियों का अभी तक का जो सफर है, अगर आज आप इसे देखें तो आपको कौन-से ऐसे मोड़ या पड़ाव नज़र आते हैं, जहाँ आपकी रचनात्मक यात्रा में कोई ऐसा shift दिखाई पड़ता हो, जिसको अलग से रेखांकित किया जा सके ।
एक तो, जैसा आपने कहा और फिर मैंने कहा कि समय के साथ जो संबंध था, वह गैर-यथार्थवादी बन गया। हालाँकि मैं उसको यथार्थ मानता हूँ। समय का स्वरूप वही है।
हाँ, एक आयाम में तो मनुष्य जीता नहीं है कभी भी ।अनेक आयामों में एक साथ जीता है ।
एक कहानी मैंने लिखी थी, ‘दस्तक’। आप समझिए सात–आठ बरस बाद। उस ‘दस्तक’ कहानी में कैसे एक जीवन दूसरे जीवन में उद्घाटित होने लगता है – मानो एक जिया गया जीवन दूसरे जीवन में खुलने लगता है, ऐसी बात उस कहानी में आई। वह साप्ताहिक हिंदुस्तान में छपी थी। जब मैंने कहानी भेजी, मृणाल पांडे उसकी संपादक थीं। उन दिनों हिन्दुस्तान से एक छोटा-सा सफेद कार्ड आता था, जिसमें उन्होंने कहानी को स्वीकार किया था। उसके बाद उनकी एक अलग चिट्ठी आई थी, जिसमें उन्होंने मेरे बच्चों के बारे में पूछा था, क्योंकि तब तक पत्नी की मृत्यु हो गई थी। उन्होंने पूछा था कि बच्चे ठीक हैं या नहीं, बाल-गोपाल कैसे हैं? ऐसा वाक्य था उसमें । वह अलग लिफाफे में था। तब तक मेरी कहानी ‘दस्तक’ छप गई थी। तो यह एक ऐसी कहानी थी, जिसे लिखकर मुझे बहुत संतुष्टि मिली। तीसरी एक ऐसी कहानी थी – ‘वेनाम’ – जिसमें एक ही साथ दो-तीन समय चल रहे हैं। मैं हमेशा कोशिश करता था कि मैं जो कहानी लिखूँ उसमें समय का धागा तो टूटे ही , लेकिन दो-तीन-चार समय भी एक साथ चलें। संभवतः यह इच्छा मेरे cinema से बहुत गहरे लगाव के कारण पैदा हुई होगी, क्योंकि cinema में यह संभव है कि आप दो-तीन समय एक साथ चला दें। जब लिखना शुरू किया तो मैं इसके बारे में सोचने लगा और मेरे दिमाग में यह कहानी आई और दो-तीन समय एक साथ आकर खड़े हो गए, तो मैं उसको बारी-बारी लाने की जगह एक साथ ले आया। एक वाक्य इस समय का, दूसरा इस समय का, तीसरा इस समय का। इस तरह मैंने उसको लिखा। आपको बड़ी आश्चर्य की बात लगेगी कि निर्मल वर्मा जैसे इतने sensitive पाठक को भी लगा कि यह कहानी कितनी मुश्किल हो गई है। लेकिन दूसरी तरफ मणि कौल उस कहानी के प्रति बहुत आकर्षित हुए। बल्कि उस पर एक फिल्म बनाने के लिए script भी लिखी गई थी, लेकिन producer ने पैसा उतना दिया नहीं, इसलिए वह बन नहीं पाई। तो मेरे लिए वह एक ऐसी कहानी रही जिसमें तीन-चार समय एक साथ चल रहे हैं और पाठक भी उसको पढ़ते समय तीन-चार tracks एक साथ पढ़ रहा है। जैसे हम लोग जीवन में जीते हैं।
बिल्कुल।
हम फोन पर अपनी माँ से बात कर रहे होते हैं, फिर अपनी university के भी काम निपटा रहे होते हैं, फिर कुछ सोच भी रहे होते हैं। ये सब हम एक साथ कर रहे होते हैं। कविता में तो होता है, कविता में आप कर सकते हैं, ज़्यादा आसान होता है, लेकिन मैंने ये कहानी में भी करने की कोशिश थी। फिर एक कहानी थी, जिसके नाम पर एक संग्रह भी था – ‘दूर देश की गंध’। उसमें भी एक तरह से ऐसी कहानी थी जिसमें कोई भी चीज़ ठहरती नहीं है। यानी हर चीज़ बह रही है। पूरी कहानी मानो बहती हुई भाषा पर बना हुआ दृश्य हो । वह बिल्कुल एक नया रूपाकार था। उसमें मुझे लगा था कि मैंने कुछ नए ढंग का प्रयास किया है। एक बात यह ज़रूर है, राजकुमार, कि मैंने कभी कोई दो कहानियाँ एक जैसी नहीं लिखीं। यानी मैं यह नहीं कह सकता कि साहब, मेरी कहानियों का स्टाइल ये है ।
हाँ कि ये फार्मूला है इनका, इससे ऐसी कहानी बन जाएगी ।
नहीं, बिल्कुल नहीं। उसका सीधा कारण है कि जैसा मैं आपसे कह भी रहा था कि यह जो घर है साहित्य नाम का, हर बार मुझे यह घर जब ढूँढ़ना पड़ता है तो मेरे सामने एक बहुत बड़ा अरण्य होता है। उसमें से अलग-अलग घरों में प्रवेश करता हूँ, जहाँ मुझे at home लगता है, घर लगता है। वहीं ठहर जाता हूँ। पहले से कुछ तय नहीं होता। एक अच्छा भाव आता है, जिसको सबसे अच्छा अभिनव गुप्त ने कहा। अभिनव गुप्त ने कहा – भावनाओं का, भाव का, सृजनात्मक भाव का छलक जाना, उसका spill होना । तो जिस क्षण ऐसा होता है, उसी क्षण मैं लिखना शुरू कर देता हूँ। इसलिए मेरे साथ रहना जैसा अल्पना कहती हैं या पहले अंजना कहती थीं, बहुत ही कठिन है। क्योंकि मैं तीन बजे उठकर लिखने लगता हूँ, दो बजे उठकर लिखने लगता हूँ। इसमें कोई romanticism नहीं है, एक तरह की व्यवहारिकता है। क्योंकि वह भाव निकल जाएगा हाथ से। अगर वह निकल गया तो फिर निकल गया। इसी तरह की बात एक कहानी में भी हुई, जो मैंने हाल में, दो-तीन साल पहले लिखी थी, जिसका नाम था ‘Metro’। उसमें हम लोगों के यहाँ, मेरे ख़याल से बिहार के किन्हीं इलाकों में, यह लोकोक्ति है कि आपको हाथ किसी को भी नहीं दिखाना चाहिए, क्योंकि हाथ देखते हुए कई बार आपका भविष्य चोरी किया जा सकता है। तो अगर भविष्य चोरी हो जाए तो क्या हो? धीरे-धीरे इस बात से पूरी एक कहानी बन गई। वह कहानी Paris में located है। संभवतः मेरी प्रतिभा ने ऐसा किया होगा कि इसको सबसे rational जगह में locate करूँ – France, जो Descartes की भूमि है – और वहीं उस चरित्र का भविष्य चोरी होता है। कहानी पूरी एक metro train में घटित होती है। उसमें युद्ध को लेकर और प्रेम को लेकर भी कईं सवाल हैं। मेरी जिज्ञासा बहुत है। जब कोई भी बात बहुत सहज रूप से मेरे मन में आती है तो मैं उसमें बहुत गहराई तक जाने की कोशिश करता हूँ। यह जानने की कोशिश करत हूँ कि जिन मूल्यों की हम बात करते हैं, उनका तात्विक कथ्य क्या है? मान लीजिए मैं कहता हूँ ‘राष्ट्र’। मेरी बहुत रुचि है यह जानने में कि यह ‘राष्ट्र’ शब्द सबसे पहले जब इस्तेमाल हुआ था तो उसके क्या आशय थे? जैसे वेद में ‘राष्ट्र’ शब्द का इस्तेमाल होता है। आपको शायद पता ही होगा कि RSS ने अक्सर कहा कि nationalism शब्द यूरोप से नहीं आया है, राष्ट्र तो हमारा शब्द है। लेकिन उस राष्ट्र का वह अर्थ नहीं था । वेद में राष्ट्र का अर्थ nation जैसा नहीं था। nation का अर्थ ऐसे लोगों का समुदाय है जो एक से विश्वास रखते हैं, एक भाषा बोलते हैं, एक धर्म मानते हैं। राष्ट्र का अर्थ था समृद्धि। ऐसे लोग जो समृद्ध हैं – विचारों में समृद्धि है, दृष्टियों में समृद्धि है, जिनकी चाल-चलन में समृद्धि है। राष्ट्र में समृद्धि का विषय है। तो वह nationalism के ठीक उलट है। इसलिए मैं राष्ट्र शब्द की खोज में ज़रूर जाऊँगा। या जैसे शब्द का इस्तेमाल होता है कि ‘हम हिंदू राष्ट्र बना रहे हैं’, तो इस पर मैंने बहुत सोचा और ढूँढ़ा कि यह तथाकथित हिंदू राष्ट्र बनेगा तो उसका content क्या होगा । इसमें राजसत्ता का स्वरूप क्या होगा? क्या वह केंद्रित होगी या विकेंद्रित होगी? अगर केंद्रित होगी तो क्या वह यूरोपियन ढंग के आज के nation-state की तरह होगी? अगर उसकी तरह है, तब तो वह राष्ट्र बना ही नहीं । न गौतम स्मृति का राष्ट्र हुआ, न याज्ञवल्क्य स्मृति का राष्ट्र हुआ, न किसी भी पारंपरिक दृष्टि में राज्य को देखने का जो तरीका था, वह हुआ। भारत में जो राज्य रहे, जैसे मृच्छकटिकम् में आता है कि एक राजा अत्याचार कर रहा था तो आर्यक ने अपने लोगों को जोड़-जाड़कर राजा को हटा दिया। कभी भी इतना शक्तिसंपन्न राजा नहीं होता था कि उसे हटाया न जा सके। क्या ऐसा राज्य होगा? और उसमें शक्तियाँ पंचायतों के पास हों तो कैसा राज्य होगा? मुझे बहुत आश्चर्य होता है कि इस बात का उपयोग करने वाले, विरोध में हों या पक्ष में, दोनों को इसके content का कुछ पता नहीं है कि यह है क्या। इसी तरह मुझे इन तत्वों, इन प्रत्ययों की गहराई में जाने में एक स्वाभाविक रुचि है। तो इन कहानियों में, उदाहरण के लिए ‘Metro’ कहानी है, इसमें उसका पात्र समझने की कोशिश कर रहा है कि युद्ध में होता क्या है? युद्ध प्रेम पर कैसा असर डालता है? मानवीय भावनाओं पर कैसे असर डालता है ?लोग मरते-खपते हैं, घायल होते हैं, इमारतें टूटती हैं, व्यवस्थाएँ नष्ट होती हैं । हम आज ईरान और इज़राइल के युद्ध में देख ही रहे हैं। लेकिन इसका मानवीय भावनाओं पर क्या असर होता है, उस पर यह कहानी एक तरह से बात करती है। इस अर्थ में यह एकदम नई कहानी थी।
जहाँ एक व्यक्ति का भविष्य चुरा लिया जाता है।
बिल्कुल, उसके भविष्य का जैसे कैसे अपहरण कर लिया जाता है। और उसके आलोक में बहुत सारी चीज़ें होती हैं। तो एक तरह की खोज की वृत्ति इन चीज़ों के प्रति इन कहानियों में रही है।
और अंतिम कहानी में मैं समझने की कोशिश कर रहा हूँ कि जिसको हम प्रेम कह रहे हैं, उसका क्या स्वरूप है। इस कहानी में जो भेंट मुझे लिखने के बाद मिली, वह यह है कि प्रेम एक बहुत गहन संवाद है। यह ऐसा संवाद है जो दोनों को चमत्कृत करता है। इसलिए यह कहानी प्रेम कहानी होते हुए भी एक तरह से एक ऐसी कहानी है जिसमें जानना बिल्कुल केंद्र में है। एक लड़की अपनी जिज्ञासा के वशीभूत एक जगह जाकर एक व्यक्ति के नज़दीक रहती है । तो इन अलग-अलग किस्म की कहानियों के ज़रिए मैंने जीवन में कई चीज़ें जानी हैं।
इसमें तो एक बड़ी दिलचस्प बात आपने की है । आधुनिकता के साथ तो प्रायः संवाद का स्वरूप बदल जाता है। संवाद भी ज्यादातर संवाद नहीं रहता, वह एक आयामी हो जाता है।
बिल्कुल।
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