प्रश्न-विभाजन जैसे इतिहास को , कथा में रूपांतरित करना आसान नहीं होता। एक ओर इतिहास के तथ्य हैं और दूसरी ओर मनुष्य की स्मृतियाँ , जिनमें भावन...
प्रश्न-विभाजन जैसे इतिहास को, कथा में रूपांतरित करना आसान नहीं होता। एक ओर इतिहास के तथ्य हैं और दूसरी ओर मनुष्य की स्मृतियाँ, जिनमें भावनाएँ और कल्पना भी घुली रहती हैं। बस्तियों का कारवाँ लिखते समय आपने इतिहास और मानवीय स्मृति के बीच संतुलन कैसे बनाया? क्या कभी इतिहास की तथ्यनिष्ठता और कथाकार की कल्पनाशीलता के बीच तनाव भी पैदा हुआ?
उत्तर-एक
सांस्कृतिक मानवीय स्मृति में पौराणिकता घुली-मिली रहती है। झूलेलाल का चरित्र
इतिहास और पौराणिक प्रकृति की कल्पना के मिश्रण से बना है। इसी तरह से प्राचीन
सिंधी प्रेम कहानियाँ हैं। मेरी समझ में इतिहास एक तथ्यान्वेषी विद्या है और पुराण
एक अलग मनोगति है, और दोनों अपनी इयत्ताओं में
स्वतंत्र हैं। किंतु किसी संस्कृति का निर्माण केवल इतिहास द्वारा नहीं होता,
उसमें मानव जाति के अचेतन मन में संरक्षित आद्यविम्बों की बड़ी
भूमिका रहती है। मैं सिंधी समुदाय के बारे में लिख रहा था, अतः
मेरे लिए ज़रूरी था कि न केवल मैं उसके इतिहास को खंगालूँ, वरन्
उसके पौराणिक जगत में भी प्रवेश करूँ। मुझे इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करने
में कोई दिक्कत नहीं हुई क्योंकि अन्ततोगत्वा मैं एक मानवीय संस्कृति के बारे में
लिख रहा था। हर सांस्कृतिक समुदाय की तरह सिंधी समुदाय ने भी दंतकथात्मक कल्पनाओं
द्वारा ठोस इतिहास को ठस होने से बचाया है। मेरा उपन्यास न केवल इतिहास का लेखपत्र
है, वरन् संस्कृति का भी प्रस्तोता है।
आपकी
रचनाओं में स्थानीय जीवन अपने पूरे रंग-रूप के साथ आता है, लेकिन वहीं से कथा का सामाजिक संदर्भ व्यापक होता चला जाता है। क्या आप भी
मानते हैं कि बड़ी कथा अपनी सार्वभौमिकता किसी अमूर्त जगह से नहीं, बल्कि किसी बहुत विशिष्ट भूगोल, समाज और जीवन से
हासिल करती है?
स्थानीय जीवन के
रंग-रूप को मैं बहुत महत्त्व देता हूँ। मेरी एक थोड़ी सी बेजा मान्यता भी है कि
प्रत्येक साहित्यकार के पास न केवल भाषा होनी चाहिए वरन् एक बोली-बानी भी होनी
चाहिए। एक रचनाकार के रूप में मेरी भाषा खड़ी बोली हिंदी है और अवध क्षेत्र का
निवासी होने के कारण मेरी बोली अवधी है। इसका यह अर्थ नहीं है कि खड़ी बोली हिंदी
का रचनाकार अपनी-अपनी बोलियों को, कहानी या उपन्यास में देशज
रंग भरने के लिए उपयोग करे। ऐसा करेंगे तो हिंदी भाषा की सार्वभौम साहित्यिक
स्वीकृति को नुकसान होगा। बस इतनी बोली-बानी चाहिए कि लेखक अपने क्षेत्र के
मुहावरों से परिचित हो। मुझे लगता है कि जिस लेखक के पास अपनी बोली-बानी नहीं होती,
उसकी साहित्यिक भाषा आसवित और क्लीनिकल होती है। अगर बोली-बानी की
बात होती है तो निश्चित रूप से रचना का एक विशिष्ट भौगोलिक चेहरा अवश्य होगा। ज़रूरी
नहीं है कि यह भौगोलिक चेहरा हूबहू किसी ज्ञात स्थल जैसा हो। यह कई स्थलों का
सम्मिश्रण हो सकता है और इतना कल्पनासिक्त भी कि जाना पहचाना सा लगने के बावजूद
किसी नक्शे पर न हो। यहाँ यह बात ज़ोर देकर कहनी चाहिए कि साहित्य की संस्कृति
अमूर्त नहीं है, परंतु वह कोई मूर्तित बाज़ार भी नहीं है।
आज का
मनुष्य जिस सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था
में जी रहा है, उससे पूरी तरह अलग रहकर लिखना शायद संभव
नहीं। ऐसे में क्या समकालीन लेखक के लिए राजनीति से दूरी बनाना वास्तव में संभव है?
या राजनीति से दूरी बनाने का दावा भी अपने आप में एक राजनीतिक
स्थिति है?
मेरे विचार में
राजनीतिक चेतना के बिना किया गया कोई भी साहित्यिक सृजन एक भाषिक विलासिता है।
इससे भी आगे जाकर में यह कहना चाहूँगा कि अराजनीति भी एक रणनीतिक राजनीति है।
राजनीति शास्त्र के विद्यार्थी यह जानते हैं कि अनारकिज़्म जिसका प्रचलित अनुवाद
अराजकतावाद है एक राजनीतिक सिद्धांत है जो मोटे तौर पर शासक और शासित की व्यवस्था
को नकारता है और यह मानता है कि आपसी सहयोग से समाज का संचालन किया जा सकता है। इस
पारिभाषिक अनुवाद से किंचित असहज होते हुए मैंने इसे राजनिषेधवाद की संज्ञा दी है।
मेरे मतानुसार यह राजनिषेधवाद एक मधुर, स्वप्निल
किंतु ग़ैरजिम्मेदार अवधारणा है क्योंकि समाज और राजव्यवस्था एक दूसरे पर निर्भर
है। चूँकि एक लेखक का राजनीतिक चेतना से संपन्न होना एक अनिवार्यता है, इसलिए यह स्वाभाविक है कि वह उक्त चेतना के वाहक राजनीतिक दल के प्रति
सहानुभूति रखे। परंतु यदि कोई लेखक किसी दल विशेष का प्रचारक बन जाए तो वह अपनी
साहित्यकार की भूमिका का निर्वहन नहीं कर पाएगा। मेरी समझ में लेखक को अपनी
राजनीतिक चेतना का पक्षधर होना चाहिए किंतु एक सार्थक साहित्यिक बोध के लिए उसके
पास प्रतिपक्ष के अंतरतम की भी पहचान होनी चाहिए जिसके लिए उसकी बुद्धि के कपाट
खुले रहने चाहिए। उसे अपनी राजनीतिक चेतना को लगातार साफ करते रहना चाहिए, क्योंकि एक साहित्यकार अगनास्टिक (अज्ञेयवादी) राजनीति का समर्थक नहीं हो
सकता है। प्रेमचंद की 'शतरंज के खिलाड़ी' कहानी एक दस्तावेज़ है जो हमें आगाह करती है कि समय-सापेक्ष राजतनीतिक
चेतना का अभाव कैसे एक समाज को पराभूत कर सकता है। अगर उसके पास यह समझदारी नहीं
है तो वह किसी मसीहाई शासन का पिछलग्गू भक्त बन जाएगा। उसे तो अपनी विचारधारा को
भी प्रश्नाकुल करते रहना चाहिए। रीतिकाल के बड़े कवि राज्याश्रय में रहते थे।
बिहारी भी इसका अपवाद नहीं थे। किंतु उस समय भी उन्होंने अपने आश्रयदाता राजा को
चेताया-
'अली कली सौ ही
बंध्यो, आगे कौन हवाल'।
हमारे लोकतंत्र में इस
स्वतंत्र चेतना का निर्वाह हर लेखक को गाहे-बगाहे करना चाहिए भले ही उसकी दलीय
निष्ठा कहीं भी हो। एक लेखक के लिए सक्रिय राजनीति में होना आवश्यक नहीं है। हाँ, उसे समकालीन राजनीति को गौर से देखते रहना चाहिए। जी चाहे तो सक्रिय
राजनीति से दूरी रखिए लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षण और अध्ययन से नहीं। मतदान करना
में एक कर्तव्य समझता हूँ और जब मैं मतदान करता हूँ तो उस क्षण राजनीति ही तो कर
रहा हूँ। राजनीति में समाजनीति और अर्थनीति समाहित है। यदि समकालीन राजनीति को कोई
कथाकार नहीं समझेगा तो उसकी साहित्यिक अभिव्यक्ति में व्यष्टि और समष्टि के परस्पर
संबंधों का सम्यक निर्वाह नहीं हो पाएगा।
भूमंडलीकरण, उदारीकरण और बाज़ारवाद ने हमारे परिवार, रिश्तों,
जीवन-शैली और मनुष्य की आकांक्षाओं को बहुत प्रभावित किया है। आपकी
दृष्टि में समकालीन हिंदी कहानी ने इन बदलावों को कितनी गंभीरता से आत्मसात किया
है? क्या कहीं हमें लगता है कि बाज़ार की गति के सामने
साहित्य की दृष्टि थोड़ी पीछे रह गई है?
आपने जितने वाद गिनाये
हैं वह सभी बहुराष्ट्रीय पूँजीवाद की सयानी संरचनायें हैं,जिसके परदे में सक्रिय
नवउदारवादी और नवउपनिवेशवादी वैश्विक पूँजी एक ऐसी साहित्य की समर्थक है जिसमें
जनाकांक्षा और जनसक्रियता के प्रति कोई सहानुभूति नहीं है।
साहित्य किसी भी वाद का
कोई प्रतिस्पर्धी उपकरण नहीं है कि वह इनके बराबर दौड़ने का प्रयास करे। साहित्य
का कार्य इन वादों की सामाजिक गतिकी को बूझना और परखना है और उसे रचनात्मक स्वर
देना है। रचनात्मक स्वर देने से मेरा आशय उस अभिव्यक्ति से है जो इन वादों के शास्त्रीय
अध्ययनों का साहित्यिक रुपान्तरण न हो, वरन् इनकी
हलचलों को, मनुष्य और उसके परिवेश के अंतर्संबंधों के
परिप्रेक्ष्य में एक किस्सागो की तरह वर्णित कर सके। ऐसे किस्से ही हमारा सामाजिक
दर्पण होंगे।
आपके
कथा-साहित्य में इतिहास और वर्तमान के बीच एक संबंध दिखाई देता है। व्यक्ति और
व्यवस्था का संबंध भी वहाँ महत्त्वपूर्ण हो उठता है। आपके लिए इतिहास क्या केवल
बीते हुए समय का आख्यान है या वर्तमान को समझने का भी एक जीवंत और सक्रिय उपकरण है?
प्रथमतया वर्तमान तो
पल-प्रतिपल इतिहास की गति को प्राप्त होता रहता है और भविष्य भी अगले क्षण का
वर्तमान है। अतः मेरे लिए इतिहास वर्तमान और भविष्य एक नैरन्तर्य है। मेरी नज़र
में न केवल इतिहास वर्तमान को समझने का एक जीवंत और सक्रिय उपकरण है वरन् वर्तमान
भी इतिहास के पदों को खोलने का एक उपकरण है। द्वितीयतः कोई भी कहानी या उपन्यास
समय-कीलित और समय-अनवरत के बीच चल रहा संवाद होता है, मेरी भी रचनायें इस मान्यता का अपवाद नहीं हैं।
आज का
लेखक सोशल मीडिया, डिजिटल प्रकाशन और तत्काल मिलने
वाली पाठकीय प्रतिक्रियाओं से घिरा हुआ है। एक ओर इससे साहित्य अधिक लोगों तक
पहुँच रहा है, दूसरी ओर शायद लिखने और पढ़ने के धैर्य में
कमी भी आई है। आपके लंबे लेखकीय अनुभव से पूछूँ तो क्या यह डिजिटल परिवेश साहित्य
को अधिक लोकतांत्रिक बना रहा है या साहित्यिक गंभीरता और धैर्य को कहीं कम भी कर
रहा है?
मैं जानबूझ कर सोशल
मीडिया के किसी पोर्टल पर नहीं हूँ क्योंकि यह तुरत-फुरत का साहित्य और साहित्यिक
प्रतिक्रियाएँ मुझे अपील नहीं करतीं। साहित्य को इतना तात्कालिक होने की आवश्यकता
नहीं है। निःसंदेह डिजिटल प्रकाशन के कारण साहित्य अधिक लोगों तक पहुँच रहा है
किंतु उसी मात्रा में साहित्यिक बोध बढ़ रहा है, इसमें
मुझे संदेह है।
क्षमा कीजिए यह कहने के
लिए कि सोशल मीडिया परिप्रेक्ष्यविहीन सूचनाओं की पटेबाजी है और रचना के परिपाक के
प्रति आग्रही लेखक उसे आतिशबाजी की तरह देखेगा, इससे अधिक कुछ
नहीं।
आपकी
भाषा में सहज प्रवाह के साथ दृश्यात्मकता भी दिखाई देती है। आपके लिए साहित्यिक
भाषा की सबसे बड़ी कसौटी क्या है, संस्कृतनिष्ठता,
बोलचाल की जीवंतता, अर्थ की सघनता या पात्र और
परिस्थिति के अनुरूप बदल जाने बाली भाषा?
हाँ, दृश्यात्मकता के प्रति मैं आग्रही हूँ। यहाँ तक दूसरों को पढ़ते समय भी मैं
दृश्य बनाता चलता हूँ। पढ़ना मेरे लिए नाटक देखने और सिनेमा देखने के समान हो जाता
है। मैं भी ऐसा ही लिखना चाहता हूँ कि दृश्य खड़ा हो जाए। मेरा पात्र टूटही साइकिल
से काम चला रहा है या नई नकोर पर लहरा रहा है, मेरे लिए महत्त्वपूर्ण
है। उसी से तो दृश्यमान होगा कि बन्दा किस दौर से गुज़र रहा है। मेरे लिए
साहित्यिक भाषा की सबसे बड़ी कसौटी है अर्थ की सघनता और उससे होने वाला भावबोध।
पात्र या परिस्थिति के अनुसार भाषा बदलती है क्योंकि मैं अवसर के अनुकूल सड़क की
भाषा का भी प्रयोग कर लेता हूँ। भाषा वही अच्छी है जो कथ्य में प्रवाह उत्पन्न करे
और साथ में कथ्य की साहित्यिक गुणवत्ता भी बढ़ाये।
क्या
आपको लगता है कि आज की हिंदी कहानी में भाषा का प्रश्न कथ्य जितना ही महत्त्वपूर्ण
है? अंततः क्या कथाकार की अपनी विशिष्ट भाषा ही
उसकी अलग साहित्यिक पहचान बनाती है?
न केवल आज की कहानी में
बरन पहले की हिंदी कहानी में भी भाषा का प्रश्न महत्त्वपूर्ण रहा है। भाषा कथ्य की
घनिष्ठ सखी है, किंतु वह कथ्य के अनुरूप ही चलती है। उदाहरण
के लिए प्रसाद की कहानियों की भाषा और प्रेमचन्द की भाषा को देखिए। दोनों की भाषा
जितनी अलग है, उतनी ही कथ्य के अनुरूप है।
प्रेमचंद की भाषा की
सरलता और सादगी उनकी विशिष्टता है और प्रसाद की तत्सम भाषा उनकी विशेषता है। चूँकि
भाषा कथ्य की अनुवर्ती है इसलिए दोनों की नखीनख बराबरी संभव नहीं है, किंतु इससे विशिष्ट भाषा का महत्त्व कम नहीं हो जाता है।
मैं आपको धन्यवाद देता
हूँ कि आपने भाषा और शिल्प बनाम विषयवस्तु और विचार की कोईबहस नहीं चलाई, चूँकि वह एक अनुर्वर बहस होती। शैल्पिक सिद्धि विषयवस्तु की लब्धि है।
निषाद द्वारा पक्षी
पहले भी मारे जाते रहे होंगे, किंतु क्रोंच पक्षियों के
जोड़े में से नर की जो हत्या निषाद ने की और जब उसका दुःख श्लोक के रूप में
वाल्मिकी के कंठ से प्रस्फुटित हुआ तो वह साहित्य कहलाया। अतः यह शैल्पिक भाषा ही
है जो रोज़मर्रा के जीवन का उदात्तीकरण कर उसे साहित्य का कलेवर प्रदान करती है।
अगर संवेदना आविष्कृत होती है, जोकि होती ही है, तो उसके साथ भाषा भी अविष्कृत होती है।
आपकी
रचनाएँ वेब-पत्रिकाओं से लेकर मुद्रित साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही
हैं। आपने दोनों माध्यमों को निकट से देखा है। आपके अनुभव में डिजिटल और मुद्रित
साहित्यिक संसार के पाठकों तथा संपादकीय संस्कारों में क्या प्रमुख अंतर दिखाई
देता है?
मुझे डिजिटल साहित्य
में,
मुद्रित साहित्य के मुकाबले सुविचारित साहित्य नीति कम दिखाई पड़ती
है। इसका दूसरा पहलू है कि डिजिटल का संपादक साहित्यिक गुटबंदी को प्रश्रय नहीं
देता है। डिजिटल के पाठक को रचना का सघन पाठ करने के लिये उसका प्रिंटआउट निकालना
पड़ता है, जबकि मुद्रित का पाठक ठहर कर पढ़ लेता है।
आज जब
पाठक के पास पढ़ने के लिए बहुत कुछ है और उसके धैर्य को लेकर लगातार चर्चा होती
रहती है, क्या आपको लगता है कि दीर्घ कहानी ने अपनी
स्वतंत्र साहित्यिक सार्थकता बनाए रखी है? और आपके अनुसार
दीर्घ कहानी और उपन्यास के बीच मूलभूत अंतर क्या है?
दीर्घ कहानी की
साहित्यिक स्वतंत्रता बनी हुई है। हमारे समय को उसकी ज़रूरत है। चूँकि उपन्यास का
फलक विस्तृत होता है, इसलिए उसकी अलग प्रासंगिकता है।
इन दोनों में कोई प्रतिद्वंद्विता नहीं है।
आदिवासी-विमर्श, प्रवासी-विमर्श, वृद्धावस्था, प्रश्न-हिंदी
साहित्य में स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श, बाज़ार और तकनीकी जीवन जैसे अनेक नए विमर्श बहुत मज़बूती से सामने आए हैं।
एक वरिष्ठ कथाकार के रूप में आपको इनमें से कौन-से विमर्श सबसे अधिक जीवंत और
भविष्य को दिशा देने वाले लगते हैं? और क्या आपको लगता है कि
आने वाले समय में कुछ नए विमर्श भी हमारे सामने आएँगे, जिनकी
अभी हम ठीक से कल्पना नहीं कर पा रहे हैं?
वस्तुतः इन विमर्शों पर
बात करते समय हमें अस्मिता के प्रश्न का समाधान करना पड़ेगा। मेरा मानना है कि
अस्मिता की राजनीति को परखे बिना कोई साहित्यिक मूल्यबोध संभव नहीं है।
यह सवाल कि 'मैं कौन हूँ' किसी दलित के लिए कोई तत्वज्ञानी सवाल
नहीं है कि वह धड़ल्ले से उत्तर दे दे कि मैं तो अजर अमर आत्मा हूँ। इसी तरह से आज
के दिन एक स्त्री कथाकार के लिए यह सवाल कि 'मैं कौन हूँ'
कोई बायो सोशल सवाल नहीं है कि पितृसत्तात्मक संरचना वाले समाज की
घोषिता के रूप में वह उत्तर दे दे कि मैं एक उत्पादक पत्नी हूँ, एक महीयसी माँ। वस्तुतः स्त्री विमर्श की किसी सचेत कथा के लिए
पितृसत्तात्मक-मातृसत्तात्मक समाज जैसे युग्म के अंतर्गत स्त्री की निजता की पहचान
नाकाफी है। इसके अलावा अस्मिता और निजता के विमर्श के अपने अन्तर्विरोध भी हैं।
क्या एक हिंदू स्त्री की निजता एकदम वही है जो एक गैरहिंदू स्त्री की है। सीधा सा
उत्तर है, नहीं। यहाँ धार्मिक निजता लैंगिक निजता में
हस्तक्षेप करती हैं। इसी प्रकार जातीय और धार्मिक निजता भी इकहरी नहीं है। एक ही
धार्मिक समुदाय के अंदर कई पंच और जातियाँ हैं जिनमें अपने घर्षणबिंदु हैं। एक
अस्मिता कई उपअस्मिताओं को जन्म देती है जिनमें आपसी द्वंद्व हैं। जाहिर है कि
अस्मिता के यह सवाल आसान नहीं हैं लेकिन जो दुश्वारियाँ हैं, वही तो लेखकों की नई पीढ़ी की उपलब्धियों की कारक बनेंगी।
यह बड़े संतोष की बात
है कि जनजातियाँ(आदिवासी समाज) अब हमारे कथाविमर्शों का प्रभावशाली हिस्सा बन गई
हैं। पहले तो ग़ैर आदिवासी समाज के लोग अनुग्रहपूर्वक इस समाज से पात्र और भूक्ष्य
लेकर कथा बाँचते थे. परंतु इधर एक बहुत अच्छा परिवर्तन हुआ है कि ख़ुद आदिवासी
समाज के लेखक हिंदी में अपना किस्सा बयाँ करने में लगे हैं। मेरे विचार में
आदिवासी विमर्श का कथासाहित्य आगे तक जायेगा। इसकी दंतकथाएँ और लौकिक में अलौकिक
की छवि देखने की क्षमता भविष्य में कदाचित कुछ क्लासिक रचेगी।
आने वाले समाज में
तकनीक के विमर्श से प्रभावित लेखन भी आएगा। वह किस प्रकार का होगा, मुझे कोई अंदाज़ा नहीं है। हाँ, इतना ज़रूर मैं
जानता हूँ कि इधर काफ़ी समय से वैज्ञानिक चिंतन और तकनीकी क्षमता के बीच दूरी आ गई
है। जो तकनीकी संस्कृति चंद्रयान भेज रही है, वही तरह-तरह से
सार्वजनिक धार्मिक अनुष्ठान कर रही है जिनका वैज्ञानिक चिंतन से कुछ लेना-देना
नहीं है।
जब आप
अपने अब तक के कथा-संसार की ओर देखते हैं तो क्या आपको लगता है कि आपने केवल अपने
समय को दर्ज़ किया है, या उसके भीतर छिपे किसी
ऐसे सत्य को भी पकड़ने की कोशिश की है, जो अगली पीढ़ी के
पाठकों के लिए भी अर्थवान रहेगा? और यदि आज कोई युवा कथाकार
आपके पास आकर पूछे कि 'अच्छी कहानी लिखने के लिए सबसे पहले
क्या करना चाहिए?' तो हरीचरन प्रकाश उसे क्या कहेंगे?
मैंने अपने लेखन में
अपने समय को ही दर्ज़ किया है। परंतु वह समय वंशहीन नहीं है। वह पिछले समय से
जन्मा है और अगले समय को जन्म देगा। मैंने कोई नया सत्य नहीं पकड़ा है, मैंने तो प्रसिद्ध संत कवि चण्डीदास का कथन पकड़ा है कि सबसे ऊपर मनुष्य
का सत्य है। मनुष्य का सत्य तो सदैव अर्थवान रहेगा।
इसके साथ मैंने यह भी
जाना है कि मनुष्य का सत्य सबसे ऊपर तो है, लेकिन अनन्य
सत्य नहीं है। उसके साथ उसका पूरा जागतिक परिवेश भी है। मैं उन लेखकों को प्रणाम
करता हूँ जो अपनी रचनाओं में प्रकृति को मानुस पात्रों का सहचर पात्र बना लेते
हैं।
इसके अलावा जहाँ तक
किसी युवा कथाकार की परिकल्पनात्मक पृच्छा का सवाल है तो मैं तो उससे यही कहूँगा
कि हज़ूर लिखने के साथ पढ़िए भी। सबसे पहले महारथी लेखकों को पढ़िए, प्रथमतः हिंदी में और बाद में अन्य भाषाओं के। मैं उक्त कल्पित युवा लेखक
से कहूँगा कि साहित्य का पूर्वाधिकार और उत्तराधिकार वैश्विक होता है, अतः यह-पश्चिमी है और यह भारतीय ऐसी कोई धारणा उचित नहीं है, किंतु यह मानते हुए भी मेरा आग्रह यह है कि कोई भी प्रभाव भारतीयता की
अंतश्चेतना के साथ ग्रहण करना चाहिये। आज के कुछ लेखक विदेशी रचनाओं से कुछ ज्यादा
ही प्रभावित हैं। चमकदार वाक्यों से लैस ऐसी अपरिचित भावभूमि से सामना होता है कि
यह पूछने का मन होता है कि यह किस देश-प्रदेश की रचना है, बंधु।
प्रेरित होने की सीमा तक प्रभावित होना स्वागत योग्य है। इससे आगे गए तो समझिए कि
आप साहित्य की लोकाभिमुख, जनवादी परंपरा से नाता तोड़ बैठे।
इसके अलावा में यह भी
कहूँगा कि विषयवस्तु को प्रधानता देते हुए भी शैली पर भी ख़ूब ध्यान दीजिए। यदि
भाषा-शैली की ऐसी निजता आप बना पाए कि आप की किसी कहानी से यदि आपका नाम हटाकर कहा
जाए कि लेखक का नाम बूझें तो जाने और अगला आपका नाम ले ले तो समझिए अपने मैदान मार
लिया।
आपने
कहीं बहुत आत्मीय ढंग से लिखा है कि कभी-कभी लिखते-लिखते कलम की नोक भोथरी पड़
जाती है और रचना स्वयं लेखक के लिए एक संघर्ष बन जाती है। आज जब आप लिखने बैठते
हैं तो क्या आपके भीतर वह पहली 'कौंध' अभी भी उसी तरह आती है? या इतने वर्षों के जीवनानुभव
पढ़ने और लिखने के बाद उस कौंध का स्वरूप बदल गया है, शायद
वह अब पहले से अधिक गहरी, अधिक संयम और अधिक अनुभवी हो गई है?
हाँ, कलम की नोक भोंधरी तो पड़ जाती है। इस रुकावट को गरिमामय नाम देने के लिए
लोग कहते हैं कि 'राइटर्स ब्लॉक हो गया है। हाँ, यह होता है और फिर ठीक हो जाता है। पहले जैसी कौंध अब नहीं आती, बढ़ती आयु के साथ मनदर्पण पुराना और मैला पड़ गया है। ऐसे में मैं लिखना
छोड़कर, इतिहास, पुरातत्व और राजनीति
शास्त्र की धूल खा रही किसी किताब को झाड़-पोंछ कर पढ़ना शुरू कर देता हूँ। इस
झाड़-पोंछ से मन की गर्द अपने आप साफ़ होने लगती है। 'कौंध' रफ़्ता-रफ़्ता सतर-दर-सतर काग़ज़ पर उतरने लगती है।
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