हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक प्रो. नामवर सिंह की जन्मशती के उपलक्ष्य में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग और अंतर सांस्कृतिक अध्ययन...
उन्होंने संगोष्ठी की परिकल्पना
के संदर्भ में कहा कि भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने 1873 ई. में लिखा था कि “हिन्दी नयी
चाल में ढली।” सन् 2023 में इस ऐतिहासिक उद्घोषणा के 150 वर्ष पूर्ण हुए। इस अवधि
में हिन्दी ने उर्दू और हिंदुस्तानी से अलग अपनी विशिष्ट पहचान निर्मित की तथा
साहित्य के साथ-साथ प्रशासन, शिक्षा, मीडिया और व्यवसाय की भाषा के रूप में भी नए आयाम विकसित किए। उन्नीसवीं
सदी में अंग्रेजी शिक्षा और पश्चिमी ज्ञान-परंपरा के प्रभाव से हिन्दी साहित्य की
प्रकृति में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया। उपन्यास, कहानी,
आधुनिक कविता, साहित्येतिहास और आलोचना जैसी
विधाओं का विकास हुआ। साथ ही भारतीय साहित्यिक परंपरा का प्रभाव पूरी तरह समाप्त न
होकर नए रूपों में बना रहा और बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में उसके पुनर्मूल्यांकन
की प्रवृत्ति भी दिखाई दी।
बीसवीं सदी में साहित्य
पर राष्ट्रवाद, मार्क्सवाद, नारीवाद
आदि विचारधाराओं का प्रभाव बढ़ा, किंतु श्रेष्ठ साहित्य ने
सदैव विचारधारात्मक सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए अपनी स्वतंत्र सृजनात्मकता बनाए
रखी। इक्कीसवीं सदी में डिजिटल तकनीक के प्रभाव ने साहित्य की प्रकृति और भूमिका
को एक बार फिर नए ढंग से परिवर्तित किया है, जिसके सम्यक
मूल्यांकन की आवश्यकता आज भी बनी हुई है।
मुख्य वक्ता
आई.ए.सी.एल.एल.एस. के पूर्व सचिव प्रो. हरीश त्रिवेदी ने कहा कि हिन्दी के
तीन मानक वक्ता महादेवी वर्मा, अज्ञेय और नामवर सिंह को
सुनकर यह अनुभव होता था कि हिन्दी भाषा की अभिव्यक्ति-क्षमता कितनी व्यापक और
समर्थ है। उनके अनुसार, नामवर सिंह की बहुभाषिकता और ज्ञान
के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषताओं में थी। उन्हें
कविता और श्लोक ही नहीं, गद्य के भी अनेक अंश कंठस्थ रहते थे
तथा उनकी शब्द-संपदा अत्यंत समृद्ध और अद्भुत थी। उन्होंने कहा कि नामवर सिंह ने
अंग्रेज़ी को कभी प्रभुत्वशाली भाषा के रूप में नहीं, बल्कि
एक अंतःसलिला की तरह अपने भीतर प्रवाहित रखा। उन्होंने विभिन्न भाषाओं से ज्ञान और
विचार ग्रहण किए, परंतु अपनी भाषिक अस्मिता और वैचारिक
स्वतंत्रता को सदैव अक्षुण्ण रखा। प्रो. त्रिवेदी ने यह भी कहा कि हिन्दी को
राजभाषा बनाए जाने की प्रक्रिया में उसे अनेक प्रकार की चुनौतियों और क्षतियों का
सामना करना पड़ा। उन्होंने बल देते हुए कहा कि अन्य भाषाओं से जो कुछ भी ग्रहण
करें, उसे अपनी भाषा और संस्कृति में इस प्रकार आत्मसात करें
कि वह हिन्दी का स्वाभाविक अंग बन जाए; हमें किसी भी भाषा के
अनुयायी या उसके अधीन नहीं बनना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि बीच-बीच में
हिन्दी तत्सम नहीं होगी, तो उसकी सामर्थ्य कम हो जाएगी। हिन्दुस्तानी चलाने का
मुख्य अभिप्राय यही था कि पाकिस्तान न बने।
काशी हिन्दू
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने अपने अध्यक्षीय
वक्तव्य में कहा कि भाषा का स्वभाव निरंतर गतिशील रहने का है; वह कभी ठहरती नहीं, बल्कि समाज के साथ सतत प्रवाहित
होती रहती है। उनके अनुसार, भाषा को परिभाषित करने का कार्य
समाज करता है और उसमें आने वाला परिवर्तन भी समाज से ही प्रेरित होता है। वर्तमान
समय में व्हाट्सऐप, एसएमएस और ई-मेल जैसे त्वरित संचार
माध्यम भाषा के सामने नई चुनौतियाँ उपस्थित कर रहे हैं, जिनका
उसके स्वरूप और प्रयोग पर व्यापक प्रभाव पड़ रहा है। देवनागरी का ह्रास हो रहा है
और वाक्य घट रहे हैं। साथ ही उन्होंने
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस) के सकारात्मक और रचनात्मक उपयोग की
आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि यदि इसका विवेकपूर्ण ढंग से प्रयोग किया जाए,
तो यह हिन्दी भाषा के विकास, प्रसार और
ज्ञान-सृजन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
द्वितीय अकादमिक सत्र
के मुख्य वक्ता प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने 'नयी चाल की हिन्दी' की अवधारणा को ऐतिहासिक, वैचारिक और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में व्याख्यायित करते हुए कहा कि भविष्य
को देखे बिना अतीत को नहीं समझा जा सकता और अतीत की सम्यक् समझ के बिना भविष्य की
दिशा भी निर्धारित नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा
प्रयुक्त 'हिन्दी नई चाल में ढली' का
आशय केवल भाषिक परिवर्तन नहीं था, बल्कि यह भारतीय समाज,
ज्ञान और आधुनिक चेतना के व्यापक रूपांतरण का संकेत था। 'नई चाल' को मात्र भाषावैज्ञानिक अवधारणा के रूप में
नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और
बौद्धिक परिवर्तन की प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए।
प्रो. अग्रवाल ने 1857 के स्वाधीनता संग्राम का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय विद्रोह अपने आप
में एक प्रगतिशील राजनीतिक प्रक्रिया थी, जिसमें एक नए
प्रकार के भारतीय राष्ट्र की कल्पना आकार ले रही थी। उन्होंने इतिहासकार रजतकांत
राय का उल्लेख करते हुए कहा कि 1857 के संघर्ष को हिंदुस्तान
के हिंदू और मुसलमानों की साझा लड़ाई के रूप में प्रस्तुत किया गया था, न कि विश्वव्यापी धार्मिक संघर्ष के रूप में। इसी संदर्भ में उन्होंने
बताया कि तत्कालीन दस्तावेज़ों में 'काफ़िर' शब्द का प्रयोग अंग्रेज़ों और विदेशी औपनिवेशिक सत्ता के लिए किया गया था।
उन्होंने सर सैयद अहमद ख़ाँ की प्रसिद्ध कृति 'असबाब-ए-बग़ावत-ए-हिंद'
का उल्लेख करते हुए कहा कि एक ही रेजिमेंट में साथ रहने और कार्य
करने से हिंदू और मुसलमान सैनिकों के बीच गहरा भाईचारा विकसित हुआ, जिसके कारण दोनों समुदायों के बीच के विभाजन काफी हद तक समाप्त हो गए। सर
सैयद के अनुसार यदि दोनों समुदायों की रेजिमेंटें अलग-अलग होतीं, तो ऐसा साझा विश्वास और एकजुटता विकसित नहीं हो पाती।
अपने वक्तव्य के समापन
में प्रो. अग्रवाल ने आचार्य रामचंद्र शुक्ल के आलोचनात्मक दृष्टिकोण की चर्चा
करते हुए कहा कि सांप्रदायिक तनावों के दौर में भी शुक्ल जी ने जायसी की परंपरा को
प्रेम,
संवाद और मानवीय सहअस्तित्व की दृष्टि से देखा। उन्होंने शुक्ल जी
के उस कथन का उल्लेख किया कि "वे कबीर की तरह
झाड़-फटकार नहीं, बल्कि मुहब्बत का रास्ता इख़्तियार कर रहे
थे।" उन्होंने कहा कि यही दृष्टि हिन्दी की समावेशी परंपरा और उसकी नई चाल का
मूल आधार है।
प्रो.
मनोज कुमार सिंह ने नामवर जी पर बोलते हुए कहा कि बनारस ने
उन्हें बहुत ही आत्मीयता से अंगीकार किया। उन्होंने नामवर के विरह विदग्ध चित्त की
ओर ध्यान आकर्षित करते हुए मेघदूत के यक्ष,
पउम चरिउ की सीता और परिंदे की लतिका का संदर्भ उद्धृत किया। नामवर का अंतःस्थल
कैसा था और वे कहाँ से इतनी ऊर्जा लाते थे। उनकी सहृदयता का उक्ष उनके जीवन से अवश्य
जुड़ता है। उनकी प्रस्थान लेती हुई प्रवृत्तियाँ ही हैं जो उन्हें महत्त्वपूर्ण
आलोचक बनाती हैं।
आई.आर.एस. अधिकारी शैलेश
कुमार ने नामवर सिंह के साथ अपने आत्मीय संबंधों का स्मरण करते हुए उनके
व्यक्तित्व से जुड़ी अनेक संस्मरणात्मक घटनाएँ साझा कीं। उन्होंने कहा कि नामवर
सिंह का व्यक्तित्व जितना विद्वत्तापूर्ण था, उतना ही सहज,
आत्मीय और मानवीय भी था। इस अवसर पर शैलेश कुमार की पुस्तक ‘चंद
तस्वीर-ए-बुताँ’ (नामवर जी का जीवन - तस्वीरों के आईने में) का विमोचन भी हुआ।
तृतीय सत्र में आरंभिक
आधुनिक काल पर चर्चा हुई, जिसमें टेक्सॉस विश्वविद्यालय की गुंजन मल्होत्रा
द्वारा‘हिंदवी प्रेमाख्यान परंपरा और पेम नेम:एक सांस्कृतिक अध्ययन’ विषय
पर एक महत्त्वपूर्ण व्याख्यान प्रस्तुत किया गया। इस व्याख्यान में 16वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हसन मूंजू खलजी (हंस) द्वारा रचित दकनी
उर्दू की प्रसिद्ध मसनवी 'पेम नेम' के
विविध पहलुओं पर प्रकाश डाला गया। बीजापुर के सुल्तान इब्राहिम आदिल शाह द्वितीय (1580-1627)
के ऐतिहासिक संरक्षण में रचे गए इस ग्रंथ को लंबे समय तक जायसी के 'पद्मावत' का अनुवाद माना जाता रहा था। हालाँकि,
डेविड मैथ्यूज के अध्ययनों और ब्रिटिश लाइब्रेरी की नवीन शोध
रिपोर्टों ने यह सिद्ध कर दिया है कि यह एक पूर्णतः स्वतंत्र और मौलिक ग्रंथ है।
व्याख्यान के दौरान
गुंजन ने 'पेम नेम' की उन अनूठी
विशेषताओं को रेखांकित किया जो इसे अन्य उत्तर भारतीय सूफी प्रेमाख्यानों से अलग
बनाती हैं। जहाँ चंदायन, मृगावती और पद्मावत जैसे ग्रंथों की
शुरुआत नायिका से होती है, वहीं पेम नेम का प्रारंभ नायक 'शाहजी' से होता है। इसके स्तुति खंड में फातिमा को
पवित्र माता के रूप में स्थापित कर आदिलशाही सुल्तानों के लिए एक आध्यात्मिक
वंशावली प्रस्तुत की गई है। अद्वैतवाद (वहदत-उल-वजूद) के दर्शन से समृद्ध यह कृति
दर्शाती है कि किस प्रकार सांसारिक प्रेम (इश्क-ए-मिजाजी) के माध्यम से ईश्वर के
प्रेम (इश्क-ए-हकीकी) को प्राप्त किया जा सकता है।
टेक्सॉस विश्वविद्यालय के
ही कुमार नीरज ने ‘समयसुन्दर की कुसुमांजलि की बहुभाषिकता और
मुग़ल-राजपूत दुनिया में जैन तीर्थ’ विषय पर बातचीत की। यह वक्तव्य 17वीं शताब्दी
के बहुभाषी जैन गणी एवं कवि समयसुंदर की साहित्यिक प्रतिभा, भाषाई विविधता और उनके ऐतिहासिक योगदान को रेखांकित करता है। दक्षिण
राजस्थान के सांचौर में जन्मे समयसुंदर प्राकृत, संस्कृत,
सिंधी, मारवाड़ी, राजस्थानी,
हिंदी, गुजराती, ब्रज और
खड़ी बोली जैसी अनेक भाषाओं के प्रकांड विद्वान थे। उनकी प्रसिद्ध कृति 'कुसुमांजलि' में उस दौर की भाषाई विविधता और
दुर्लभ रचनाओं का उत्कृष्ट संकलन देखने को मिलता है। खरतरगच्छ परंपरा से जुड़े
समयसुंदर ने जिनप्रभ सूरि के 'विविधतीर्थकल्प' की तर्ज पर अपनी यात्राओं का वर्णन किया, जिसमें
सांगानेर, चाकसू, मेड़ता, नागौर, जालोर, नाकोड़ा,
जैसलमेर के निकट लोद्रवा और सिंध के ऋषभदेव मंदिर जैसे अनेक तीर्थों
का भौगोलिक एवं सांस्कृतिक विवरण शामिल है।
कुमार नीरज ने बताया कि
मुगल-राजपूत काल के सामाजिक-राजनीतिक नेटवर्क में भी उनकी महत्त्वपूर्ण उपस्थिति
रही। 1591
ई. में जब बीकानेर के मंत्री कर्मचंद बछावत के आग्रह पर उनके गुरु
जिनचंद्रसूरि अकबर से मिलने लाहौर गए,जहाँ अकबर ने उन्हें 'युगप्रधान'
की उपाधि दी, तब समयसुंदर भी उस यात्रा में साथ थे। उन्होंने अपने
काव्य में अकबर, जहांगीर, मानसिंह,
अबुल फजल और खानेखाना जैसे दिग्गजों का उल्लेख किया है। इसके अलावा,
समयसुंदर ने संवत 1687 (शाहजहाँ के काल) में
गुजरात में पड़े भयावह अकाल का अत्यंत मार्मिक और ऐतिहासिक रूप से प्रामाणिक विवरण
प्रस्तुत किया है। उनकी ये बहुमूल्य पांडुलिपियाँ आज भी आमेर के जैन ग्रंथ भंडार,
बीकानेर की नाहटा लाइब्रेरी और जोधपुर के चौपासनी शोध संस्थान में
सुरक्षित हैं।
‘भारतीय भक्ति
चेतना:औपनिवेशिक पूर्वाग्रह और प्रस्थान’ विषय पर बातचीत करते हुए प्रो. माधव हाड़ा
ने कहा कि भारतीय भक्ति आंदोलन यूरोपीय पुनर्जागरण से मूलतः भिन्न है और इसकी
जड़ें भारतीय सांस्कृतिक एवं दार्शनिक परंपराओं में निहित हैं। उन्होंने सिद्ध, नाथ, बौद्ध, पंचसखा, वारकरी, शेख फरीद, कबीर और
मीराबाई जैसी परंपराओं का उल्लेख करते हुए भक्ति की निरंतरता को रेखांकित किया।
उन्होंने राममनोहर
लोहिया के कथन – ‘इस देश का दुर्भाग्य है कि कोई
बाहरी व्यक्ति यहाँ के इतिहास का स्मरण करवाता है’–को उद्धृत
करते हुए कहा कि भारतीय भक्ति ज्ञान मीमांसा के बारे में यह बात सत्य है कि उसमें
अधिकांश प्रस्थान औपनिवेशिक ज्ञान की मीमांसा में है। कुछ प्रस्थान ऐसे होते हैं
जो दूरगामी होते हैं और कुछ बहुत दूर तक यात्रा नहीं करते। इन औपनिवेशिक ज्ञान
मीमांसाई प्रस्थानों पर विचार किया जाना चाहिए कि वे सही हैं भी या नहीं। हमारा
दुर्भाग्य यह भी है कि राजनीतिक बेड़ियाँ हमें महसूस होती हैं पर वैचारिक दासता कभी
महसूस ही नहीं होती। तर्क और विचार उनकी सांस्कृतिक परिस्थितियों में पैदा हुआ पर
जमीन हमारी है। अक्सर हम उपनिवेश काल में हिन्दू-मुस्लिम दृष्टिकोण पर बात तो करते
हैं पर ईसाई दृष्टिकोण पर बात करने में संकोच करते हैं। हमें सचेत रहना चाहिए कि हमारे
जो संत, भक्त या कवि हैं उनकी पहचनों को आग्रहपूर्वक विवादित किया जा रहा है।
प्रो.
पुरुषोत्तम अग्रवाल ने आरंभिक आधुनिक हिन्दी साहित्य पर विचार
व्यक्त करते हुए कहा कि इतिहास-लेखन में स्रोतों का आलोचनात्मक परीक्षण आवश्यक है।
उन्होंने भक्ति परंपरा को सामाजिक समानता, मानवीय गरिमा
और सांस्कृतिक समन्वय का सशक्त आधार बताया। उन्होंने कहा कि हम एक बहुत नाजुक समय से गुजर रहे
हैं, केवल हम ही नहीं बल्कि सारा संसार। जिसे हम आधुनिकता कहते हैं वह भयंकर तरीके
से Retreat की स्थिति में है। उसके तमाम आग्रह,उसकी तमाम
मान्यताएँ भारी संकट में हैं और हर एक पर सवाल है, और होना भी चाहिये लेकिन कम-से-कम
तथ्यों के साथ खिलवाड़ न करें, हम Post-truth की राजनीति न करें, हम Alternative facts की राजनीति
न करें। हम इस बात को न नकारें की 18 वीं सदी के उत्तरार्ध से पहले कबीर के
मुसलमान के घर में जन्मे होने पर किसी को संदेह नहीं था। हम अनामदास की साखी को न
नकारें। जब हम किसी भी ब्रिटिश या औपनिवेशिक ज्ञान मीमांसा की आलोचना करें, तो उसके भीतर
जो विवाद हैं यानी ‘रिजले’ और ‘क्रुक’ को
आप एक ही पलड़े में नहीं रख सकते।
प्रो. अग्रवाल ने अंत में कहा कि केवल
अंतर ही अंतर नहीं होते कुछ सार्वभौमिकताएँ भी होती हैं, व्यक्तियों में भी,
समाजों में भी और चिंतन में भी। मनुष्य की गरिमा एक सार्वभौमिक चिंता है, यह न
केवल एक भारतीय सरोकार है और न ही केवल यूरोपीय। हमने अपनी सभ्यता पर गर्व किया है तो अपनी
कमजोरियों से कभी मुँह भी नहीं चुराया। जिस समाज में जाति-पाँति , ऊँच-नीच और
जातिगत भेदभाव था, उसी समाज ने कबीर और तुकाराम को सम्मान भी दिया, यह हमें भूलना
नहीं चहिए ।
चतुर्थ सत्र में 'विश्वविद्यालय की अवधारणा' के
माध्यम से भारतीय शिक्षा दर्शन, ऐतिहासिक संदर्भों और
वैकल्पिक ज्ञान परंपराओं पर विस्तृत चर्चा हुई, जिसमें
प्रमुख विद्वानों ने अपने शोधपरक विचार रखे। सत्र के दौरान डी. वेंकट राव
ने 'विश्वविद्यालय की भारतीय परिकल्पना’ विषय पर बातचीत की। डी. वेंकट राव ने अपनी प्रस्तुति में तर्क दिया कि
हमारी शिक्षा प्रणाली और विश्वविद्यालय आज एक निर्णायक मोड़ पर हैं, क्योंकि विश्वविद्यालय अपनी स्थापना से ही एक संरचनात्मक विषमता पर आधारित
रहे हैं जो अपने मूल संदर्भ और रोपण/आरोपण के संदर्भ के बीच की दूरी को बनाए रखते
हैं। इस संरचनात्मक चुप्पी और अनुवाद के कारण भारतीय विश्वविद्यालयों में एक तरह
की बौद्धिक विपन्नता दिखाई देती है,
जहाँ संस्थान "डबल बाइंड" में फँसे हैं और उन्हें
"डबल मूव्स" सीखना होगा। उन्होंने यूरोप को बेहतर ढंग से जानने और भारत
के मूक संदर्भ को पुनर्गठित करने की आवश्यकता पर बल दिया, जहाँ
मानव-केंद्रित और निरंतर प्रगति का संस्थागत मॉडल आज ग्रहीय आपदाओं को जन्म दे रहा
है। अंततः, उन्होंने यह विचार प्रस्तुत किया कि
ज्ञान-मीमांसा को केवल बौद्धिक न मानकर जीवन-आधारित सीखने के रूप में पुनः
व्यवस्थित किया जाना चाहिए, जहाँ केवल "भारत" नाम
की अवधारणा नहीं, बल्कि "संस्कृत" जैसी धाराएँ
विभिन्न और भिन्न विरासतों को जोड़ने और पुनर्परिभाषित करने की संभावना दिखाती
हैं।
'नालंदा और
हुम्बोल्ट से आगे: काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और आधुनिक विश्वविद्यालय की भारतीय
पुनर्कल्पना' पर चर्चा करते हुए प्रो. संजय
कुमार ने 20वीं सदी की शुरुआत के भारतीय उच्च शिक्षा के चार बड़े प्रयोगों–काशी हिंदू विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम
विश्वविद्यालय, विश्वभारती और गांधी जी के विद्यापीठों का
उल्लेख किया। ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए उन्होंने बताया कि 'यूनिवर्सिटी'
शब्द लैटिन के 'Universitas' से बना है,
जिसका मूल अर्थ शिक्षकों और छात्रों के "संघ" या
"गिल्ड" से था। 11वीं और 12वीं
शताब्दी के मध्यकालीन यूरोप में इसके दो मुख्य मॉडल उभरे: पहला बोलोनिया मॉडल,
जो छात्र-संचालित (Student-led) था और जहाँ
छात्र शिक्षकों के नियम तय करते थे; तथा दूसरा पेरिस मॉडल,
जो शिक्षक-संचालित (Teacher-led) था और
धर्मशास्त्र पर केंद्रित था। इसके बाद ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज ने कॉलेजिएट
व्यवस्था को आगे बढ़ाया।
उन्होंने आगे कहा कि किसी
भी पारंपरिक विश्वविद्यालय की तीन मुख्य बुनियादी विशेषताएँ रही हैं–राजा या शासक
से प्राप्त स्वायत्तता (Autonomy), अकादमिक स्वतंत्रता
(बिना बाहरी दबाव के पढ़ाने और परीक्षा लेने की छूट), और समान पाठ्यक्रम (Universal Curriculum) जिसमें
लिबरल आर्ट्स, कानून, चिकित्सा और
धर्मशास्त्र शामिल थे। शुरुआत में विश्वविद्यालय केवल पठन-पाठन तक सीमित थे,
लेकिन 1810 में विलहेम वोन हम्बोल्ट द्वारा
बर्लिन विश्वविद्यालय की स्थापना के साथ पहली बार "अनुसंधान" (Research)
और नए ज्ञान के सृजन को विश्वविद्यालय के प्राथमिक उद्देश्य के रूप
में जोड़ा गया।
स्वाति
गांगुली ने 'ज्ञान की एक
वैकल्पिक परंपरा की तलाश में: विश्व भारती और उसका हिन्दी भवन' विषय पर अपना वक्तव्य प्रस्तुत किया। विश्वभारती के इतिहास और गुरुदेव
रवींद्रनाथ टैगोर के शैक्षणिक दृष्टिकोण पर प्रकाश डालते हुए प्रो. स्वाती गांगुली
ने कई महत्त्वपूर्ण तथ्य रेखांकित किए। उन्होंने स्पष्ट किया कि विश्वभारती की
स्थापना को लेकर अक्सर लोगों में भ्रम रहता है; 1901 में
केवल ब्रह्मचर्याश्रम (आश्रम स्कूल) की शुरुआत हुई थी, जबकि
विश्वभारती की नींव 1918 में रखी गई और 1921 में प्रमुख प्राच्यविदों की मौजूदगी में इसका औपचारिक उद्घाटन हुआ।
प्रो. गांगुली ने बताया
कि 1916
के आसपास रवींद्रनाथ टैगोर ने शांतिनिकेतन को भारत और शेष विश्व के
बीच एक वैश्विक सेतु के रूप में विकसित करने की इच्छा जताई थी। टैगोर की सोच में
विश्वभारती केवल एक राष्ट्रवादीसंस्थान नहीं, बल्कि एक
अंतरराष्ट्रीय केंद्र था। इसका मुख्य उद्देश्य ओरिएंटल लर्निंग, कला और कृषि का सर्वांगीण विकास करना था।
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इण्डियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडी , शिमला द्वारा 1993 में प्रकाशित प्रो. जयदेव के विनिबंध ' द कल्चर ऑफ़ पास्तीश: एक्जिस्टेंशियल एस्...
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इण्डियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडी , शिमला द्वारा 1993 में प्रकाशित प्रो. जयदेव के विनिबंध ' द कल्चर ऑफ़ पास्तीश: एक्जिस्टेंशियल एस्...
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