लौट आ, ओ साँस

कहानी  लौट आ, ओ साँस: हरीचरन प्रकाश वह बेंच के कोने में हत्‍थे पर लुढ़का हुआ पाया गया था। चश्‍में की एक कमानी कान में लटकी हुई थी और दूसरी ...

कहानी 


लौट आ, ओ साँस:हरीचरन प्रकाश

वह बेंच के कोने में हत्‍थे पर लुढ़का हुआ पाया गया था। चश्‍में की एक कमानी कान में लटकी हुई थी और दूसरी कुछ झूल रही थी। वह बेंच का चयन किसी लक्ष्‍यभेदी की तरह करता था। जाडे़ में धूपवाली और गर्मी में छांह वाली। इस महीने से जाड़े की कुनमुनाहट शुरू हुई थी तो कभी नरम धूप अच्‍छी लगती थी तो कभी हल्‍की छांव। इस समय सूर्यास्‍त के पहले की बची-खुची उनींदी सी धूप उसी की तरह बेंच पर अधलेटी थी। अगल-बगल से गुजरने वाले यह भी सोच सकते थे कि वह अड़बंगे ढंग से सोया हुआ पड़ा है। शाम उतर चुकी थी।

सबसे पहले उसकी ओर तब ध्‍यान गया जब एक कुत्‍ता उसके पैरो के पास बैठा हुआ मिला। कुत्‍ते की पूंछ किरमिच के जूतों पर आराम से पड़ी हुई थी और बीच-बीच में ऐंठ-गोइठ कर रही थी, और वह हिल तक नहीं रहा है। लोगों को लगा कि कहीं कुछ गड़बड़ है। पैंट की जिप के पास पेशाब का सिकुड़ता हुआ गीला धब्‍बा था, मुंह के एक कोने में सूखती हुई लार दिख रही थी और आंखों में अदृश्‍य आंसू थे। कुछ पता नहीं कि अन्तिम क्षण कौन सा द्रव विसर्जित हुआ।

मृत्‍यु का अपना कोई चेहरा नहीं होता, मृतक का चेहरा ही उसका चेहरा होता है। फिर भी जाब्‍ते की कार्यवाही तो करनी ही थी।

लोगों ने पुकार कर उसे जगाना चाहा मानों कोई खोज कर रहे हों। उन्‍हीं लोगों ने गार्ड को इत्‍तला दी। चूंकि उसका घर पार्क के गेट से थोड़ी ही दूर था इसलिए वह जब चाहे तब वहां चला आया करता था। कभी-कभी किसी गार्ड से उसकी रस्‍मी दुआ सलाम हो जाया करती थी। हालांकि इस समय उसकी देंह पर अजनबियत का साया गहराने लगा था। लोगों ने मेहनत करके पास के क्‍लीनिक से एक डॉक्‍टर को बुलाया जिसने मृत्‍यु की पुष्टि की।

एक आदमी ने हिम्‍मत करके उसके हाथ में अटका हुआ मोबाइल उठाया और कुछ नम्‍बर देखने के बाद तीन-चार नम्‍बर मिलाये। जिसमें से दो मिल गए। उसी मोबाइल से पता लगा कि मरने वाले का नाम अमरकान्‍त है। इसके बाद मो‍बाइल इतना घनघनाने लगा कि उस आदमी का मन हुआ कि कोई और इसे थाम ले। उसे और भी काम थे। करीब आधे घंटे बाद एक दोस्‍त आया और उसने मोबाइल का उत्‍तराधिकार ले लिया। कुछ देर बाद उसी दोस्‍त ने देखा कि यह बन्‍दा तो अन्‍त्‍येष्टि क्रिया के व्‍यवसाइयों द्वारा विज्ञापित सेवाओं को देख रहा था। यह व्‍यवसायी घर से चिता और चिता से स्‍वर्ग तक की सारी क्रिया उचित रेट पर सम्‍पादित कराते थे। यह देखना कुछ समय के बाद उसकी मरणोपरान्‍त प्रसिद्धि का एक कारण बन गया।

अरे, वह जानता था कि वह मरने जा रहा है और कितने इत्‍मीनान से इसकी तैयारी कर रहा था। लोगों को लगा कि ऐसे आध्‍यात्मिक शव को और अधिक सम्‍मान मिलना चाहिए। इस कारण तेरहवीं के भोज में इतने लोग आ गए कि रायता कम पड़ गया।

उसे विधुर हुए दो साल हो चुके थे और अब तक वह रंडुवापन के हानि-लाभ से काफी कुछ अवगत हो चुका था। उसने सब कुछ सुरक्षित कर लिया था। उसने स्‍वास्‍थ्‍य बीमा करवाया, जीवन बीमा करवाया, मकान का इंश्‍योरेन्‍स करवाया और जमापूंजी की फिक्‍स्‍ड डिपाजिट करवाई। ठोस और सुरक्षित जीवन का मरणोपरान्‍त सदुपयोग हो जाए इसके लिए वह इन दस्‍तावेजों की फोटोप्रति अपनी दोनों सन्‍तानों एक बेटा और एक बेटी को दे चुका है। दोनों विवाहित और दोनों के एक-एक सन्‍तान। उसने एक वसीयत भी रजिस्‍टर कराई है जिसमें अधिकांश चल सम्‍पत्ति बेटी को दी है और अचल सम्‍पत्ति (मकान) बेटे को। बहुत नहीं है फिर भी इतना है कि सन्‍तानों के लिये उसकी मृत्‍यु कोई अलाभकारी घटना न हो।

उसके पास रोगों की एक फेहरिस्‍त है फिर भी वह चमकीला दिखता रहा है। उसका मन होता है कि अपना वंशवृक्ष हिलाये और देखे कि कौन अजनबी बन्‍दर उस पर बैठा है जो उसे एक आकर्षक बुढ्ढा बना रहा है। उसकी यह खुशनुमा सोच उसे मृत्‍यु की अवश्‍यमभाविता के भय से थोड़ा मुक्‍त करती थी। बस उसकी केवल एक इच्‍छा थी कि कोई ऐसी बीमारी न हो जिसमें वह दर्द की लहरों और दस्‍त की धारा के बीच मरे। वह न केवल शान्ति से वरन् गरिमामय ढंग से मरना चाहता था। उसने घरवालों से कह रखा था कि किसी भी हालत में उसे वेन्‍टीलेटर पर न ले जाया जाये। इस इच्‍छा को उसने प्रार्थना का कलेवर धारण करने से रोका जबकि प्रार्थना इच्‍छा का ही एक उच्‍चीकृत रूप-विन्‍यास है। लोग देवी-देवताओं या उन देवी-देवताओं का ईश्‍वर रसायन बनाकर उनसे अपनी इच्‍छाओं की पूर्ति प्रार्थनाओं के जरिये चाहते हैं। किन्‍तु अपने इस बन्‍दे की ईमानदार कोशिश यह रही है कि वह इच्‍छा की मकड़ी से प्रार्थना का जाल न बुने और दूर रखे ईश्‍वर को अपनी लालसाओं से। जब कभी वह ओम कहता या हे राम कहता तो वह मात्र एक शारीरिक चेष्‍टा होती।

उसका शहर बड़ा हो रहा था। एक सुनियोजित राजनीतिक दुर्घटना के कारण उसका शहर करीब बीस बरस पहले एक नये प्रान्‍त की राजधानी बन गया था। शहर के पुराने तालाब पट रहे थे, प्राचीन किस्‍म की हरियाली खत्‍म हो रही थी और गमले बढ़ रहे थे। शहर की परिचित बोली बानी को कुछ अपरिचित उच्‍चारण फाडे़ डाल रहे थे। दहकती हुई रोशनियां, रात को इतना कम कर देती थीं कि शहर की अनिंद्रा बढ़ रही थी और साथ-साथ उसके रहवासियों के उलझते-पुलझते सपने भी।

वस्‍तुत: शहर के पुराने निवासी इस बात की शिकायत करते पाये जाते थे कि उनकी त्‍वचा की सिकुड़न बढ़ रही है जैसे रेशा-रेशा फटी हुई किसी बचे-खुचे तालाब की काई। जुड़ते हुये बरसों के साथ जीवन भी उसी तरह घटता रहा।  

पत्‍नी के मरने के बाद उसकी रोजमर्रा की कठिनाइयां बढ़ गई हैं हालांकि पत्‍नी से प्रेम करने की कठिनाई से वह मुक्‍त है। उसने गहरी सांस ली और छोड़ी जैसे कि स्‍वास्‍थ्‍य गुरू बताया करते हैं। वह सामने का तमाशा देखने लगा। उसका पूरा तन उसकी आँख के दायरे में समा गया जैसे कि कोई एक नेत्राकार कबन्‍ध। अब वह इतनी दूर की चीजें देख सकता था जो सामान्‍य आंखों वाला नहीं देख सकता था। ऐसा नहीं कि वह सर्वग्रासी आंख अचीन्‍ही रह गई थी। अगर वह सुन सकता तो सुनता कि पार्क में घास काटने वाली औरतें उसकी नजर ताड़ चुकी थीं। वह कहती थीं कि बुढ़वा की आंखे बड़ी पेटू हैं। अगर उनके पास अच्‍छा बयान करने वाली अकल और जुबान होती तो वह यह कहतीं कि मोटे चश्‍में के पर्दे के पीछे वह स्‍त्रीदेह के सारे आकार-प्रकार पल भर में हबक लेता है। वह गर्दन नहीं घुमाता है। जो कुछ आंख की सीध में मिल जाता है, जीम लेता है। दिन भर में एक अच्‍छा आहार तो उसे मिल ही जाता है। फिर किसी जगह इत्‍मीनान से बैठ कर वह उसकी जुगाली करता है।

तो खैर वह आसमान देख रहा था। सूरज कोहरे को सहला-सहला कर नष्‍ट कर रहा था और आकाश की नीलिमा स्‍वच्‍छ हो रही थी। उसकी पत्‍नी को नीला रंग पसन्‍द था। संयोग है कि उस बार की किटी पार्टी का कलर थीम भी आसमानी था। आसमानी कपड़ों की खोज में उसे भी पत्‍नी के साथ लगना पड़ा था। साड़ी तो मिल गई थी किन्‍तु ब्‍लाउज का मसला हल नहीं हो पा रहा था। पत्‍नी खीझ रही थी और उसे पति पर उतार रही थी।

पत्‍नी– एक दिन में चाहिये।

पति– क्‍या

पन्‍नी– नया

दूने तिगुने दामों में नया ब्‍लाउज सिला लेकिन वह खुश थी। बटुवा आस्‍मानी नहीं, भरे बादल के रंग जैसा था, लेकिन चल गया।

वह लौट कर आई तो और भी खुश थी। आते ही उसने कहा- जाऊंगी, रूकूंगी नहीं।

पति– कहां

पत्‍नी– बैष्‍णो देवी। गरमी।

बहुत दिन से पत्‍नी अपूर्ण वाक्‍यों में बात करती थी। बहुत दिनों से उनका बिस्‍तर समशीतोष्‍ण था जिसमें केवल निंद्रा और अनिद्रा की हलचले होती थीं। इसी वीरानगी के आलम में हुई महीनों बाद की रूटीन दैहिक खींचतान के बाद पति के मुंह से निकला ''मुझे लव मैरिज अच्‍छी लगती है।''

मुझे भी – पत्‍नी के मुंह से निकला।

यह 'मुझे भी' अनायास था लेकिन दिल में कांटे की तरह खटकने वाला था। उन दोनों की अरेन्‍जड मैरिज हुई थी तो यह लव मैरिज की अपूर्ण लालसा इतनी पुरानी पत्‍नी के मुंह से कैसे फूटी। तमाम तरह की शंकायें पति के मन में पैदा होती और फिर उसी मन में सड़कर उनकी खाद बन जाती। पत्‍नी देखती कि पति स्‍वयं से लड़ रहा है। उसे समझ में आ गया कि 'लव मैरिज' की मामूली और क्षणिक तुर्की-ब-तुर्की इतनी भारी पड़ गई है। उसी वक्‍त से पत्‍नी के वाक्‍य टूटने लगे थे।

'कमीज बटन टूटा' बालाजी तिरूपति जाने से पहले उसने पति को चेताया।

पति- मैं टांक लूंगा।

पत्‍नी- रहने दो, उंगली छिद।

यूं भी जीवन इतना सरल नहीं है कि वाक्‍यों से उसकी निर्मिति की जा सके और सही विराम चिह्नों से उसकी सही पहचान की जा सके।

वह लम्‍बा दाम्‍पत्‍य जीवन भुगत कर मरा था। अगर उसकी पत्‍नी जीवित होती तो एक महीने के बाद विवाह की पचासवीं वर्षगांठ मनानी पड़ती। एक महिमामय सड़क दुर्घटना में उसकी मृत्‍यु हो गई थी। मां का बुलावा आया था। हां, सब लोग यही कह रह थे।

पत्‍नी का एक किटीदल था जिसके छह सदस्‍य थे। इन्‍हीं छह औरतों ने मिल कर वैष्‍णों देवी की यात्रा का कार्यक्रम बनाया था। इस महिला दल की औसत आयु पचास थी यानी कुल मिला कर छह स्‍त्रीदेहों में तीन सौ वर्ष जमा थे। उसकी पत्‍नी उम्र में सबसे बड़ी थी और इसे वह बिना ना-नुकुर के स्‍वीकार करती थी। उसे इन किटी सखियों की सोहबत में मजा आता था। सप्‍ताह में एक दिन दोपहर बारह बजे से दो बजे तक का समय अच्‍छा कटता था। दल की सदस्‍यायें पहले तो कुछ यूं ही सी हिन्‍दू थी लेकिन पिछले तीन सालों से सतरंगी हिन्‍दू हो गई थीं। उनके पास तीर्थस्‍थलों, ज्‍योर्तिलिंगों, शक्तिपीठों और व्रत उपवास की एक सनातन सूची थी। किटीपार्टी में घर गृहस्‍थी की बातों के अलावा इस सनातन सूची पर जरूर चर्चा होती थी।

शहर के कुछ रेस्‍तरां शाकाहारी व्‍यंजनों के लिये इसलिये प्रसिद्ध थे क्‍योंकि उनके बोर्ड पर शुद्ध शाकाहारी लिखा रहता था। उनकी इस विशेषणप्रियता की वजह से सारे अन्‍य साइन बोर्डो पर भी शाकाहारी के पहले शुद्ध जोड़ दिया गया था, हालांकि उन व्‍यंजनों के नाम पर मांसाहारी उर्दू की छाप थी, मसलन गोभी मुसल्‍लम, कवाब कटहली और हलवा गुलकन्‍दी आदि। यह हफ्तावार रूटीन थी लेकिन घर के पिंजरे से बाहर रसीले सपनो की एक उड़ान थी। इन छह में से दो विधवायें थीं जिन्‍होंने इस बहाने स्‍वयं से प्रेम करना सीख लिया था। साप्‍ताहिक धर्म जैसी यह स्‍वतंत्रता उन्‍हें अच्‍छी लगती थी।

वैष्‍णो देवी की तैयारी के लिए पूरा वक्‍त था। यात्रा का ड्रेस कोड सलवार, कुर्ता और लाल रंग की जैकेट थी। धार्मिक पर्यटन का बाजार बहुत अच्‍छा चल रहा था। पर्यटकों के पास कमाने के लिए पुण्‍य था और गंवाने के लिए पाप। इस व्‍यवसाय में प्रतियोगिता भी बहुत थी। बढ़िया सौदा पटा कर वह लोग गईं।

वैष्‍णो देवी के रास्‍ते भर छहो जनी चिड़ियों की तरह चहक रही थीं। उनकी उर्जा से मोबाइल फोन चहक रहा था।

उसे आश्‍चर्य हुआ कि एक साठ बरस की स्‍त्री में पन्‍द्रह साल की किशोरी कैसे चहक रही है। उस किशोरीपन की एक खरोंच सी उसके मन पर दिखी।

पत्‍नी का स्‍वास्‍थय उसकी तुलना में बेहतर था। बीमार पड़ने पर वह या तो स्‍वत: ठीक हो जाती थी या स्‍वत: की ही एक चिकित्‍सकीय पर्यायवाची, होम्‍योपैथी से ठीक हो जाती थी। पति जब भी बीमार पड़ता था, खुद से ठीक नहीं होता था। होम्‍योपैथी उससे हार चुकी थी और एलोपैथी उसे हरा चुकी थी। जितना ही उसका तन शिथिल हो रहा था उतना ही उसका मन चौकड़ी भर रहा  था।

वह बड़े चाव से तीर्थयात्रा में रमी हुई स्त्रियों को देख रहा था। उसकी पत्‍नी रूक-रूक कर फोटो खींच रही थी। यात्रा पर जाने से पहले सबने ब्‍यूटी सैलून का अच्‍छा खासा भ्रमण किया था। उनकी बाहें उनके चेहरे की तरह साफ और चिकनी हो रही थीं। उनके दुपट्टे थामें नहीं थम रहे थे। विधवाओं के होठों में एक दबी-दबी सी उत्‍तेजना थी जिसे वह बीच-बीच में भूरे रंग की लिपस्टिक से उभार देती थीं। सधवाओं का अलग सिंगार था। उसे दोनों ही नमूने उत्‍तेजक लग रहे थे। उसके अन्‍दर दु:शील कल्‍पना का ऐसा ज्‍वार उठा जो तुरन्‍त ही भाटे में तब्‍दील हो गया। तन और मन की इस असंगति ने उसे हताश कर दिया। आखिर में तो औरत ही जीतती है। सदैव रम्‍या। उसने क्षोभ से भर कर खुद को देखा। न काम का, न नुमाइश का।

छह खच्‍चर कतार में चले जा रहे थे। वह लोग दर्शन करके लौट रहे थे। पत्‍नी ने वीडियो बनवा कर भेजा था। विकारविहीन खच्‍चरो पर लदी हुई सन्‍नारियां सेल्‍फी खींच-खींच कर भेज रही थीं। उनके रास्‍ते के तले बादलों के कुछ टुकडे़ बैठे हुए थे। उन्‍हें देख कर उसे नींद आने लगी। उसकी नींद ऐसे ही कभी भी हो जाती थी। अब वह रात में देर तक जागेगा और खुद को कोसेगा। नींद उसी तरह आती है जिस तरह जाती है, बेआवाज, बेइरादा। उस रात वह गर्मी से जगा। बिजली एकदम से चली गई थी। घुप्‍प अंधेरा, जो काले रंग से पुता हुआ लग रहा था। रूके हुए पंखे की पांखे भी नहीं दिख रही थी। जमे-जमे से अंधियारे की सांस गाढ़ी हो रही थी। उसी समय इन्‍वर्टर सक्रिय हुआ और पंखे ने उन गाढ़ी सांसो को हिलाकर हल्‍का किया। अन्‍धेरा बिना रोशनी के टूटने लगा, फिर भी जब मोबाइल की घंटी बजी तब उसके मन में डर कौंधा। नीरवता की प्राचीरों को देर रात भेदता फोन डर का अग्रदूत होता है। उधर कोई अंजाना स्‍वर था, निवैयक्तिक सहानुभूति में सधा हुआ। पुलिस का फोन था।

- 'क्‍या आप श्रीमती गुंजन कान्‍त के पति हैं?'

- ''जी।''

पत्‍नी का खच्‍चर लुढ़क गया था। यह हजारों में होने वाली एक दुर्घटना थी। हैरत की बात थी कि जगह-जगह से टूटे फूटे शरीर के बीच, मोबाइल, आधार कार्ड, डेबिट कार्ड और नकद पैसे के खांचे वाली बेल्‍ट नष्‍ट नहीं हुई थी, बस धक्‍का खाकर पेट की चर्बी में धंस गई थी। इसके बाद किटीदल की साथियों के रूंधे हुए, सिसकते हुए स्‍वर आने आरम्‍भ हुए। इन स्‍वराघातों से घबरा कर उसके मुंह से निकला 'माता का बुलावा आया था।' इस वाक्‍य के बाद उधर सन्‍नाटा छा गया जिससे उबर कर किटीदल ने समवेत स्‍वर में कहा ''जी, बिल्‍कुल, जी बिल्‍कुल।'' किटीदल ने राहत की सांस ली।

बाद में इस वाक्‍य-विस्‍फोट पर आश्‍चर्य होता रहा है कि इतनी शास्‍त्रीय अनासक्ति का संवाद वह कैसे कर पाया। एक पैशाचिक आजादी की फुरुफुरी उसके शरीर में दौड़ रही थी। मन और मुठ्ठी भींच कर उसने खुद को साधा और रफ्ता-रफ्ता दुख को मांज कर आसक्ति की रचना करने लगा। एक ठहरे हुये तालाब में फेंकी गई कंकड़ी भी तालाब की शान्ति भंग कर देती है यहां तो मनों मलबा एक दम से आ गिरा था। इस मलबे में एक खच्‍चर भी था। उस खच्‍चर का क्‍या हुआ? उसे किसने बुलाया था? वह जो किसी की आजीविका का साधन था, वह जो एक भारवाही जीवधारी था। इस अलबेले सोच पर उसे बहुत क्षोभ हुआ। वह पत्‍नी की मृत्‍यु के साथ खच्‍चर की मृत्‍यु कैसे सान सकता था? कोई ताज्‍जुब नहीं कि पत्‍नी कहती थी कि वह उस जैसे आदमी को जिंदगी भर ढोती रही है। उसे ग्‍लानि होने लगी। रोना ही उसे मुक्‍त कर सकता था। आंखे निचोड़ कर वह कुछ आंसू निकाल पाया जबकि इलाज तो भरभरा कर रोने में था। वह खुद को धिक्‍कारने लगा। अरे मन-दुर्जन! डरती है मृत्‍यु बोझ से, सहमती है मृत्‍यु बोझ से। शायद इसीलिए ले जाती है भारहीन प्राण।

कितनी बखेडे़ वाली मौत। कितनी बड़ी झंझट। ऐसा न तो उसके ख्‍याल में था और न ही अगले या पिछले दरवाजे से आने वाले किसी दु:स्‍वप्‍न में। खुद को सहेजने के लिए अक्षत ऊषा की आवश्‍यकता पड़ती है। न्‍यारी रात, किसे जगाये। उसने एक फुट के फासले पर लेटे हुए खाली तकिये को देखा।

वह सोते थे सबेरे उठ कर टहलने के लिये। स्‍वस्‍थ रहना मानुस तन का स्‍वाभाविक गुण है किन्‍तु आज इसके लिये कितनी बाजीगरी करनी पड़ती है। रूमानी भक्ति में गले-गले डूबे नई चाल के तेज रौ भजनो की ध्‍वनि के साथ टहलते हुए लोग उस बेला प्रकृति की कुछ मौन और मुखर ध्‍वनियों को कुचल कर रख देते थे। ताली बजाते हुये स्‍त्री-पुरूषों  के झुण्‍ड, गला फाड़ कर हंसते हुए लोग, उल्‍टा चलते हुए लोग। नर तन से वानर लीला करते हुए लोग।

वह पत्‍नी के तकिये की तरफ लुढ़का। नीले नाइट बल्‍ब का बेडस्विच उधर ही था। पत्‍नी का तकिया आंख में समाने लगा। बालों का एक नन्‍हा श्‍वेत-श्‍याम फुचड़ा उस पर चिपका हुआ था। उसने उन्‍हें अंगूठे और तर्जनी से बटोरा और यूं ही देखने लगा। थोड़ी देर उनकी मुलायमित को महसूस करने के बाद उसने उन्‍हें बालकनी में जाकर हवा में तैरा दिया।

इन बालों का एक गार्हस्थिक वृतान्‍त था। श्रीमती गुंजन कान्‍त अरसे से बाल रंग रही थी। अरसे से मतलब है कि जबसे वह लोग बेटी की शादी ढूंढ़ने लगे थे। खुद बेटी ही मां को धकेल कर बाल रंगवाने ले गई थी। अब इसके बाद बाल रंगवाना एक ऐसी इल्‍लत हो गई जिससे वह छुटकारा पाना चाहती थी खास तौर पर जब उसने देख लिया कि वह (पति) नहीं रंगवायेगा, तो नहीं ही रंगवायेगा। धर्म ने इस इल्‍लत से छुटकारा पाने का अवसर दिया। एक बार दोनों तीर्थयात्री बन कर बालाजी तिरूपति गये और केशदान कर आये।

बेल जैसी मुंडी खोपड़ी पर पत्‍नी हाथ फिराती और शीशे में खुद को देख कर मुंह बिराती। धीरे-धीरे खोपड़ी चिकनी से खुरदुरी और छह महीने में गझिन हो गई। तभी उसने बालों को सेट करवाया। लहरियादार श्‍वेत-श्‍याम, गरदन के पिछले भाग पर नीचे से ऊपर की तरफ सिकुड़ते हुये घुमेरदार बाल। लकीर की फकीर जैसी मांग गायब करके उसने अपना लुक बदल दिया। उसने पति की आंखों में प्रशंसा ढूंढ़नी बन्‍द कर दी थी।

वह सरकारी बैंक में अच्‍छी हैसियत के पद से रिटायर हुआ था। इधर-उधर नौकरी करते हुए उसके मन में मूल निवास की धारणा अप्रासंगिक होने लगी थी। मूल निवास अब केवल स्‍मृतियों का आंगन था। वहां रहने वाले परिजनों से नाता शिथिल होने लगा था। ब्‍याह-शादी, भरनी-करनी में रस्‍मी आना-जाना ही बचा था, वह भी तब जब सारी दिशायें शूल रहित हों।

बालकनी से रात पूरी तरह दिख रही थी। सड़क की रोशनियों की वजह से कुछ-कुछ उजेरी, बकिया अंधेरी। कमरे में लौट कर उसने घड़ी देखी। यह कैसा बेहूदा ब्रह्ममुहुर्त। उसने बेटे और बेटी को संदेश डाला और सूर्य की पहली किरण का इन्‍तजार करने लगा।

रोशनी की एक दरार ने दबे पांव कमरे में प्रवेश किया। वह आदतन 'हे राम' कहता हुआ उठा। उसे वहां जाना था और किसी को साथ चलने के लिए भी तैयार करना था। साफ-साफ सबेरा होते ही उसने एक पुराने अधीनस्‍थकर्मी को फोन किया जो दोस्‍त जैसा हो गया था। एक-दो पल के सन्‍नाटे के बाद और यह कहने के बाद क्‍या कह रहे हो उसने कहा 'अभी आता हूं।'

वह अपने साथ थर्मस भरकर चाय लेकर आया था। चुस्‍की-चुस्‍की चाय पीते और दिमाग खोलते हुए उन्‍होंने तय किया कि जैसे भी हो वहां जल्‍दी से जल्‍दी पहुंचना है। वह दोनों वहां पहुंचे और एक दिन के बाद बेटा-बहू, बेटी-दामाद भी पहुंच गये। कागजी कार्यवाही के बाद पोस्‍टमार्टम की भीषण प्रक्रिया से गुजरा हुआ, दबा-कुचला, कटा-पिटा शरीर हासिल किया। अजीब बात है कि एक निष्‍प्राण शव की परीक्षा प्रियजनों को जितना कष्‍ट देती है, उतनी चिता पर धू-धू जलती देह नहीं।

हरिद्वार में तेरह दिन का काम तीन दिन में निपटा कर वह घर लौट आया। वह पस्‍त और गुमसुम था। लोग समझते थे कि गहरा धक्‍का लगा है लेकिन उस धक्‍के की असली प्रकृति नहीं समझते थे। मिश्रित और संतुलित किस्‍म का दु:ख था क्‍योंकि उस दुख में उन तमाम सहूलियतों के समाप्‍त हो जाने का कष्‍ट था जो उसने पत्‍नीनिर्भरता से अर्जित की थी। उसे पत्‍नी की कमी बेतरह खलने लगी। ग्‍लानि भी होती थी कि इतने लम्‍बे अरसे में वह प्रेम का स्‍वाद नहीं ले पाया, केवल साहचर्य निभाता रहा। उसने बेटी और बहू से कहा पत्‍नी के गहने-कपडे़ बांट लें। दोनों ने गहने तो सद्भावपूर्वक बांट लिए क्‍योंकि सोने में अशौच नहीं होता है किन्‍तु कपडे़ फिनाइल की गोलियों से सुरक्षित कर बक्‍से और अलमारी में बन्‍द कर दिये।

घर और बाहर सभी ने कहा कुछ दिन के लिये तो जगह बदल ही दीजिये।

''ठीक है।''

तीन महीने वह सन्‍तानों के साथ रहा। इसके बाद घर लौटने की बात करने लगा।

''पापा, डरेंगे तो नहीं'' बेटी ने सजल नयनो से पूछा था।

बहू ने सांस गटक कर कहा- यहीं रहिये।

''नहीं'' सुनते ही बहू की जान में जान आई। बेटी संतुष्‍ट होकर रोने लगी।

घर पहुंचने पर मित्र ने पुन: हवन आदि करवाया और हिदायत दी कि तकिये के नीचे हनुमान चालीसा रख कर सोये। कुछ जान पहचान वाले उसे सामाजिकता की ओर अग्रसर करने के लिये खाने पर बुलाने लगे, किन्‍तु वह अधिकतर ऐसे दयालु आग्रहों को टाल जाता था।

दरअस्‍ल, उसे इन्‍तजार रहता था उस अल्‍हड़ लड़की का जो पत्‍नी के जीवनकाल में झाड़ू-पोंछा और बरतन धोने का काम करती थी और अब दो टाइम का खाना सबेरे बना कर चली जाती थी। पत्‍नी खाना खुद बनाती थी, शौक से, अपनी और पति की पसन्‍द का तथा किचन जो गृहस्‍थी का केन्‍द्र है उस पर पूर्ण नियंत्रण के लिये।

खुशमिजाज होने के नाते वह लड़की बिना किसी ना नुकुर के कुछ ऊपर के काम भी कर दिया करती थी। उसका नाम सरला था लेकिन पत्‍नी उसे टिकुली कह कर पुकारती थी। लड़की शादी व्‍याह या अन्‍य किसी पारिवारिक उत्‍सव में जाने से पहले मेकअप के छोटे-मोटे सामानो की फरमाइश किया करती थी। पत्‍नी उसे कभी लिपस्टिक तो कभी कोई क्रीम-पाउडर या सस्‍ता परफ्यूम देकर उपकृत करती थी। इस सामग्री का वह स्‍वयं उपयोग करती थी और अपनी सहेलियों के बीच उनका विनिमय भी। मसलन किसी के पास आई शैडो है और परफ्यूम नहीं है तो वह उपलब्‍धता के आधार पर अदला-बदली कर लेती थी।

किसी शादी-ब्‍याह से लौट कर वह पत्‍नी को उसके किस्‍से सुनाती थी। इन किस्‍सों में जो किस्‍सा चिरस्‍मरणीय रहा वह उस बारात के बारे में था जिसमें बाराती और घराती शराब पीकर हाथा-पाई करने लगे। यह देखकर स्‍टेज पर बैठा दूल्‍हा छलांग लगा कर उतरा और अपने हिस्‍से की मार-पीट करके वापस स्‍टेज पर बैठ गया। उसके इस हस्‍तक्षेप से झगड़ा रूक गया। थोड़ी ही देर में उसी शराब के कारण धराती और बराती में अतिरिक्‍त सौहार्द कायम हो गया तथा दुल्‍हन ने पराक्रमी दूल्‍हे को सहर्ष वरमाला पहना दी। इस किस्‍से पर श्रीमती कांत और कुमारी टिकुली सारा वर्गभेद भूलकर इतना हंसे कि वह भी हंसने लगा।

यह लड़की पत्‍नी को तरह-तरह की टिकुलियां लगाने की सलाह देती थी, जिसमें से कुछ पर अमल कर पत्‍नी उसे दिखाती भी थी।  

टिकुली पंजाबी रैप म्‍युजिक की बड़ी शौकीन थी जिसे एलेक्‍सा पर लगवा कर ही वह काम करती थी। उसकी धुन पर उसका तन तो नहीं लेकिन मन थिरकता रहता था। उसी थिरकन के वश में उसके हाथ से कटोरी-चम्‍मच फिसल कर फर्श पर गिरते और अपना सांगीतिक अवदान करते।

पति और पत्‍नी दोनों ने कक्षा छह से आठ तक अनिवार्य संस्‍कृत पढ़ी थी लेकिन यह पत्‍नी ही थी जो टिकुली के संगीत की धुन में शामिल हुई और बेसाख्‍ता प्रस्‍फुटित हुई ''हस्‍ताच्‍च्‍युतो हेमघटो युवत्‍या:। सोपानमार्गेण करोति शब्‍दम टटं, टटटं, टटटं, टटटं टटंटम्।।

संस्‍कृत ऐसी रटन्‍त विद्या है कि जल्‍दी भूलती नहीं। पत्‍नी उसे बरतन गिराने पर प्‍यार से झिड़कती थी और अनिवार्य रूप से यह श्‍लोक उच्‍चारती थी।

टिकुली पूछती ''मतलब''

पत्‍नी उत्‍तर देती- मतलब, मैं और तुम।

उसे झिड़कने के बाद गुंजन कांत बताती थीं कि इस उम्र में उनके हाथ से भी बरतन बहुत गिरते थे। अमर कांत यह पूछ नहीं पाया कि उस उम्र की किस तन्‍मयता के कारण बरतन गिरते थे। पन्‍द्रह-सोलह बरस की यह बालिका-मजदूर इस थके हुए गृह की स्‍वामिनी को कैशौर्य दान कर रही थी।

टिकुली का गांव शहर से पच्‍चीस किलोमीटर दूर था, जहां उसके बाबा-दादी और अन्‍य परिजन रहते थे। टिकुली के मां-बाप अपने चार बच्‍चों को लेकर, शहर की बहुमंजिला इमारतों के इर्द-गिर्द पनपने वाली झुग्गियों में आधे-अधूरे ढंग से रहने चले आये थे। गांव में चलने वाली योजनाओं का लाभ भी वह बीच-बीच में गांव जाकर उठा लाते थे। पिता इधर-उधर मजदूरी का काम करते थे और मां बहुमंजिला इमारतों के तीन-चार फ्लैटों में झाड़ू-पोछा और बरतन का काम करती थी।

टिकुली का मन कभी भी पढ़ाई में नहीं लगा। वह जब तक गांव में रहीं, वहां के स्‍कूल में केवल मिड-डे मील खाने जाती थी। सच तो यह है कि टिकुली का मन झाड़ू-पोंछे में भी नहीं लगता था, यह तो मां ने जबरदस्‍ती उसे इस काम में झोंक दिया।

सच तो यह है कि उसकी सेवायोजक (आँटी) जितनी कर्मठ थीं टिकुली उतनी ही कामचोर। उसके पीछे-पीछे लग कर काम कराना पड़ता था। टोके जाने पर वह खिल्‍ल से हंस देती थी। छल करते हुए भी इतनी निश्‍छल हंसी, उसे (अंकल) और पत्‍नी (आँटी) को अच्‍छी लगने लगी।

टिकुली को मीठी चीजें नहीं पसन्‍द थीं, वह तीखा और चरफरा खाती थी। पत्‍नी कभी-कभी उसकी पसन्‍द की चटोरी चीजें बनाकर भी उसे खिलाकर खुश होती थीं।

टिकुली मछली की बहुत शौकीन थी। जातीय परम्‍परा के अनुसार वह एक मत्‍स्‍योपजीवी जाति में उत्‍पन्‍न कन्‍या थी जो कन्‍यावस्‍था को आनन्‍ददायक अवस्‍था समझती थी। उसी आनन्‍दवश वह छोटा-मोटा चुहल करने से बाज नहीं आती थी।

जिस दिन दिहाड़ी-मजदूरी का डौल नहीं बैठता था उस दिन उसके पिता जाल लेकर मछली पकड़ने निकल जाते थे। शिकार की मात्रा के अनुसार अधिकतर मछली बाजार में बेच कर, एक पौव्‍वा देसी दारू और शेष शिकार लेकर घर लौटते थे। उस दिन बच्‍चों को ही मछली बनाने-चुनाने का काम करना पड़ता था। उस दिन वह अपनी पत्‍नी-प्रेयसी को दारू चखाते और कांटा बिचार-बिचार कर मछली खिलाते। परपंची टिकुली जब अन्‍य लोगों का परपंच करती तब अपने घर का राज-काज भी उजागर कर देती।

टिकुली शरारती तो थी ही, ऊपर से इस घर का शुद्ध शाकाहारी वातावरण उसे शरारत करने के लिए उकसा रहा था। एक दिन थाली-कटोरी साफ करते समय उसने कहा ''जब तक थरिया मा मछरी न महकै, तब तक कौन थरिया।''

''अरे! चुप चुप'' पहले तो सहम कर वह बोला। उसके बाद पत्‍नी ने आंख तरेरी। हंसमुख टिकुली ने इस वर्जना को सुन कर अनसुना किया और देख कर अनदेखा किया।

टिकुली को जिस तड़प के साथ गृहस्‍वामी ने टोका, उसी तड़प के साथ उसकी कनपटियां तड़कने लगीं।

अमरकान्‍त को मछली बहुत पसन्‍द थी। उसकी मां बहुत अच्‍छी मछली बनाती थीं। पत्‍नी के उग्र शाकाहारी तेवर को देखकर उसने मां के साथ मछली का जिक्र करना बन्‍द कर दिया। बच्‍चों, म से मटका, मछली नहीं!

वह घरेलू खटराग से बचना चाहता था चाहे इस चक्‍कर में खुद का मन कितना भी खट्टा होता चला जाए। मन की हर खरोंच मैल से भरती है, मन में इतना मल जमा हो जाता है कि मथते-मथते पूरा जी गन्‍धा जाता है। इस अहसास के बावजूद एक स्थिर और नीरस दाम्‍पत्‍य जीवन इतना मैलखोरा हो जाता है कि सफाई अगर की भी जाए तो किधर से।

मलिन मन और कुटिल चित्‍त एक दूसरे के प्रतिबिंब हैं। किस कदर खाली समय पति पत्‍नी के पास था। उसे भरने की तरकीबें भी नाकाम थीं। प्रेम और श्रम के अभाव में आपसी शिकायतें ही सबसे कारआमद तरकीब थी। कुछ शिकायतें मुंह खोल कर और कुछ मुंह फुला कर। इस प्रतियोगिता में पत्‍नी जीतती और फिर से सहज हो जाती। पति हार कर अतृप्‍त क्षोभ का प्‍याला घूंट-घूंट भरता और पीता रहता। पति को श्रम के नाम से ही थकान आती थी। पत्‍नी के पास श्रम भी था। कोई आश्‍चर्य नहीं कि वह कभी-कभी गुंनगुनाती भी थी। एक अनुभवी पत्‍नी की तरह वह उस विषकुम्‍भ को भी देख रही थी जो लगातार भर रहा था।   

गुंजन ने अमर की मन:स्थिति का प्रतिवाद अपने ढंग से किया। गुंजन का प्रतिवाद परम्‍परागत दाम्‍पत्‍य जीवन में गुंथे हुये प्रेमतन्‍तुओं को व्‍यक्‍त करने वाले फिल्‍मी गानो के जरिये हुआ। उसने फिल्‍म 'नदिया के पार' का गाना लगाया।

'जब तक पूरे न हो फेरे सात

तब तक दुल्हिन नहीं, दुल्‍हा की।

रे! तब तक बबुनी नहीं, बबुआ की।

ना, जब तक पूरे न हो फेरे सात।'

............................................

............................................

उठो उठो बबुनी, देखो ध्रुव तारा।

ध्रुव तारे सा हो अमर सुहाग तिहारा।

या

फिल्‍म 'आरती' का गाना-

'दीवार ओ दर का रंग

ये आंचल ये पैरहन

घर का मेरे चिराग है

बूटा सा यह बदन।'

वह उम्‍मीद से देखती कि जमीन पर जमी बर्फ टिघले और कोई बीज अंखुवाये। लेकिन, ऐसा हुआ नहीं। भीतर गुंजन ही जा पाई क्‍योंकि यह गाने उसके भीतर रहते थे। अमर बाहर ही रह गया।

उसका आत्‍म उससे नंगा होकर पूछ रहा था कि बताओ ऐ भलेमानुस तुम कितने कठकरेज हो कि दु:ख तुम्‍हें ऊपर-ऊपर से छूकर चला गया है। यह आत्‍म-विच्‍छेदन उसे ग्‍लानि से भर रहा था। क्‍या कोई व्‍यक्ति अपने जीवन साथी की मृत्‍यु में अपनी मुक्ति देख सकता है। इस ख्‍याल की भयावहता ऐसा विषकुम्‍भ थी कि उसे पयोधर कल्‍पनाओं से ही ढंका जा सकता था।  

अपराध-बोध एक ऐसा मानवीय गुण है जो मनुष्‍य को निष्‍पक्ष होना सिखाता है। पत्‍नी लगातार बोलती थी और भूल जाती थी कि कोई बात या वाक्‍य वह पचासवीं बार दोहरा रही है। जब कभी झिड़क कर वह कहता था कि कब तक यह बात बताती रहोगी तो तब दोनों के बीच वितृष्‍णा की चुप्‍पी फैल जाती थी। कभी वह स्‍वयं को दोषी मानता था तो कभी पत्‍नी को। इसे ही वह निष्‍पक्षता मानता था। पत्‍नी की स्‍मृति को भी वह इसी निष्‍पक्षता के तराजू से तौलता है।  

एक दिन पत्‍नी ने कहा- मैं कहीं दूर जाना चाहती हूं।

''मैं भी''

''मैं भी'' सुनते ही पत्‍नी फुफकार उठी। वह आतंकित हो गया और उसी आतंक के वातावरण में वह अपनी मृत्‍यु या पत्‍नी की मृत्‍यु के बारे में सोचने लगा। दोनों मौतों के उसने कितने ही दृश्‍यबंध बना डाले। नाटकीय रूप से शान्‍त और सरल मृत्‍यु। लेकिन यह तो गजब हो गया। उसने न्‍योता था बयार को और चला आया अंधड़।

उसने सोने का कमरा बदल दिया था। मुख्‍य शयनकक्ष अब सूना ही रहता था। बिस्‍तर से उठते समय वह दोनों घुटनों पर जोर लगा कर उठा। उसने स्‍वयं को हारा हुआ महसूस किया। कितनी शोर-शराबे वाली मौत पत्‍नी को मिली। वह अपराध-बोध से ग्रस्‍त होने लगा। हजारो फिट नीचे गिरती हुई पत्‍नी की चीखें उसे सुनाई देने लगी। उसने उन दारूण चीखों से ध्‍यान हटाने के लिए एक अन्‍य प्राणी को याद किया। क्‍या खच्‍चर को मृत्‍यु-भय हुआ होगा। अगर नहीं तो उसकी चीख का क्‍या मोल? निष्‍पक्षता काम आ रही थी।

उसे इस बात पर क्षोभ होने लगा कि उसकी पत्‍नी कभी भी प्रिया नहीं बन पाई। यह भी कि वह उस प्रेम की कल्‍पना ही करता रह गया जो भले ही पल-दो-पल का हो लेकिन मृत्‍युपर्यन्‍त साथ रहता है। वह अन्‍दर ही अन्‍दर गुस्‍से से बलबलाने लगा। वह गुस्‍सा जो वह कभी पत्‍नी पर चिल्‍ला कर प्रकट नहीं कर पाया। वह कभी उस पर हाथ न उठा पाया। एक ठण्‍डी नापसन्‍दगी के साथ उसने दाम्‍पत्‍य जीवन का कर्तव्‍य निभाया। वह स्‍वयं पर दया करके सोने लगा।

उसके पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था कि वह सोते-जागते दिवास्‍वप्‍न देखे। उसके एकाकीपन के पास दिवास्‍वप्‍नों की भीड़ थी। टिड्डीदल की तरह आक्रमण करती कल्‍पनाओं का अन्‍त नहीं था। वह सारे कल्पित या अकल्पित अपमान जो हो चुके थे, उसका गिन-गिन कर बदला लेता। अपने दिवास्‍वप्‍नों में वह एक योद्धा नायक था, इच्‍छाधारी प्रेमी था। तन से विलग वह मनोत्‍तेजना के अविरल संसार के साथ ऐसी पटरी बैठा चुका था कि बिना कर्म किये उसे विकर्म का हिंसक आनन्‍द मिल रहा था। ऐसी अवस्‍था में कौन नहीं चाहेगा कि उसके खाते में अनगिनत सांसे जमा रहें।

विधुर अपना नवसंस्‍कार कर रहा था जैसे कि सांप केंचुल उतार कर पुनर्नवा होता है। वही केंचुल अन्‍धेरे में दिपदिपाता था और जो चेहरा कभी कोष्‍ठवद्ध रहता था वह अब पोशीदा स्‍वैराचारी मठाधीशों जैसा शान्‍त और प्रमुदित था।

उसका कायान्‍तरण हो चुका था। एक नेत्राकार परमपिपासु शरीर पार्क की बेंच पर बैठा-बैठा सारी कलायें और लीलायें देखता। एक सर्वग्रासी मोबाइल ऐप की तरह वह इस देखे हुये को लील रहा था। व्‍यक्तित्‍व के इस अन्‍तरण को उसने निर्बन्‍ध रूप से स्‍वीकार कर लिया। अब तक के विभाजित स्‍व को उसने अविभाज्‍य कर दिया। जैसे कि घड़ी में बारह बजाने वाली सुइयां एकाकार हो जाती हैं वैसे ही उसने अच्‍छे और बुरे सोच की प्रतीति को एकाकार कर दिया। उसने अपने जीवन का अन्‍यतम समय खोज लिया।

वह अद्वितीय तमाशबीन था। वह देख रहा था जींस-वस्‍त्रावृता नितंबिनी रमणियों को। वह देख रहा था अनेक चिकित्‍सकीय प्रविधियों और पूजा-पाठ के बाद गर्भित हुई किसी स्‍त्री का प्रदर्श कोंहडे़ जैसा विशाल पेट। उस शांत क्‍लान्‍त किन्‍तु विजयिनी की तरह चलती हुई नारी के साथ कदम-ब-कदम, बा-एहतियात चलता हुआ, चौडे़ जबडे़ और परूष दाढ़ी वाला, मालिकाना शारीरिक भाषा की अभिव्‍यक्ति करता हुआ नरपुंगव।

कुछ बुर्केवालियां भी थीं जो चिंहुक-चिंहुक कर चीजों को देख रही थीं। उन्‍हें देखने की आजादी थी दिखाने की नहीं। अलबत्‍ता, बुर्के इतने डिजाइनदार थे कि उन्‍हें स्‍वतंत्र पोशाक माना जा सकता था। ठीक उन्‍हीं के सामने उनके हिजाब को विर्दीण करते हुए, गुरर्राते और हांफते हुए निर्द्वन्‍द श्‍वान समूह इस मैथुनी सृष्टि को आगे बढ़ाने के लिये क्रियारत थे। बुर्के के तीन वर्ग इंच खुले चेहरों पर शरारती शर्म के भाव डूब और उतरा रहे थे।

उस निर्णायक दिन, सब जगहों से आंखे समेट कर वह उतरती शाम के सुरमई धब्‍बों वाले, चपेट में आए हुए से आसमान को देख रहा था।

उसने अब टहलना पूरी तरह से बन्‍द कर दिया था। बस जाकर किसी बेंच पर बैठ जाता था और प्रत्‍येक स्‍वास्‍थ्‍यप्रद हिदायत को एक वजनी गाली देता था। अनुलोम की...., विलोम की..., कपालभाती की तो...। वह ऐन्द्रिक स्‍वतंत्रता के चरम क्षण पर पहुँच रहा था।

अब उसने व्‍यष्टि और समष्टि के लौकिक और अलौकिक भविष्‍य निर्माताओं को गाली दी और एक परम संतुष्‍ट सांस ली। सांस जो लौटी नहीं। प्रकृति की विकृति में रमती है मृत्‍यु।

उस पल सारा परिदृश्‍य एक मुर्दा अजायब घर जैसा हो गया। पेड़-पौधे, गिलहरियां, तितलियां, कीडे़-मकोडे़, दो पाये-चौपाये सब थिर हो गये, प्‍लास्टिक की निश्‍चल प्रतिकृतियों जैसे। उसकी आंखों में जड़ी भूत विस्‍मय था।


                                                                                     कहानी- लौट आ, ओ साँस
                                                                                               लेखक- हरीचरन प्रकाश


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शब्देन्द्रिय: लौट आ, ओ साँस
लौट आ, ओ साँस
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