"जीवन की तरह कला भी प्रतीति के लयात्मक लीला को प्रस्फुटित करता है।" "कला अराजकता से पलायन है।" शमशेर के अधिक...
"जीवन की तरह कला भी प्रतीति के लयात्मक लीला को प्रस्फुटित करता है।"
"कला अराजकता से पलायन है।"
शमशेर के अधिकांश चित्रों का रचना-काल सन् 1935–52 का कालखंड है। भारतीय चित्रकला के इतिहास में यह कालखंड कई दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है। जिस प्रकार भारत की विभिन्न भाषाओं के साहित्य में वह दौर स्वच्छंदतावाद (रोमैंटिसिज़्म) और यथार्थवाद के बीच संघर्ष का दौर था, उसी प्रकार चित्रकला में भी बंगाल स्कूल के राष्ट्रवादी पुनरुत्थानवादी सौंदर्यशास्त्र और कलकत्ता समूह (1942–43) एवं बंबई के प्रगतिशील कलाकार समूह (प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप, 1947) द्वारा घोषित अंतरराष्ट्रीयतावाद के बीच भी यह संघर्ष का काल कहा जा सकता है।
बंगाल स्कूल का संबंध किसी कालखंड या क्षेत्रीय गतिविधि से न होकर एक शैली-विशेष से है और इस शैली की अधिकांश महत्त्वपूर्ण कृतियाँ 1895–1947 के बीच रची गईं।¹ अवनींद्रनाथ ठाकुर, असितकुमार हालदार, समरेन्द्रनाथ गुप्त, सारदाचरण उकील एवं नंदलाल बसु के चित्र-मुहावरे को यूरोपीय कला के प्री-रैफेलाइट दौर से तुलनीय मानते हुए सुनील कुमार भट्टाचार्य ने लिखा है कि ये सभी कलाकार तरल रेखिक लालित्य, रंग के सपाट प्रतिपादन और रचना में तत्त्वों के बेलबूटेदार चित्रण का सहारा लेते हैं।
अवनींद्रनाथ ने तो अपने चित्रों में पुरातन रंग देने के लिए जापानी रंग-कौशल को आयात किया। चित्र के विषय मुगल-इतिहास से लेकर प्राचीन राजपूत राजाओं के दरबारी वैभव, रामायण, महाभारत और बुद्ध की जातक-कथाओं से लिए गए हैं। इन कलाकारों को भारतीय कला का प्रगीत कवि कहा जा सकता है, क्योंकि वे रंगों में रोमांटिक भावनाओं को प्रतिबिंबित करते हैं। उनके रूप (फॉर्म) शैलीकृत हैं, जिसे उनकी लंबी उँगलियों, मृगनयनों और सर्वांगपूर्ण शारीरिक संरचनाओं के निरूपण में देखा जा सकता है।
पूरा लेख पढ़ें चित्रकार शमशेर लेखक- रमण सिन्हा
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