आदिवासी बस्ती

Indian Camp   :   Ernest Hemingway एक दूसरी डोंगी भी झील के किनारे से लगी खड़ी थी। दो आदिवासी खड़े इन्तज़ार कर रहे थे। निक और उसका पिता डोंग...

Indian Camp : Ernest Hemingway

एक दूसरी डोंगी भी झील के किनारे से लगी खड़ी थी। दो आदिवासी खड़े इन्तज़ार कर रहे थे।

निक और उसका पिता डोंगी के पिछले हिस्से में बैठ गए। आदिवासियों ने उसे धकियाया और उनमें से एक उसे खेने के लिए उसमें जा बैठा। चचा जार्ज शिविर वाली डोंगी के पृष्ठभाग में बैठ गया। इस नाव को जवान आदिवासी ने धकियाया और चचा जार्ज को खे ले जाने के लिए उसमें कूद गया।

दोनों नावों ने अंधेरे में कूच कर दिया। कुहरे में काफी दूर आगे चलती दूसरी डोंगी के चप्पुओं की आवाजें निक सुनता रहा। आदिवासी तेज़ी से और ज़ोर-ज़ोर से चप्पू चला रहे थे। निक पीछे को अपने पिता की बांहों में लिपटकर लेट गया। पानी की सतह पर काफी ठंड थी। उन्हें खेले चलने वाला आदिवासी बहुत सख्त मेहनत कर रहा था लेकिन वह दूसरी नाव कुहरे में लगातार उनसे आगे ही आगे सरकी जाती थी।

"हम कहां जा रहे हैं बापू ?” निक ने पूछा।

"वहां उस आदिवासी बस्ती में एक आदिवासी स्त्री है, जो बहुत बीमार है।"

"अच्छा।" निक बोल उठा।

झील के पार पहुँचने पर दूसरी नाव को उन्होंने किनारे से लगे पाया। अंधेरे में खड़ा चचा जार्ज सिगार पी रहा थाजवान आदिवासी ने नाव को किनारे पर खींच लिया। चचा जार्ज ने दोनों आदिवासियों को पीने के लिए सिगार दिए।

किनारे से एक घास के मैदान में होकर वे बढ़े। मैदान ओस से गीला हो रहा था। लालटेन लिए आदिवासी युवक उनके आगे-आगे चल रहा था। वे जंगल में प्रवेश कर गए और उस पगडंडी पर चलनें लगे जो लट्टे ढोने के लिए बनी उस सड़क से जा मिली थी जो स्वयं पहाड़ियों में प्रवेश कर रही थी। यहां सड़क पर चलना अधिक सहज था क्योंकि दोनों ओर से लकड़ियाँ कट गई थीं। आदिवासी युवक रुका। अपनी लालटेन उसने बुझा दी और वे सब सड़क पर बढ़ने लगे।

एक मोड़ आया। एक कुत्ता भौंकता हुआ कहीं से आ पहुँचा। सामने ही उन झुग्गियों की रोशनियाँ दीख पड़ रही थीं, जिनमें छाल छीलने वाले आदिवासी रहते थे। और अधिक कुत्ते निकलकर उनपर झपटे। दोनों आदिवासियों ने उन्हें वापस झुग्गियों की ओर भगा दिया। सड़क से सबसे पास वाली झुग्गी की खिड़की में एक रोशनी जल रही थी। एक बूढ़ी औरत लैम्प लिए दरवाज़े पर खड़ी थी।

अन्दर लकड़ी के बिस्तर पर एक आदिवासी युवती लेटी थी। दो दिनों से वह बच्चा होने का कष्ट सहन कर रही थी। बस्ती की सभी बूढ़ी औरतें उसकी मदद कर रही थीं। पुरुष दूर सड़क पर अंधेरे में जा बैठे थे और उस स्त्री की चीख-पुकारों की पहुंच से बाहर सिगरेटें पीकर समय काट रहे थे। जैसे ही निक के पिता और चचा जार्ज आगे-आगे और वह और दोनों आदिवासी पीछे-पीछे झुग्गी में घुसे, वह चीखी। वह निचले बिस्तर पर लेटी थी और लिहाफ में लिपटी बहुत बड़ी लग रही थी। उसका सिर एक ओर को मुड़ा था। ऊपर के बिस्तर पर उसका पति लेटा था। तीन दिन पहले उसका पैर एक कुल्हाड़ी से बुरी तरह कट गया था। वह एक पाइप पी रहा था। कमरे में बरी गन्ध भरी हई थी।

निक के पिता ने कुछ पानी अंगीठी पर रखने का आदेश दिया। जब वह गरम हो रहा था, वह निक से बातें करता रहा।

"इस औरत को बच्चा होने वाला है, निक।" उसने कहा।

"मैं जानता हूं।" निक बोला।

"तुम नहीं जानते।" उसके पिता बोले, "सुनो, जिस स्थिति में से यह गुज़र रही है, इसे प्रसव की अवस्था कहते हैं। बच्चा पैदा होना चाहता है। वह भी चाहती है कि वह पैदा हो जाए। उसकी सब पेशियां कोशिश कर रही हैं कि बच्चा पैदा हो जाए। जब यह चीखती है, तब यही कुछ होता है।"

"अच्छा।" निक बोला।

तभी स्त्री फिर चीख उठी।

"डैडी, क्या आप इसे कुछ ऐसा नहीं दे सकते कि इसका चीखना बन्द हो जाए?" निक ने पूछा।

"नहीं, मेरे पास बेहोशी की दवाई नहीं है।" उसके पिता ने कहा, "लेकिन महत्त्वपूर्ण उसकी चीखें नहीं हैं। मैं उन्हें नहीं सुनता, क्योंकि इनका कोई महत्त्व नहीं है।"

ऊपर के बिस्तर पर लेटा पति दीवार से सटकर लुढ़क गया।

रसोई वाली औरत ने डाक्टर को इशारा किया कि पानी गर्म हो गया

है। निक का पिता रसोई-घर में गया और बड़ी केतली से लगभग आधा पानी उसने एक बेसिन में लौट लिया। एक रूमाल में से खोलकर कुछ चीजें उसने केतली में बचे पानी में डाल दीं।

"इन्हें उबलने दो।” उसने कहा और बेसिन के गर्म पानी में शिविर से लाई साबुन की टिकिया से अपने हाथों को रगड़-रगड़कर धोना शुरू कर दिया। सांबुन से पिता के हाथों का एक-दुसरे को रगड़-रगड़ कर धोना निक देखता रहा। उसका पिता अच्छी तरह अपने हाथों को धोता रहा और उससे बातें करता रहा।


"देखो निक, पहले बच्चों के सिर बाहर आने चाहिए, पर कभी-कभी ऐसा नहीं होता। जब ऐसा नहीं होता तब हर एक के लिए वे भारी परेशानी पैदा कर देते हैं। शायद मुझे इस औरत का आपरेशन करना पड़े। हम जरा-सी ही देर में सब जान-समझ लेंगे।"

जब वह अपने हाथों से सन्तुष्ट हो चुका तो अन्दर गया और काम में जुट गया।

"जार्ज, ज़रा इस लिहाफ को पीछे खींच लो।" उसने कहा, "मैं इसे छूना नहीं चाहूँगा।"

बाद में जब उसने आपरेशन करना शुरू किया तो चचा जार्ज और तीन आदिवासी उस स्त्री को थामे रहे। उसने चचा जार्ज की बांह पर काट लिया और चचा जार्ज चिल्ला उठा, "चुड़ैल कहीं की।" जो आदिवासी युवक चचा जार्ज को खेकर लाया था वह हंस पड़ा। निक पिता के पास बेसिन थामे खड़ा रहा। इस सबमें काफी समय लग गया।


उसके पिता ने बच्चे को ऊपर उठा लिया और उसे थपका, जिससे वह साँस लेने लगे। फिर उसे बूढ़ी औरत को पकड़ा दिया।

पा

“देखो निक, यह लड़का है।" उसने कहा, "इस तरह एक डाक्टर बनना तुम्हें कैसा लगता है?"

"ठीक लगता है।” निक ने उत्तर दिया। वह दूसरी ओर देख रहा था, जिससे जो कुछ उसके पिता कर रहे थे, वह न देख सके।

"यह लो, काम ख़त्म हो गया।" उसके पिता ने कहा और कोई चीज़ बेसिन में डाल दी।

निक ने उसे नहीं देखा।

“अब बस, कुछ टाँके लगाने हैं।” उसके पिता ने बताया, "तुम इसे देखो चाहे न देखो। जैसा तुम चाहो, निक। जो हिस्सा मैंने काटा था, उसे सी रहा हूँ।"

निक ने नहीं देखा। बहुत पहले ही उसकी उत्कंठा समाप्त हो चुकी थी।

उसके पिता ने काम ख़त्म किया और खड़ा हो गया। चचा जार्ज और तीनों आदिवासी भी खड़े हो गए। बेसिन कोनिक ने रसोई में रख दिया। चचा जार्ज ने अपनी बाँह देखी। आदिवासी युवक मुस्कराया।

"मैं इसपर कुछ परआक्साइड लगा दूँगा, जार्ज।" डाक्टर ने कहा।

वह आदिवासी औरत पर झुक गया। वह खामोश थी और उसकी आँखें बन्द थीं। वह बहुत पीली दीख रही थी। वह नहीं जानती थी कि उसके बच्चे का या किसी भी चीज़ का क्या बना है।

"मैं सुबह फिर आऊँगा।" डाक्टर ने सीधे खड़े होते हुए कहा, "नर्स सेंट इग्नेस से दुपहर तक यहाँ पहुँच जाएगी और ज़रूरत की हर चीज़ वह ले आएगी।"

वह बहुत प्रसन्नता अनुभव कर रहा था और फुटबाल के खिलाड़ी खेल के बाद कपड़े बदलते हुए जैसे बातें करते हैं, वैसी ही बातें कर रहा था।

"जार्ज, यह तो डाक्टरी पत्रिका में छपने योग्य बात गई है।" उसने कहा, "एक मामूली चाकू से प्रसव का आपरेशन करना और नौफुटी नुकीली आँत की डोरी से उसे सी डालना।"

चचा जार्ज दीवार से लगा खड़ा अपनी बाँह को देख रहा था। "आप सचमुच ही एक महान व्यक्ति हैं।" उसने कहा।

"ज़रा इस भाग्यवान पिता पर भी एक नज़र डाल लेनी चाहिए। इन मामूली मामलों में आम तौर पर सबसे अधिक कष्ट इन्हें ही उठाना पड़ता है,” डाक्टर बोला "मुझे मानना चाहिए कि यह सब वह काफी शान्तिपूर्वक सह गया है।"

आदिवासी के सिर पर से उसने लिहाफ खींचा। उसका हाथ गीला हो उठा। एक हाथ में लैम्प लेकर निचले बिस्तर के सिरे पर वह चढ़ गया। आदिवासी दीवार की ओर चेहरा मोड़े पड़ा था। एक कान से लेकर दूसरे कान तक उसका गला कटा हुआ था। खून बहकर नीचे बिस्तर पर इकट्ठा हो गया था। उसका शरीर उसीमें लुढ़का उसकी बायीं बांह पर टिका था। खुला चाकू कपड़ों में पड़ा था।

"जार्ज, निक को झुग्गी से बाहर ले जाओ।" डाक्टर ने कहा।

पर इसकी कोई ज़रूरत नहीं थी। जब एक हाथ में लैम्प लेकर निक के पिता ने आदिवासी के सिर को पीछे की ओर पलटा था, उस समय रसोई के दरवाज़े में खड़ा निक ऊपर के बिस्तर को अच्छी तरह देख चुका था।

जब लट्ठे ढोने वाली सड़क पर चलकर वे झील की ओर वापस जा रहे थे, तभी दिन निकलना शुरू हुआ था।

"निक्की, मुझे बड़ा अफसोस है कि मैं तुम्हें यहाँ लाया।" उसके पिता ने कहा। आपरेशन के बाद उसकी सारी खुशी जा चुकी थी। "बड़ी ही भीषण घटना तुम्हें देखनी पड़ी।"

"बच्चे पैदा करते समय क्या स्त्रियों को सदा ऐसे ही कष्ट का सामना करना पड़ता है?” निक ने पूछा।

"नहीं, ऐसा बहुत कम होता है।"

"डैडी, उसने अपनी हत्या क्यों कर डाली ?"

“ पता नहीं। मैं समझता हूँ, यह सब वह सह नहीं सका।"

“डैडी, क्या बहुत सारे लोग आत्महत्या कर लेते हैं?"

"बहुत सारे तो नहीं, निक।"

“क्या बहुत सारी औरतें ऐसा करती हैं?"

"शायद ही कभी कोई करती है।"

"वे कभी नहीं करतीं?"

"हाँ, कभी-कभी तो करती हैं।"

"डैडी?"

"हाँ!"

"चचा जार्ज कहाँ गए हैं?"

"वह वापस आ जाएगा।"

“डैडी, क्या मरना बहुत कठिन होता है?"

"नहीं, मैं समझता हूँ काफी आसान है। सब कुछ आदमी पर निर्भर करता है।"

वे नाव में बैठे थे। निक पीछे के हिस्से में था। पिता चप्पू चला रहे थे। सूरज पहाड़ियों से ऊपर उठ रहा था। एक मछली पानी पर घेरा बनाती हुई उछली। निक ने अपना हाथ पानी पर छुआया। सुबह की तेज ठंड में भी वह उसे गर्म-गर्म-सा लगा।

उस सुबह पिता द्वारा खेई जाती नाव के पिछले हिस्से में बैठे उसे निश्चित-सा लग रहा था कि वह कभी नहीं मरेगा।

- अर्नेस्ट हेमिंग्वे 

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