'नयी चाल की हिन्दी' DAY-2

द्वितीय दिवस के पंचम सत्र में कैलिफ़ोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रो. देवेन्द्र शर्मा , जोकि उत्तर भारत की पारंपरिक लोकनाट्य शैली सांगीत-नौ...


द्वितीय दिवस के पंचम सत्र में कैलिफ़ोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रो. देवेन्द्र शर्मा, जोकि उत्तर भारत की पारंपरिक लोकनाट्य शैली सांगीत-नौटंकी (Sāngīt-Nautankī) के एक विख्यात अध्येता, लेखक, निर्देशक और सातवीं पीढ़ी के कलाकार हैं, ने सांगीत पर चर्चा करते हुए कहा कि खयाल, लावनी और अखाड़ों ने संगीत में बहुत योगदान दिया है। उन्होंने चर्चा की कि कैसे प्रिंट संस्कृति (छपाई) के आने से सांगीत गाँवों, कस्बों और शहरों तक पहुँचा और शहरी मध्यम वर्ग के बीच लोकप्रिय हुआ। उन्होंने ‘सांगीत’ शब्द में निहित अलग-अलग अर्थों (स्वाँग, भगत, नौटंकी, ख़याल आदि) के बारे में बताते हुए कहा कि कैसे ‘सांगीत रानी नौटंकी का’ के  बाद  ‘नौटंकी’ शब्द सभी प्रकार के सांगीतों के लिए रूढ़ हो गया। उन्होंने शास्त्र बनाम लोक पर बोलते हुए कहा कि हमारे यहाँ ‘लोक’ को एक व्यापक और अस्पष्ट श्रेणी बना दिया गया है। इसके भीतर अनेक परंपराएँ, विधाएँ और ऐतिहासिक श्रंखलाएँ समाहित हैं, जिनके अर्थ और महत्त्व को हम ठीक से समझ नहीं पाते। चूँकि उन्नीसवीं सदी में प्रकाशन समृद्धि और नगरीय सभ्यता का प्रतीक था, इसलिए सांगीत को ग्रामीण या पारंपरिक अर्थ में केवल ‘folk’ मान लेना अंतिम सत्य नहीं हो सकता। देवेन्द्र शर्मा ने सांगीत में प्रचलित विभिन्न राग आधारित छंदों का गायन भी किया। इस तरह का प्रदर्शन इसे सामान्य विभागीय संगोष्ठी से अलग करता है ।

इसके बाद प्रो. आभा गुप्ता ठाकुर ने हिन्दी नाटकों के संदर्भ में लोकप्रिय साहित्य की बात की।  प्रो. आभा ने कहा कि  मुख्यधारा की आलोचना सदा से लोकप्रिय साहित्य से परहेज़ करती रही है। उन्होंने कहा कि बावजूद इसके कि कुछ कमियाँ हैं पर समस्त रंगधारा को अश्लील कहकर दरकिनार नहीं किया जा सकता। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि नाटक दिनों-दिन अपने दर्शक और प्रेक्षक खो रहा है, एक दिन यह भी कला बनके न रह जाए, हमें इसके लिये चिंतित होना चाहिए।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सहायक आचार्य डॉ.अमितेश कुमार ने लोकप्रिय उपन्यासों और कॉमिक्स के जरिए लोकप्रिय साहित्य पर अपनी बात रखते हुए  हिंदी पॉकेट बुक्स, लोकप्रिय उपन्यासों और कॉमिक्स की विकास यात्रा तथा भारतीय पाठकों के बीच इनके व्यापक प्रभाव पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि इंद्रजाल कॉमिक्स और अमर चित्रकथा से शुरू हुआ सफ़र आगे चलकर डायमंड कॉमिक्स और राज कॉमिक्स तक पहुँचा। चाचा चौधरी, साबू, बहादुर,  बिल्लू, पिंकी जैसे लोकप्रिय किरदारों ने बच्चों और युवाओं के दिलों पर राज किया। बाद में नागराज, भेड़िया, अंगारा जैसे देशी सुपरहीरो की परिकल्पना की गई, जिनमें विज्ञान, पर्यावरण, अंतरिक्ष यात्रा, तकनीक और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे समसामयिक मुद्दों को पिरोया गया था। गुलशन नंदा, ओमप्रकाश शर्मा और वेदप्रकाश काम्बोज जैसे जनप्रिय लेखकों ने पॉकेट बुक्स के दौर में अभूतपूर्व लोकप्रियता हासिल की।  हिंदी पॉकेट बुक्स, मनोज पॉकेट बुक्स, राजा पॉकेट बुक्स और डायमंड पॉकेट बुक्स जैसे बड़े प्रकाशकों ने इस क्रांति का नेतृत्व किया। रेलवे स्टेशनों पर स्थित ए. एच. व्हीलर के स्टॉलों ने इन उपन्यासों को देश के छोटे-छोटे शहरों और कस्बों तक पहुँचाने में बेहद महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।  उन्होंने कहा कि लोकप्रिय और मुख्य धारा में एक बीच का राश्ता इख्तियार करने की ज़रूरत है। यद्यपि इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल मनोरंजन के आगमन से पॉकेट बुक्स और कॉमिक्स का बाजार सीमित हुआ है, लेकिन भारतीय पाठकों के बीच पढ़ने का संस्कार गढ़ने और हिंदी साहित्य को जन-जन तक पहुँचाने में इस दौर का ऐतिहासिक योगदान हमेशा स्मरणीय रहेगा।

सी.एस.डी.एस से जुड़े रविकांत ने ‘फिर भी दिल है इंग्लिश्तानी’ विषय के माध्यम से अपनी बात रखते हुए कहा कि सिनेमा भी हर चीज का एक विशाल अभिलेखागार है, गरज़ कि हर चीज श्रव्य-दृश्य फ्रेम में आ पाए। नेहरूवादी परिवार को केंद्र में रखकर बनी फ़िल्म ‘तीन बत्ती चार रास्ता’, जिसका निर्देशन व्ही. शांताराम ने किया था, के एक दृश्य के माध्यम से उन्होंने यह बताने का प्रयास किया कि नेहरू के विचार में सभी भाषाओं के प्रति सम्मान का भाव होते हुए भी व्यावहारिकता में हिन्दी की तरफ़ कितना झुकाव था। इसके बाद उन्होंने सत्तर के दशक की ‘साधु और शैतान’  की बात की और अंत में ‘ऐ दिल है मुश्किल’  के चर्चित ‘द ब्रेकअप सॉन्ग...’ के हवाले से हिन्दी के लोकप्रिय प्रयोग को समझाया। उन्होंने कहा कि कोई भी जुबान शुद्ध होती ही नहीं है, उसमें मिलावट होती ही होती है। साहित्य का ऋणी सिनेमा हमेशा रहेगा, उसका भुगतान अभी करना बाकी है।

उन्होंने यह भी कहा कि सिनेमा टेक्नोलोजी अपने अल्फ़ाज़ लाती है, उसकी हिन्दी अभी उपलब्ध नहीं हो पाई है, वो अंग्रेजी में ही हैं, भले ही उसकी लिपि नागरी है।

छठे सत्र में विख्यात इतिहासकार सुधीर चंद्र ने परंपरा, आधुनिकता और औपनिवेशिक भारतीय साहित्य पर चर्चा करते हुए स्पष्ट किया कि इतिहास को केवल विरोधी खानों (जैसे-राजभक्त बनाम राष्ट्रभक्त, सुधारवादी बनाम पुनरुत्थानवादी, या गरम दल बनाम नरम दल) में बाँटकर नहीं समझा जा सकता। औपनिवेशिक काल के प्रबुद्ध जन विषम परिस्थितियों में कार्य कर रहे थे। भारतेंदु हरिश्चंद्र के उदाहरण से इस द्वंद्व को समझाते हुए वक्ता ने उनकी समस्यापूर्ति रचनाओं का उल्लेख किया, जहाँ एक ओर विक्टोरिया के राज्य की प्रशंसा में पंक्तियाँ थीं, वहीं दूसरी ओर देश की दुर्दशा, टैक्स के बोझ और आर्थिक शोषण पर तीखा प्रहार भी था। इसी तरह उनके नाटक 'विषस्य विषमौषधम्' में अंग्रेजों के स्थिर राज्य की कामना के साथ-साथ 'भारत की नित्य विजय' का भाव भी समाहित है। औपनिवेशिक भारत के बौद्धिक इतिहास और 1857 के विद्रोह के विविध पक्षों पर विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीयों एवं बंगाली बुद्धिजीवियों की प्रतिक्रियाएं केवल एकतरफा आलोचना नहीं थीं, बल्कि उनमें विषम परिस्थितियों की गहरी पेचीदगी थी, एक विद्यार्थी और शोधार्थी के नाते हमारा सबसे बड़ा धर्म सत्य की खोज है। यह धर्म नागरिक धर्म से भी ऊँचा है। इसके लिए निरंतर संदेह और आत्म-संदेह का भाव बनाए रखना आवश्यक है, क्योंकि हमारा ज्ञान सीमित है और नई सामग्रियों के प्रकाश में आने पर विचारों में बदलाव की गुंजाइश हमेशा रहनी चाहिए। इतिहास को किसी बने-बनाये खांचे में बाँधने के बजाय उसकी जटिलताओं और विषम परिस्थितियों को समझना ही सच्चे शोधार्थी का मूल धर्म है।

टेक्सॉस विश्वविद्यालय के तुषार श्रीवास्तव ने ‘तीन आयाम: छायावादी, प्रगतिशील और प्रयोगवादी शिल्प एवं हिन्दी का एतिहासिक दर्पण’ विषय पर अपनी बात रखी। तुषार ने सज्जाद ज़हीर के भारत लौटने और 1936 में लखनऊ में प्रेमचंद की अध्यक्षता में हुए प्रथम अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक सम्मेलन की पृष्ठभूमि से अपनी बात आरंभ की। उन्होंने नामवर सिंह की आलोचना-दृष्टि के आधार पर छायावाद को वैयक्तिक अभिव्यक्ति, कल्पना और आधुनिक ऐतिहासिक चेतना से जोड़ते हुए कहा कि यह अपने समय के सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनों का साहित्यिक प्रतिबिंब था। इसके बाद उन्होंने छायावाद और प्रगतिवाद को परस्पर विरोधी न मानकर साहित्यिक विकास की निरंतर प्रक्रिया के रूप में देखने पर बल दिया। प्रगतिवाद ने ‘लोकमंगल’ की अवधारणा को आगे बढ़ाते हुए ‘जनता के साहित्य’ की धारणा को स्थापित किया।

उन्होंने प्रगतिशील साहित्य पर पश्चिमी मार्क्सवाद के प्रभाव के आरोप का खंडन करते हुए उसके भारतीय सामाजिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक संदर्भों को रेखांकित किया और निराला, राहुल सांकृत्यायन, यशपाल, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, रामविलास शर्मा आदि रचनाकारों के योगदान का उल्लेख किया तथा प्रगतिशील साहित्य को कला-विरोधी मानने की धारणा पर भी प्रश्न उठाया। अंततः उन्होंने नामवर सिंह के विचारों के सहारे यह प्रतिपादित किया कि साहित्य और इतिहास एक-दूसरे के सहचर हैं तथा छायावादी और प्रगतिवादी साहित्य को अलग-अलग खाँचों में नहीं, बल्कि आधुनिक भारतीय इतिहास, समाज और साहित्य की परस्पर जुड़ी हुई निरंतर प्रक्रिया के रूप में समझा जाना चाहिए।

प्रो. नीरज खरे ने हिन्दी कथा साहित्य और आधुनिकता के अंतर्संबंधों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए आधुनिकता के विविध आयामों तथा उनके हिन्दी कथा साहित्य पर पड़े प्रभाव की विवेचना की। उन्होंने कहा कि हिंदी कथा-साहित्य में आधुनिक चेतना का विकास आरंभिक कहानियों से ही दिखाई देता है। ‘दुलाईवाली’ में पर्दा-प्रथा का विरोध और शिवपूजन सहाय की ‘कहानी का प्लॉट’ में स्त्री की स्वतंत्रता, विधवा-विवाह और पितृसत्ता के प्रश्न आधुनिकता के महत्त्वपूर्ण उदाहरण हैं। प्रेमचंद के साथ हिंदी कहानी और उपन्यास में आधुनिकता को निर्णायक दिशा मिली और ‘कफ़न’ को आधुनिकता-बोध की महत्त्वपूर्ण कहानी माना गया।

साठोत्तरी दौर में आधुनिकता का प्रभाव कथ्य के साथ-साथ कहानी के शिल्प और रूप पर भी पड़ा। ‘अकहानी’ के माध्यम से पारंपरिक कहानी के रूप और शिल्प को चुनौती दी गई। समकालीन कथा-साहित्य में आधुनिकता के प्रश्न उपभोक्तावाद, बाजारवाद और बदलते सामाजिक संबंधों के संदर्भ में नए रूप ग्रहण कर रहे हैं। इस प्रकार हिंदी कथा-साहित्य में आधुनिकता कोई स्थिर अवधारणा नहीं, बल्कि बदलते समय और सामाजिक परिस्थितियों के साथ निरंतर विकसित होने वाली चेतना है।

टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान के कुलपति प्रो. बद्री नारायण ने औपनिवेशिकता और आधुनिकता पर बातचीत करते हुए 'आधुनिकता के देशज रूप' और 'देशज आधुनिकता' के बीच के अंतर को रेखांकित किया। अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक सोच ने हमारे पारंपरिक समय और जीवन-शैली को घड़ी और कैलेंडर के एक रेखीय ढाँचे में बाँधने का काम किया। उन्होंने स्विट्ज़रलैंड का उदाहरण देते हुए कहा कि पश्चिमी समाज में घड़ी केवल समय बताने का माध्यम नहीं, बल्कि पश्चिमी आधुनिकता का एक बड़ा प्रतीकात्मक रिफ्लेक्शन रही है। इसके विपरीत, हमारे ग्रामीण और पारंपरिक भारतीय समाज में समय का संचालन प्राकृतिक और सामाजिक क्रियाकलापों–जैसे फूलों के खिलने, मंदिरों-स्कूलों की घंटियों और साँझ-गधबेरा जैसी अवधारणाओं से सहज रूप से होता था। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यदि आधुनिकता का अर्थ प्रश्न करना, आत्म-विश्लेषण और संवाद है, तो यह परंपरा भारतीय, अफ़्रीकी और लातिनी अमेरिकी समाजों में प्राचीन काल से ही मौजूद रही है। उन्होंने कहा कि वैदिक चिंतन, बौद्ध विमर्श और चार्वाक दर्शन से लेकर मध्यकालीन भक्ति आंदोलन में कबीर, रविदास और शिवनारायण जैसे संतों तक–सभी ने समाज और समय पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। प्रो. बद्री ने कहा कि अब समय आ गया है कि हम केवल पश्चिमी सिद्धांतों के उत्तर देने या उनके संदर्भ देने तक सीमित न रहें, बल्कि अपने एथ्नोग्राफिक अध्ययनों और साहित्य के माध्यम से अपनी 'देशज आधुनिकता' का एक सशक्त सिद्धांत तैयार करें।

प्रो. अरुण कमल ने आधुनिकता और कविता पर वक्तव्य देते हुए कहा कि हिंदी में आधुनिकता का प्रारंभ उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के विरोध से हुआ, जिसने भारतीय संस्कृति और अस्मिता को बचाए रखा। संस्कृति का दायरा केवल धार्मिक स्थलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक सौंदर्यबोध और मानवीय चेतना से जुड़ी है। छायावादी कवियों (प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी) ने अपनी शुरुआती रचनाएँ ब्रजभाषा में लिखने के बाद खड़ी बोली को अपनाया और भाषा का निर्माण किया। अज्ञेय और निराला जैसे कवियों ने कविता को छंदों के बंधन से मुक्त किया, जिसकी प्रेरणा उन्होंने संस्कृत से ली। आधुनिक कविता ने छंदों के पारंपरिक बंधनों से मुक्त होकर समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति (जैसे भिक्षुक, पत्थर तोड़ती स्त्री) के जीवन को अपनी संवेदना का केंद्र बनाया। । आधुनिक हिंदी कविता केवल भावों की अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि यह उपनिवेशवाद और पूंजीवादी मूल्यों के विरुद्ध प्रतिरोध की एक सशक्त भाषा है।

उन्होंने कहा कि श्रेष्ठ कविता किसी वस्तु या व्यापार की तरह ख़रीदी-बेची नहीं जा सकती। यह मनुष्य के मांस और उसकी आत्मा की तरह अभिन्न तथा अद्वितीय है। कवियों ने अपने इतिहास, पौराणिक मिथकों और थेरीगाथाओं में जाकर 'कामायनी' और 'राम की शक्ति पूजा' जैसी महान कृतियों की रचना की। महादेवी वर्मा ने 'भावात्मक विचार' और 'विचारात्मक भाव' की अवधारणा दी, जो आगे चलकर मुक्तिबोध के 'ज्ञानात्मक संवेदना' सिद्धांत से जुड़ती है। जयशंकर प्रसाद के अनुसार, संस्कृति मंदिर-मस्जिद से परे प्रांतरों में नए सौंदर्यबोध को स्थापित करती है, इसका संबंध किसी एक धर्म से नहीं है। निराला के अनुसार, हिंदी, उर्दू (नज़ीर, ग़ालिब) और विश्व साहित्य मिलकर साहित्य की एक 'समतल/संमेलन भूमि' का निर्माण करते हैं, क्योंकि एक-देशीयता हमेशा संकीर्णता को जन्म देती है।

अंत में उन्होंने कहा कि हिन्दी कविता आज भी विश्व साहित्य के साथ सामंजस्य बिठाते हुए समतल भूमि पर समानता और मानवीय मूल्यों की खोज कर रही है।

सप्तम सत्र में प्रो. अर्चना कुमार ने लोक की बदलती भाषा पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि लोक में निरंतर परिवर्तन होते रहते हैं, इसलिए जिस समय और जिन लोगों के बीच गीतों को जाना, सुना और साझा किया गया, उसी अनुभव से लोक को समझना आवश्यक है। लोक मुख्यतः मौखिक और प्रदर्शनात्मक है। इसमें केवल भाषा नहीं, बल्कि सुर, स्वर और गायन भी शामिल हैं। इसलिए लोक की भाषा को केवल लिखित पाठ के आधार पर नहीं समझा जा सकता।

महिलाओं के संदर्भ में यह मानना उचित नहीं है कि वे बोलती नहीं हैं। महिलाएँ बोलती हैं और अपने अनुभवों को अपने स्थान और परिस्थितियों के भीतर व्यक्त करती हैं। सीता के वनवास से जुड़े लोकगीत में राम को लव-कुश के जन्म की सूचना न देने का प्रसंग इसी प्रकार की स्त्री-अभिव्यक्ति का उदाहरण है। यह तथ्यात्मक रूप से सही है या नहीं, यह महूत्त्वपूर्ण नहीं है; महत्त्वपूर्ण यह है कि लोक की स्त्रियों ने राम के व्यवहार के प्रति अपनी पीड़ा और प्रतिक्रिया को किस प्रकार गीत में व्यक्त किया।

महाभारत, विष्णुदास के पांडवचरित और छत्तीसगढ़ी पांडवानी के उदाहरण से यह भी सामने आता है कि लोक में शास्त्रीय कथाएँ अपने अलग रूप ग्रहण करती हैं। पांडवानी में भीम नायक हैं और द्रौपदी अपने अपमान के प्रतिकार के लिए भीम का सहारा लेती हैं।

भाषा में भी परिवर्तन दिखाई देता है। छत्तीसगढ़ी पांडवानी में हिंदी का प्रयोग बढ़ा है, विशेषकर जब लोककला स्थानीय परिवेश से निकलकर बड़े मंचों और देश-विदेश तक पहुँचती है। इसके विपरीत महिलाओं के बीच गाए जाने वाले अवधी, भोजपुरी और अन्य लोकगीतों में स्थानीय भाषा का प्रयोग अधिक दिखाई देता है।

डिजिटल माध्यमों के आने से लोक समाप्त नहीं हो रहा है। लोक नए माध्यमों के साथ भी जीवित है। भोजपुरी गीतों को सुनने वाला व्यक्ति कैसेट या डिजिटल माध्यम का उपयोग कर सकता है, लेकिन उसके लिए वह गीत उसके लोक का ही हिस्सा है। इसलिए लोक को केवल पारंपरिक रूप तक सीमित नहीं किया जा सकता।

प्रो. विद्योत्तमा मिश्र ने अवधी लोक संस्कृति में राम की उपस्थिति पर चर्चा करते हुए कहा कि लोक संस्कृति को केवल अशिक्षित या गंवई लोगों की संस्कृति मानना उचित नहीं है। लोक में समाज, प्रकृति, अनुभव, लोक-विश्वास, लोक-व्यवहार और मनुष्य की सूक्ष्म दृष्टि सब शामिल हैं। इसमें स्थानीयता तो रहती है, लेकिन अपने स्थानीय रंग के साथ वह सार्वभौमिक भी होती है। लोक संस्कृति संवाद, आत्मीयता, आनंद और प्रकृति से जुड़ी संस्कृति है, जो परंपरा को पोषण देकर आगे बढ़ाती है।

इसी लोक संस्कृति के व्यापक संदर्भ में अवधी संस्कृति आती है, जिसमें अनेकता के भीतर एकता दिखाई देती है। अवधी संस्कृति प्रीति, भक्ति, कृतज्ञता, प्रकृति से संवाद, लोक-विश्वास और संस्कारों की संस्कृति है। इसमें राम केवल ईश्वर नहीं, बल्कि घर के सदस्य हैं। इसलिए राम से अवधी समाज का संबंध आत्मीयता का है–उनसे रूठना, उन्हें मनाना और सुख-दुःख में उन्हें अपने साथ पाना इस संस्कृति की विशेषता है।

अवधी संस्कृति में राम प्रीति और भक्ति के केंद्र हैं। दशरथ का राम-वियोग में प्राण त्यागना, निषाद और वनवासियों की राम के प्रति आत्मीयता तथा प्रजा का राम के वनवास को अपना वनवास मानना इसी प्रीति को व्यक्त करता है। केवट, शबरी और हनुमान के प्रसंग भक्ति को सामने लाते हैं, जबकि जटायु के प्रति राम की कृतज्ञता कृतज्ञता की संस्कृति को व्यक्त करती है। लोकगीतों में राम की निरंतर उपस्थिति और प्रकृति से संवाद करते हुए कौशल्या का राम को याद करना बताता है कि अवधी लोकजीवन में राम पीढ़ी-दर-पीढ़ी आत्मीय और जीवंत उपस्थिति के रूप में बने हुए हैं।

लोकसाहित्य के व्याकरण का विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए प्रो. बद्री नारायण ने लोक संस्कृति और लोक साहित्य की प्रकृति को विभिन्न लोककथाओं और गीतों के उदाहरणों से स्पष्ट किया गया। ओड़िशा की एक आदिवासी कथा के माध्यम से बताया कि लोक साहित्य केवल भोगे हुए अनुभव का साहित्य नहीं है, बल्कि दूसरे के अनुभव को सहानुभूति, संवेदना और कल्पना के माध्यम से ग्रहण करने की क्षमता भी रखता है। स्वामी शिवनारायण के गीत और भिखारी ठाकुर के स्त्री-दुःख से जुड़े गीत इसके उदाहरण हैं।

उन्होंने लोक की बहुलता और निरंतर विस्तार को उसकी प्रमुख विशेषता बताया। लोक किसी एक व्यक्ति से आरंभ होकर धीरे-धीरे सबका हो जाता है और उसमें लोग अपने अनुभव जोड़ते रहते हैं। कबीर के नाम से प्रचलित अनेक पद तथा रामकथा के विभिन्न स्थानीय रूप इसी प्रक्रिया को दिखाते हैं। इसलिए लोक साहित्य स्थिर नहीं होता, बल्कि निरंतर बदलता और समृद्ध होता रहता है।

लोक संस्कृति की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता समाज, संस्कृति और प्रकृति के बीच जैविक संबंध है। लोकगीतों में पेड़-पौधों, पक्षियों, नदियों और मिट्टी के प्रति संवेदना दिखाई देती है। यह दृष्टि केवल वर्तमान नहीं, बल्कि भविष्य और जीवन की स्थिरता की भी चिंता करती है। इस प्रकार लोक की शक्ति उसकी संवेदनशीलता, बहुलता, निरंतरता और सबको अपने भीतर समाहित करने की क्षमता में निहित है।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रो. साधना नैथानी ने 'लोक साहित्य की अंग्रेज़ी चाल और उसका चालक' विषय पर रामगरीब चौबे और विलियम क्रूक के बहाने गहन चर्चा करते हुए कहा कि 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों को यह अहसास हुआ कि संस्कृत या फारसी के अध्ययन से आम जनता के मन को नहीं समझा जा सकता। इसके परिणामस्वरूप भारत के लोक साहित्य की खोज शुरू हुई, जिसमें मिशनरियों, प्रशासकों और मानव विज्ञानियों ने भाग लिया।19वीं सदी की शुरुआत में 'ब्रदर्स ग्रिम' (Brothers Grimm) द्वारा जर्मन लोककथाओं के सफल संग्रह के बाद पूरे यूरोप में लोक साहित्य के अध्ययन की लहर आई। थियोडोर बेनफे (Theodor Benfey) के सिद्धांत ने इस बात को बढ़ावा दिया कि भारतीय लोककथाएं यूरोपीय लोककथाओं का मूल स्रोत थीं। लोक साहित्य बोलचाल की बोलियों में था, जबकि ब्रिटिश प्रशासक शास्त्रीय भाषाओं (संस्कृत/फारसी) से परिचित थे। मिशनरियों ने स्थानीय लोगों के बीच रहकर भाषा सीखने का दावा किया, महिला संग्रहकर्ताओं ने घरेलू नौकरों के माध्यम से कहानियां एकत्र कीं और प्रशासकों ने वैज्ञानिक संग्रह बनाए और देशी सहायकों की मदद ली।

विलियम क्रुक ने उत्तर भारत (संयुक्त प्रांत/वर्तमान उत्तर प्रदेश) के धर्म, लोक साहित्य, जनजातियों और जातियों पर गहन अध्ययन किया। साधना नैथानी ने 1996 में शोध के दौरान अप्रकाशित पांडुलिपियां ढूँढ निकालीं। ये पांडुलिपियां एक फाइल में थीं जिस पर 'Revenue Code Department 2' लिखा था। पांडुलिपियों पर दो लिखावटें थीं-विलियम क्रुक की और पंडित राम गरीब चौबे की। चौबे जी के हस्ताक्षरों से यह सिद्ध हुआ कि उन्होंने 158 लोककथाओं का अनुवाद किया था और वे केवल एक साधारण लिपिक या मुंशी नहीं थे, बल्कि लोक साहित्य और मानवशास्त्र के ज्ञाता थे।

चौबे जी ने भोजपुरी, अवधी, ब्रज आदि बोलियों की मौखिक कहानियों को अंग्रेजी में अनूदित किया। पांडुलिपियों में कहानी सुनाने वाले व्यक्ति का नाम, गाँव और जिला तक दर्ज था, जो उस दौर के यूरोपीय संग्रहों में भी दुर्लभ था। साधना नैथानी ने चौबे जी द्वारा अनूदित कुछ रोचक और अनूठी कहानियों के उदाहरण साझा किए। योगी और अग्नि की कहानी, चार भाइयों की दुखद एवं आधुनिक शैली की कहानी और  धोबिन और पंडित का संवाद आदि। साधना नैथानी अंत में हिंदी साहित्य के विद्वानों के सामने यह प्रश्न छोड़ती हैं कि मौखिक परंपरा और लोककथाएँ हमारे साहित्यिक इतिहास में इतनी महत्वपूर्ण क्यों नहीं मानी गईं, जबकि ये हमारी संस्कृति और सामाजिक यथार्थ का एक जीवंत हिस्सा हैं।

अष्टम सत्र में अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली के प्रो. सलिल मिश्र ने उन्नीसवीं सदी की हिन्दी की साहित्यिक एवं राजनीतिक प्रवृत्तियों पर अपने विचार प्रस्तुत किए।  सलिल मिश्र के अनुसार, हिंदी के इतिहास को अक्सर दो विरोधी दृष्टिकोणों (विरोधाभासी छवियों) में देखा जाता है- विक्टिम (Victim/पोषित):जहाँ माना गया कि हिंदी को अंग्रेजी, उर्दू या अंग्रेजों द्वारा दबाया गया और  कल्प्रीट (Culprit/मुल्जिम): जहाँ आरोप लगा कि हिंदी ने ब्रजभाषा या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को दबाने का काम किया।

उनका प्रयास हिंदी को 'पवित्रीकरण' (Sacralization) और 'अवमूल्यन' (Denigration) के इन दोनों लेबलों से बाहर निकालकर देखने का रहा। 19वीं सदी के दूसरे हिस्से ने हिंदी की सीमाओं , स्वरूप और दिशा को काफी हद तक निर्धारित किया।1837 में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा प्रशासनिक भाषा फारसी से बदलकर अंग्रेजी की गई और मध्यदेश  में उर्दू/हिन्दुस्तानी डिफॉल्ट भाषा बनी। इस फैसले ने हिंदी के नए रास्ते खोले और पुराने रास्ते बंद किए।  यह 1860 के बाद हिंदी और उर्दू (या हिंदी आंदोलन/नागरी आंदोलन) के बीच सरकारी संरक्षण (Official Patronage) और पहचान की लड़ाई के रूप में सामने आया। इसमें नागरी लिपि और हिंदी भाषा को अदालतों, नौकरियों और शिक्षा में स्थान दिलाने की मांग की गई, जो अंततः सन 1900 में नागरी लिपि को स्वीकृति मिलने के साथ एक महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुँची।

नागरी आंदोलन केवल नौकरियों या पहचान का मामला नहीं था; इसमें लोकतांत्रिक आकांक्षाएँ, साक्षरता का प्रसार और सांस्कृतिक पहचान की तलाश भी शामिल थी। मध्यदेश (यूपी/बिहार) में आधुनिक राजनीति की शुरुआत इसी भाषा/नागरी आंदोलन से मानी जा सकती है। 20वीं सदी में हिंदी साम्राज्यवाद-विरोधी (Anti-Imperialist) संघर्ष से जुड़ी, फिर भी उस पर 19वीं सदी के भाषा-विभाजन और विरासत की छाया बनी रही।

डॉ. राजीव रंजन गिरि ने 'उन्नीसवीं सदी में कविता की भाषा का प्रश्न : संदर्भ-ब्रजभाषा बनाम खड़ी बोली' विषय पर वक्तव्य दिया। उन्होंने कहानी के माध्यम से अपनी बात शुरू की,उनकी शैली से हम सब वाकिफ ही हैं । वे कहते हैं कि कहानी शुरू होती है 1887 में, जब अयोध्याप्रसाद खत्री यह महसूस कर रहे थे कि बिहार में, जो उस समय बंगाल प्रांत का हिस्सा था, गद्य और पद्य की भाषा अलग-अलग थी—क्रमशः खड़ी बोली और ब्रज। उन्होंने इस संबंध में उस समय के वरिष्ठ साहित्यकारों से बात की और अंततः स्वयं ही ‘खड़ी बोली का पद्य’ नाम से एक किताब छपवाई और इसे हिंदी के प्रमुख लेखकों को भेजकर खड़ी बोली में कविता लिखने का आग्रह किया। प्रताप नारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट, ग्रियर्सन और भारतेंदु हरिश्चंद्र जैसे प्रभावशाली साहित्यकार खड़ी बोली में कविता की संभावना को लेकर आशंकित थे। खत्री ने इसी धारणा का विरोध किया और भारतेंदु की प्रतिष्ठा को चुनौती देते हुए ‘एक अग्रवाल के मत पर एक खत्री की समालोचना’ प्रकाशित की।

 राजीव रंजन गिरि बताते हैं कि जो लोग उस संग्रह में शामिल थे, उन्होंने ख़ुद कविता में खड़ी बोली का विरोध किया। इसके प्रमाण के लिए उन्होंने कई पत्रिकाओं के संदर्भ सामने रखे। भारतेंदु खड़ी बोली से किस प्रकार राब्ता रखते हैं, इसे परखने के लिए उन्होंने ‘भारत दुर्दशा’ नाटक की ओर इशारा किया, जिसमें भारत-दुर्दैव खड़ी बोली में कविता करता है। आगे चलकर महावीर प्रसाद द्विवेदी के प्रभाव और छायावाद के आगमन के साथ खड़ी बोली कविता की स्वीकृति स्थापित हुई। इस प्रकार अयोध्या प्रसाद खत्री का संघर्ष हिंदी कविता को ब्रजभाषा की परंपरा से निकालकर खड़ी बोली में प्रतिष्ठित करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास था।

कोलम्बिया विश्वविद्यालय से प्रो. तिमसाल मसूद ने उर्दू मर्सियों में हिन्दी किरदारों की उपस्थिति और उनके सांस्कृतिक महत्त्व पर चर्चा की। वह इस बात पर प्रकाश डालते  हैं कि किस प्रकार मर्सिया और पुरानी शायरी में भारतीय संवेदनाओं, अवधी लोक-संस्कृति, और स्थानीय भाषा के तत्त्वों को शामिल किया गया है। मर्सिया में अरब के ऐतिहासिक पात्रों (जैसे हज़रत इमाम हुसैन और उनका परिवार) की भावनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए अवध की ज़बान, विरहिणी और बारहमासा जैसे भारतीय साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संदर्भों का प्रयोग किया गया है।

तिमसाल मसूद ने खलीफा सिकंदर द्वारा लिखे गए मर्सिया के कुछ अंश पढ़कर सुनाए, जिसमें बीवी बानो के विलाप (Lamentation) को अवधी/पुरानी हिंदी-उर्दू के मिले-जुले रूप में दर्शाया गया है:"बन करबल में बानो दुखिया नैना नीर बहावत है..."

   "दिल की तह की कही नहीं जाती, नाज़ुक हैं अस्रार बहुत,

   अंछर तो हैं इश्क़ के दो ही, लेकिन है बिस्तार बहुत।"

मीरा तकी मीर के इस शेर का उदाहरण देते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि मीर की शायरी में 'अंछर' (अक्षर) और 'बिस्तार' (विस्तार) जैसे तत्त्व मिलते हैं। अंत में उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि यदि उर्दू वाले इसे "पुरानी चाल की उर्दू" कहते हैं, तो हिंदी साहित्यकारों के पास भी यह दावा करने का एक बेहतरीन अवसर है कि मीर तकी मीर हिंदी के कवि हैं!

प्रो. इसाबेल हकूजा आलोनसों ने 'अमीन सयानी, रेडियो सीलोन और हिन्दुस्तानी की विचारधारा' विषय पर व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए हिन्दुस्तानी भाषा, रेडियो प्रसारण और लोकप्रिय संस्कृति के अंतर्संबंधों पर प्रकाश डाला।

इजाबेल अपनी पुस्तक Radio for the Millions पर चर्चा करते हुए कहती हैं कि इसमें 1930 के दशक से 1980 के दशक के दौरान दक्षिण एशिया (विशेषकर भारत और पाकिस्तान) में रेडियो, भाषा (हिन्दुस्तानी) और लोकप्रिय संस्कृति के प्रभाव और इतिहास का विश्लेषण किया गया है। राजनीतिक विभाजन और सीमाओं के बावजूद, रेडियो की तरंगों ने भारत और पाकिस्तान के बीच एक साझा सांस्कृतिक मंच बनाए रखा। रेडियो का इतिहास केवल तकनीकी इतिहास नहीं है, बल्कि यह दक्षिण एशिया के इतिहास (द्वितीय विश्व युद्ध, स्वतंत्रता, विभाजन और 1965 के युद्ध) से अटूट रूप से जुड़ा हुआ है।

उन्होंने कहा कि हिन्दुस्तानी केवल हिंदी और उर्दू का व्याकरणिक मिश्रण नहीं है; यह एक उदारवादी प्रतीक, सांप्रदायिक सौहार्द की भावना और क्षेत्रीय पहचानों को जोड़े रखने वाली साझा भाषा (Lingua Franca) थी। 'रेडियो सीलोन' और अमीन सयानी के 'बिनाका गीतमाला' जैसे कार्यक्रमों ने हिंदी फिल्म संगीत को जन-जन तक पहुँचाया और पार्श्व गायकों को सुपरस्टार बनाया। आज के कलाकार' जैसे कार्यक्रमों ने तलत महमूद जैसे पार्श्व गायकों को बड़े अभिनेताओं के समकक्ष लोकप्रियता दिलाई।

आगे वह बताती हैं कि जहाँ भारत और पाकिस्तान की सरकारों ने क्रमशः क्लिष्ट हिंदी और उर्दू को राष्ट्रभाषा के रूप में थोपने का प्रयास किया, वहीं रेडियो पर हिन्दुस्तानी भाषा लोकप्रिय बनी रही। हिन्दुस्तानी ने बिना किसी की क्षेत्रीय या भाषाई पहचान को खतरे में डाले, विभिन्न भाषाई समूहों को आपस में जोड़ा। जहाँ प्रिंट और लिखित दस्तावेजों में यह माना गया कि 1947 के विभाजन ने हिन्दुस्तानी को खत्म कर दिया, वहीं रेडियो रिकॉर्ड्स यह साबित करते हैं कि 1980 के दशक तक हवा में हिन्दुस्तानी भाषा फलती-फूलती रही।


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