भाग- १ साहित्य , अनुभव और भाषा के अंतर्संबंधों पर वरिष्ठ साहित्यकार हरीचरन प्रकाश से बीते दिनों हुई यह बातचीत उनके दीर्घ साहित्य...
भाग- १
साहित्य, अनुभव और भाषा के अंतर्संबंधों पर वरिष्ठ साहित्यकार हरीचरन प्रकाश से
बीते दिनों हुई यह बातचीत उनके दीर्घ साहित्यिक अनुभव और रचना-दृष्टि को निकट से
समझने का एक महत्त्वपूर्ण अवसर है। बातचीत में वे कहानी की संरचना, भाषा की प्रकृति और रचना के पीछे सक्रिय अनुभव, स्मृति
तथा जीवन-संदर्भों को लेकर बेबाकी से अपने विचार रखते हैं। उनके लिए साहित्य
केवल शब्दों में अभिव्यक्त कोई विचार नहीं, बल्कि
जीवन के अनुभवों से निर्मित वह संवेदनात्मक संसार है, जिसमें
कही हुई बात के साथ अनकहा भी अपनी अर्थवत्ता रखता है।
इस
संदर्भ में अर्नेस्ट हेमिंग्वे का उल्लेख विशेष रूप से ध्यान खींचता है।
हेमिंग्वे के ‘आइसवर्ग सिद्धांत' के बहाने बातचीत इस बुनियादी सवाल तक पहुँचती है कि कहानी में जो दिखाई और
सुनाई देता है, उसके पीछे कितना कुछ ऐसा भी होता है जो
प्रत्यक्षतः कहा नहीं जाता, लेकिन रचना के अर्थ को गहराई
देता है। संकेत, मौन, संक्षिप्तता और
पाठक की सक्रिय भागीदारी पर हुई चर्चा साहित्य की सृजन-प्रक्रिया को एक अलग और
अधिक सूक्ष्म दृष्टि से देखने का अवसर देती है।
यह
बातचीत साहित्य के बदलते समय, उसकी भूमिका
और रचनाकार की जिम्मेदारी जैसे प्रश्नों को भी छूती है। प्रस्तुत संपादित अंश में
हरीचरन प्रकाश का यह विश्वास विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि महाभारत विश्व का
सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक ग्रंथ है।
-प्रदीप श्रीवास्तव
हेमिंग्वे
की प्रतिभा से चमत्कृत होने के बावजूद मेरा मत यही है कि उनका सिद्धान्त कोई
सार्वदेशिक सिद्धान्त नहीं हो सकता हैः हरीचरन प्रकाश
हेमिंग्वे
जैसी छरहरी और वसाहीन कहानियाँ लिखना आसान नहीं है:हरीचरन प्रकाश
सिंधियों
को तो कुछ भी नहीं मिला। भारत में उन्हें कोई होमलैंड नहीं मिला, इसलिए पूरा भारत सिंधियों का होमलैंड हो गयाः हरीचरन प्रकाश
वर्णवादी
वर्चस्व का भौगोलिक विस्तार भारत में सर्वव्यापी नहीं है: हरीचरन प्रकाश
कोशिश
करता हूँ कि यथासंभव छरहरी कहानियाँ लिखूँ: हरीचरन प्रकाश
कहानी
लिखने का रचनात्मक आनंद तभी है जब कहानी भी एक चरित्र बन जाए: हरीचरन प्रकाश
किसी
लेखक के भीतर का कथाकार अचानक पैदा नहीं होता। उसके पीछे उसके बचपन, परिवार, परिवेश और जीवन में घटित छोटी-बड़ी घटनाओं
की लंबी भूमिका होती है। जब आप अपने जन्म और आरंभिक जीवन की ओर लौटकर देखते हैं तो
क्या कोई ऐसी घटना, व्यक्ति या जीवन-परिस्थिति दिखाई देती है,
जिसने आपके भीतर के पाठक को जन्म दिया और आगे चलकर उसी पाठक को
कथाकार बनने की राह दिखाई?
होर्खे लुइस बोर्खेस
अर्जेन्टीना के निवासी, स्पेनिश भाषा के विश्वविख्यात
कथाकार और निबन्धकार ने एक जगह कहा है कि हमारे साथ जो भी होता है जिसमें शामिल
हैं हमारे अपमान, हमारे दुर्भाग्य, हमारी
शर्मिन्दगी सब कुछ हमें एक कच्चे माल की तरह मिलता है, उस
मिट्टी की तरह जिसमें हम अपनी कला को आकार देते हैं। इस कथन का सरल पाठ यह है कि
अपमान, दुर्भाग्य और शर्मिन्दगी कोई अनन्य अनुभव नहीं हैं,
उनके साथ छोटी-बड़ी खुशियाँ भी शामिल हैं। जीवन इसी सुख-दुःख की
ममत्वपूर्ण कथा है।
बोर्खेस, आँखों की एक वंशानुगत बीमारी से ग्रस्त थे, और लगभग
अंधे थे। कला के बारे में उनकी अवधारणा एक कुम्हार की कल्पना है और इसमें अचानक तत्त्व
की कोई जगह ही नहीं है। अपने जीवन के साथ लेखक भी लगातार घटित होता रहता है। थोड़ा
व्यक्तिगत हो जाऊँ तो आपका लेखकीय व्यक्तित्व बोर्खेस के उक्त कथन का सबसे जीवंत
प्रमाण है।
मैं अपने माता-पिता का
पहला पुत्र हूँ। सुना है कि बड़े धूम धड़ाके के साथ मैं इस दुनिया में आया। मेरा
नामकरण ही एक घटना थी। सुनते हैं कि मेरी पैदाइश के बाद बाबा ने आँखें मूद कर
रामचरित मानस खोली और आँखें मूँदे-मूँदे ही जिस चौपाई पर उनकी अंगुली पड़ी उसमें
कहीं हरिचरन जैसा कुछ छपा था। वहीं से नामोदय हुआ हरीचरन प्रकाश। इसमें ग़ौरतलब है
कि मेरे बाबा यद्यपि विद्याव्यसनी थे, तथापि एक
रिटायर्ड हेड क्लर्क थे। अंग्रेज़ी, फ़ारसी और उर्दू जानते
थे। अंग्रेज़ी साहित्य पढ़ने का शौक़ था। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने मेहनत से
हिन्दी पढ़नी और लिखनी सीखी ताकि रामचरित मानस के सुन्दरकांड का प्रतिदिन पाठ कर
सकें।
बाद में हमारे परिवार
को कुछ कारणोंवश बड़े गर्दिश के दिन देखने पड़े। माँ तब मेरे जन्म के खर्चीले
उत्सवों के किस्से सुनाती थीं। उन किस्सों को सुनने का लाभ यह हुआ कि मेरे अन्दर
यह अहसास पैदा हुआ कि हम अपने यह दिन बदल सकते हैं। माँ बहुत संघर्षशील और मेहनती
थी,
पिता से एकदम अलग।
बाबा से मुझे कम उम्र
में ही पढ़ने का शौक़ जागा। उस समय पारम्परिक हिन्दू घरों में रामचरित मानस तो
अनिवार्यतः रहती थी किन्तु महाभारत घर में रखने का निषेध था। बाबा इन निषेधों को
नहीं मानते थे। बहुत छोटी उम्र में ही मैंने महाभारत पढ़ी और आज बड़े आराम से कहता
हूँ कि महाभारत विश्व का सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक ग्रन्थ है। महाभारत ने ही मेरे
भीतर एक जिज्ञासु पाठक को जन्म दिया और तदनन्तर एक लेखक को।
आप
बहुत आत्मीय ढंग से यह स्वीकार करते हैं कि आपका लेखकत्व मूलतः आपकी 'पाठकीय वृत्ति' से निर्मित हुआ। यह बात दिलचस्प भी
है और महत्त्वपूर्ण भी। आपके पाठकीय जीवन में वे कौन-सी पुस्तकें, लेखक और साहित्यिक अनुभव रहे, जिन्होंने धीरे-धीरे
पाठक हरीचरन प्रकाश को कथाकार हरीचरन प्रकाश में बदल दिया?
जैसा कि में कह चुका हूँ
कि महाभारत का पाठक होना ही मेरे जीवन का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पाठकीय अनुभव रहा।
रामचरितमानस और रामकथा कभी मेरे अंदर वह उद्वेग पैदा नहीं कर सके जो एक नशेड़ी
पाठक होने की पहली शर्त है। घर में अंग्रेज़ी के कुछ क्लासिक उपन्यास थे, शेक्सपियर का एक वाल्यूम था, धर्मयुग और साप्ताहिक
हिंदुस्तान आते थे और इसके साथ ही सारे अंधविश्वासों का भंजन करने वाली सरिता भी
आती थी। मेरी एक कमज़ोरी यह थी कि निकलता तो मैं घर से स्कूल-कॉलेज की और था किंतु
रास्ते के एक चायखाने में रेडियो से होने वाली क्रिकेट कमेंट्री या कोई किस्सेबाज़,
मदारी-मजमेबाज़ मुझे रास्ते में ही रोक लेते थे। देर होने पर सीधा
लाइब्रेरी की ओर रुख़ करता था जहाँ प्रेमचंद और हिन्दी साहित्य के अन्य बड़े-छोटे
नाम और उनका कृतित्व मुझे मुग्ध कर देते थे। कभी-कभी तो इस चक्कर में क्लास छूट
जाती थी। कक्षा में होने वाली पढ़ाई-लिखाई तो बस मारे-घसीटे चल रही थी। उस समय चूँकि
बंगाली उपन्यासों के हिन्दी अनुवाद अधिक आसानी से उपलब्ध थे इसीलिए उन्हें अधिक
पढ़ा। अंग्रेज़ी साहित्य और अन्य विदेशी साहित्य के अनुवाद जितना नसीब हुआ,
उतना पढ़ा। नाम गिनाना शेखी होगी और इसकी यहाँ जगह और ज़रूरत भी
नहीं है। सभी लेखक प्रथमतः पाठक ही रहे हैं। मैं कुछ ज्यादा ही घनघोर था, शायद यह हल्का सा फर्क़ हो सकता है। उस समय साहित्यकार बनने के बारे में
कभी नहीं सोचा। अलबत्ता, कुलदीप नैयर और डी. आर. मनकेकर जैसे
बड़े पत्रकारों की किताबें पढ़ कर पत्रकार बनने का सपना ज़रूर देखा।
गर्दिश के दिनों ने यह
स्वप्न बहुत दिन देखने नहीं दिया। स्वयं को नौकरी के लिए की जाने वाली पढ़ाई के
लिए झोंक दिया। नौकरी की निश्चितता के बाद फ़िर से वह पढ़ना शुरू किया जो मुझे
पसंद था। तब तक धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान लगभग गायब हो चुके थे। हिन्दी
पत्रिकाओं में हंस का बोलबाला था। कई साल हंस और कुछ अन्य लघु पत्रिकाओं को पढ़ने
के बाद सोचा कि शायद ऐसा लिखने का प्रयास मैं भी कर सकता हूँ।
बस कलम उठाई और संडे के
संडे लिखता रहा। ऐसे ही पहली कहानी जन्मी जो छप भी गई, छपने से उत्साह बढ़ा। यहाँ
यह बात मैं स्पष्ट रूप से कहना चाहूँगा कि मेरा प्राथमिक लेखन स्वयं की सिद्ध करने
के लिए था, उसके पोछे कोई बड़ा उद्देश्य नहीं था हालाँकि
प्रगतिशीलता के कुछ अंकुर मेरी सोच में पहले से थे।
आपने
लेखन अपेक्षाकृत परिपक्व आयु में आरंभ किया। अक्सर माना जाता है कि कम उम्र में
लिखने वाला लेखक कल्पना की सहज उड़ान लेकर आता है, जबकि जीवन के लंबे अनुभवों के बाद लिखने वाला लेखक अनुभव की गहराई लेकर
आता है। आप अपने अनुभव से क्या मानते हैं, देर से शुरू हुआ
लेखन अधिक जीवनानुभव लेकर आता है या उसके साथ आत्मसंशय भी अधिक चलता है?
मैं ऐसा कोई विभाजन
एकदम किसी तरह से स्वीकार नहीं कर पाता हूँ। मुझे तो हल्का सा पश्चाताप है कि
मैंने पहले लिखना क्यों नहीं शुरू किया। देर से शुरू किए गए लेखन में आवेग की कमी
होती है,
क्योंकि वह अपेक्षतया एक सावधान लेखन होता है, हालाँकि फायदा यह है कि उस वक्त तक लेखक इतना पढ़ लेता है कि उसे अपने
बारे में कोई बड़ी ग़लतफ़हमी नहीं रहती है। छोटी ग़लतफ़हमी रहती है, जो लेखन के लिए ज़रूरी है। अधिक जीवनानुभव हमें सिनिकल बनता है।
आपके
भीतर का पाठक और लेखक, इन दोनों में यदि आपको
किसी एक को अधिक प्रभावशाली मानना हो तो आप किसे चुनेंगे? और
क्या कभी ऐसा भी हुआ कि पाठक हरीचरन प्रकाश ने लेखक हरीचरन प्रकाश को ही कठघरे में
खड़ा कर दिया हो और उसके किसी पूर्वाग्रह को स्वीकार करने से इनकार कर दिया हो?
इस प्रश्न का उत्तर
स्वतः स्पष्ट है। अगर एक पाठक के रूप में बना रहना ही बेहतर होता तो मैं लेखक
क्यों बनता। हाँ लेखक हरीचरन प्रकाश पर पाठक हरीचरन प्रकाश का बहुत ऋण है और यह ऋण
बढ़ता ही जा रहा है क्योंकि आज भी मैं जितना पढ़ता हूँ उससे बहुत कम लिखता हूँ।
मेरे भीतर का पाठक, लेखक हरीचरन प्रकाश को कटघरे
में रखने का अनुशासन धीरे-धीरे ही सीख पाया। शुरुआती लेखन में तो जो लिखा, उसका स्वयं सम्पादन मैं नहीं कर पाया। किसी संपादक ने भी नहीं किया।
उसका एक कारण था
अनुभवों की बाढ़ और हर अनुभव वर्णनीय लगता था जिसके कारण एक किस्म की वर्णनासक्ति
का शिकार हो गया, परिणामतः मेरी कहानियाँ
वृतांतमूलक हो गई। इसके अलावा चपल वाक्य चूँकि मेरे अंदर स्वतः ही पैदा होते थे,
इसलिए उनका प्रचुर उपयोग करता था, बिना इस बात
का लिहाज़ किये कि कहानी की गतिकी में उनकी कितनी आवश्यकता है। इसका एक परिणाम यह
हो गया की कहानी लम्बी होती गई और बीच-बीच में बँटने लगी।
धीरे-धीरे मैंने स्वयं
को अनुशासित किया। सौभाग्य से बहुत देर से ही सही मुझे एक ऐसा मित्रसमुदाय मिल गया
जो मेरी रचनाओं को छपने से पहले बाँच कर उनकी उपाख्यानमकता कम करने का संकेत लाल
पेन्सिल के निशानों से दे देता था। फिर भी, पाठक के प्रति
पूर्ण सम्मान रखते हुए भी मैं लेखकीय स्वतंत्रता को अधिक वरीयता देता हूँ इसीलिए
मनमौजी स्थितियों और वाक्यों की निर्मिति से अपने को पूरी तरह से रोक नहीं पाता
हूँ।
आप
अपनी लेखन-प्रक्रिया के संदर्भ में 'सगुण एकांत'
की बात करते हैं। यह बड़ा सुंदर और अर्थपूर्ण शब्द है, ऐसा एकांत जिसमें संसार पूरी तरह अनुपस्थित नहीं होता, बल्कि अपनी ध्वनियों और हलचलों के साथ कहीं न कहीं मौज़ूद रहता है। आपके
लिए यह 'सगुण एकांत' क्या है? और यह आपकी रचनात्मक ऊर्जा को किस तरह जगाता है?
मेरे लिए सगुण एकांत
यही है जो आपने अपने प्रश्न में निरूपित किया है। वह एकांत जिसमें लिखने के लिए
अकेले बैठने पर भी कोई द्वार बंद नहीं है। सगुण एकांत निर्गुण एकांत का विलोम है, जिसमें बच्चों के खेलने की आवाज़ें, दाल छौंके जाने
की आवाज़, चिड़ियों की चहचहाहट और उड़ते कनकौव्वे की सरसराहट
सब कुछ इंद्रियगम्य है। मेरा मौन, मेरे मुखर से अधिक
ऐन्द्रिक है। यह सघन ऐन्द्रिकता मुझे नई अभिव्यक्तियाँ देती है और उन
अभिव्यक्तियों को प्रकट करने वाले नए शब्द भी। मुझे नए शब्द गढ़ने से संतुष्टि
होती है क्योंकि मैं मानता हूँ कि पर्यायवाचिकता एक सुविधा है, समुचित विकल्प नहीं।
मैं
यह भी समझना चाहता हूँ कि आपकी रचना-प्रक्रिया में कहानी का पहला बीज कहाँ से आता
है? कोई विचार, कोई दृश्य,
कोई पात्र, कोई संवाद या फिर अचानक भीतर उठी
कोई अनुभूति? आपने जिस 'कौंध' की बात की है, वह कौंध' आपके भीतर किस तरह धीरे-धीरे
कथा का बीज बनती है?
उपरोक्त में से कोई भी
कौंध,
समय-समाज की बहती हुई धारा में ऊभ चूभ करती हुई कोई ऐसी प्रतीति जो
कलम की नोक से बेधने लायक हो। उसी समय कोई एक अवधारणा, कोई
एक वाक्य कुछ इस तरह छिटक कर पैदा होता है कि शब्द पहले आया या उसे शक्ल देने वाला
ख्याल, कहना कठिन है। वही कौंध की बीज होती है। ज़रूरी नहीं
कि हर कौंध मुझे दूर तक ले जाए। कभी-कभी कोई बीज मृतजात हो जाता है। फलता-फूलता और
जीता वही है जिसे-विचार, दृश्यावली, संवाद-श्रृंखला,
पात्रों और सहजात अनुभूति से पालन-पोषण मिलता है।
आपका
कहना है कि कहानी शुरू करने के बाद पात्र धीरे-धीरे अपना आकार ग्रहण करने लगते
हैं। यह स्थिति कथाकार के लिए बहुत रोचक होती होगी। क्या कभी आपके पात्र आपकी बनाई
हुई कथा-योजना से बाहर निकलकर अपनी राह पर चल पड़े हैं? और यदि ऐसा हुआ है तो आपने उन्हें रोकने की कोशिश की या उनकी अपनी यात्रा
को स्वीकार कर लिया?
यह सही है कि मेरी
कहानियों में पात्र धीरे धीरे अपना आकार ग्रहण करते हैं। परन्तु इस कथन का अक्षरशः
अर्थबोध करने से मेरी बात का संपूर्ण मर्म उद्घाटित नहीं हो पाएगा। आपने चाक पर
कुम्हार को मिट्टी के दिए सुराही, हंडिया और घड़े इत्यादि
बनाते देखा होगा। सब कुछ इतने लास्य के साथ संपन्न होता है कि पता नहीं चलता कि
मिट्टी का लौदा स्वयं आकर ग्रहण कर रहा है या कुम्हार की हथेली और उंगलियाँ उसे
गढ़ रही हैं। किंतु, अन्ततोगत्वा कुम्हार ही उनका सर्जक है।
सामान्यतः ऐसा ही रिश्ता मेरा और मेरे पात्रों का है। अपवादस्वरूप कभी-कभी कोई
पात्र आवारागर्दी करने लगता है। अगर वह आवारागर्दी, मनमोहक
हुई तो में उसे स्वीकार कर लेता हूँ। कहानी लिखने का रचनात्मक आनंद तभी है जब
कहानी भी एक चरित्र बन जाए।
आपकी
कहानियों को पढ़ते हुए उनके पात्रों और स्थानों की एक स्पष्ट दृश्य-छवि पाठक के मन
में बनने लगती है। उदाहरणार्थ आपकी 'नन्दू जिज्जी'
कहानी को ले सकते हैं, आप यह स्वीकारते भी हैं
कि पढ़ते समय पात्रों और स्थलों की 'रंगयोजना' आपके मन में बनने लगती थी। क्या यह दृश्यात्मकता आपकी कथा-भाषा को भी
प्रभावित करती है? यानी क्या आप पहले दृश्य को देखते हैं और
फिर उसे शब्दों में पकड़ते हैं?
आपके प्रश्न के अंतिम
वाक्य का उत्तर पहले दूँगा। जी हाँ, मैं पहले
दृश्य को देखता हूँ और फिर उसे शब्दों में ढालता हूँ। बिना दृश्य के मैं लिख नहीं
पाता हूँ। कोई भी पात्र हो या स्थान हो, कोई ज़रूरी नहीं कि
मैं उस पात्र की दैहिक रेखाओं या वेशभूषा का वर्णन करूँ या उस स्थान की स्थलाकृति
दर्शाऊँ, फिर भी वह पात्र का स्थल दृश्यरूप में मेरी कल्पना
में रहते हैं।
कभी-कभी मैं पूरा
मनोदैहिक वर्णन करता हूँ ताकि पाठक उसे मेरी आँखों से देख सकें और रम सकें। 'नंदू जिज्जी' में दावत के पकवानों के स्वादिष्ट
दृश्य से ही नंदू के मन का फीकापन उजागर हो जाता है।
आपने
कहानी के आरंभ की तुलना में उसके समापन को अधिक कठिन माना है और शल्यक अंत की
आवश्यकता पर भी बल दिया है। आपके लिए कहानी का सार्थक समापन आख़िर होता क्या है? क्या वह पाठक को चौंकाए, उसे भीतर तक सोचने के लिए
विवश करे, करुणा छोड़ जाए, खुला रह जाए
या फ़िर जीवन की उसी अनिश्चितता के हवाले कर दे, जिसमें कोई
अंतिम निष्कर्ष संभव नहीं होता?
कहानी लिखने से पहले
मैं उसकी एक संक्षिप्त रूपरेखा बनाता हूँ। उस रूपरेखा में यद्यपि समापन की योजना
तो रहती है, लेकिन वह अक्सर बदल जाती है। मेरे लिए सबसे
कठिन काम कहानी का समापन करना है। शल्यक अंत से मेरा तात्पर्य उस अंत से है,
जो कहानी के स्थापत्य का कलशक्षण हो। आप उसे शिल्पिक अंत भी कह सकते
हैं। पाठक को चौंकाना मुझे अच्छा नहीं लगता है, हाँ उसके
हृदय तक पहुँचना ज़रूर मेरा अभीष्ट रहता है। कोशिश करता हूँ कि अंत मुक़म्मल हो।
यदि ऐसा न हो पाए तो कहानी को एक अनिश्चित मुकाम पर छोड़ने के बजाय, खुला हुआ अंत देना चाहिए। मुकम्मल अंत में जहाँ दृढ़ता और परिपक्वता है,
वहीं खुले हुए अंत में कहानी के पुर्नजन्म की संभावना और स्वतंत्रता
है।
हेमिंग्वे
का 'आइसबर्ग सिद्धांत' हिन्दी
साहित्य के लिए कोई अपरिचित अवधारणा नहीं है। हिन्दी की कथा-परंपरा में
संकेतात्मकता, व्यंजना, ध्वनि, मौन, अल्पकथन और अनकहे को अर्थवान बनाने की समृद्ध
परंपरा रही है। ऐसे में वर्तमान समय के बदलते सामाजिक परिवेश, हिन्दी कथा-साहित्य की बदलती संवेदना और आज के पाठक की बदलती ग्रहणशीलता
को देखते हुए आप 'आइसबर्ग सिद्धांत' को
किस रूप में देखते हैं? आपके विचार से कथा में कितना कहा
जाना चाहिए और कितना पाठक के लिए अनकहा छोड़ देना चाहिए? क्या
आज का पाठक कथा के उस 'जल के नीचे छिपे हिस्से' को पढ़ने और उसके अर्थों को स्वयं तलाशने के लिए पहले जितना धैर्यवान और
संवेदनशील है? और आपकी अपनी कहानियों में अल्पकथन, मौन, संकेत तथा अनकहे की क्या भूमिका रही है?
हिन्दी की कथा-परंपरा
में संकेतात्मकता, व्यंजना, ध्वनि,
मौन, अल्पकथन और अनकहे को अर्थवान बनाने की
समृद्ध परंपरा रही है, अतः हेगिंग्वे के 'आइसबर्ग सिद्धांत' को अभिमंत्रित किए बिना ही हिन्दी
की कथा परंपरा इस सैद्धांतिकी को व्यवहृत करती आई है। अप्रतिम कथाकार, उपन्यासकार, ख्यातनाम पत्रकार, अर्नेस्ट हेमिंग्वे इस सिद्धांत के प्रणेता थे। हेमिंग्वे न्यूनतम वर्णन
को ही गुणी लेखन मानते थे।
उनकी कहानियों में जो
संवाद,
स्थल-विवरण और स्थितियाँ पाठक के सामने आती हैं वह टिप ऑफ आइसबर्ग
है। जो सामने दिख रहा है उससे कहीं अधिक नीचे तैर रहा है। यह सिद्धांत पाठक की
समझदारी को आमंत्रित करता है कि वह अनकहे को समझे और साथ ही उसकी कल्पना को
ऊर्जीकृत करता है।
इस सिद्धांत के अनुसार
लेखक को पहले तो यह सब लिखना चाहिए जो दिमाग में आ रहा है। उसके बाद निर्भीक
संपादन करना चाहिए। ख़ासकर विशेषण और क्रिया विशेषण तो छाँट कर अलग कर देना चाहिए।
इस कारण इसे 'लोप का सिद्धांत' भी
कहते हैं। हेमिंग्वे की अनालंकृत शैली ने अमरीकन साहित्य पर स्थायी प्रभाव डाला
है।
हेमिंग्वे के प्रेमी
उनकी इस लेखन शैली का उदाहरण महज़ छह शब्दों की एक पंक्ति से देते हैं, “फॉर सेल बेबी शूज, नेवर वार्न।” महज़ छह शब्द। कहीं यह उल्लेख नहीं है कि वह बेबी गर्भ में ही मर गया या
पैदा होते ही मर गया। माता-पिता की वेदना का कोई वर्णन नहीं है। यह इतनी मार्मिक
घटना है कि हेमिंग्वे के 'आइसबर्ग सिद्धांत' को इसका वर्णन करना न केवल सर्वथा अनावश्यक लगता है, वरन् इन छह शब्दों के अलावा कुछ और लिखना वात्सल्य के साथ हिंसा का अभ्यास
जैसा लगता है। परंतु मेरे विनम्र मतानुसार इस पूरे उपक्रम की विडंबना यह है कि जिस
न्यूनतम वर्णन या उद्गार की अपेक्षा यह सिद्धांत करता है, वह
अधिकतम और विस्तृत भावनात्मक परिदृश्य से गुज़र कर प्राप्त होता है।
नुस्खा यह है कि पहले
पृष्ठभूमि दर्शाने वाली कहानी लिखी जाए, जिसमें कुछ भी
न छूटे। उसके बाद उसे छील कर, तराश कर, संपादित किया जाए ताकि कोई स्थूल संवाद और वाचाल विवरण न बचे। नुस्ख़ा
अपनी जगह पर वाजिब है किंतु मेरा विनम्र विचार यह है कि कृत से अकृत तक की कसरत
करवाने वाली इस थ्योरी से पाठक को राजी करना कोई सरल काम नहीं है। यहाँ एक और मसला
यह है कि ग़रीबी और बेरोजगारी से जूझते हुए देश-काल में सामाजिक जड़ता के विरुद्ध
प्रगतिशील लेखन करने वाला लेखक क्या इतना संक्षिप्त हो सकता है। उसे तो पूरा
आख्यान लिखना ही होगा। वह क्यों इतनी कसरत अपने पाठक से करवाये? हेमिंग्वे की प्रतिभा से चमत्कृत होने के बावजूद मेरा मत यही है कि उनका
सिद्धान्त कोई सार्वदेशिक सिद्धान्त नहीं हो सकता है।
दरअसल कोई भी कहानी
कितनी भी न्यूनतावादी हो, कहानीकार सांदर्भिक विवरणों की
उपेक्षा नहीं कर सकता है। उनकी ‘अ क्लीन, वेल लाइटेड प्लेस’ को हेमिंग्वे की लेखन शैली की
प्रतिनिधि कहानी माना जाता है। इस कहानी में महज़ कुछ ही पृष्ठों में बुढ़ापे के
अकेलेपन को पूरी शिद्दत के साथ कम से कम शब्दों और संकेत द्वारा दर्शाया गया है।
बुढ़ापे के प्रति कोई गहरी सहानुभूति नहीं है, कोई भावुक
स्वर भी नहीं है किंतु कैफ़े में देर तक बैठने वाले बूढ़े ग्राहक और एक बूढ़े वेटर
के बीच जो समानुभूति है, वह पूरी कहानी में लरजती रहती है।
यही कहानी का मूल स्वर
है जो कम से कम बुढ़ापा बहुत निस्संग होता है, यह एक शून्यता
है पात्रों, संवादी और स्थितियों के द्वारा व्यक्त हुआ है।
बूढ़ा वेटर और बूढ़ा ग्राहक दोनों शून्यता की स्थिति में जी रहे हैं। विलक्षण
मितव्ययता के साथ हेमिंग्वे ने एक उत्कृष्ट कथा रत्न विश्व साहित्य को दिया है।
मुझे यह कहानी बहुत अच्छी लगी। आसान नहीं है ऐसी कहानी लिखना, जबकि कहानी अपनी कहन में बिल्कुल सादी है। मुंशी समीरुल्ला तस्सीम का शेर
बेसाख्ना याद आता है-
"सुबह होती है, शाम होती है।
उम्र
यूँ ही तमाम होती है।।"
इस कैफ़े में शराब भी
परोसी जाती है और यह बूढ़ा ग्राहक शराबखानों में नहीं जाता है क्योंकि यहाँ की
स्वच्छ और सुप्रकाशित व्यवस्था उसे पसंद है। कैफ़े में एक जवान वेटर भी है। दोनों
वेटर्स के बीच सामान्य से संवाद होते रहते हैं। यही सवाल शनैः शनैः कहानी को खोलते
हैं। जवान वेटर विवाहित है और जल्दी से घर जाकर बीवी के बगल में घुसना चाहता है।
बूढ़ा वेटर विधुर है, जिसके घर में एक नितान्त खाली,
ठंडा बिस्तर है। पता चलता है कि इस बूढ़े और समृद्ध ग्राहक ने कुछ
दिन पहले रस्से से लटक कर आत्महत्या की कोशिश भी की थी जिसे काटकर उसकी भतीजी ने
उसे बचा लिया। दोनों वेटर्स के बीच यह बात होती है कि भला बचा क्यों लिया। एक वेटर
उत्तर देता है "उसकी आत्मा के लिये।"
ध्यातव्य है कि
पारंपरिक ईसाई विश्वास के अनुसार आत्महत्या घोर पाप है, अतः आत्महत्या निषिद्ध है।
उक्त उदाहरण के
दृष्टिगत मुझे यह कहना है कि न्यूनतम कथा शैली भी अपनी पृष्ठभौमिक समय-संस्कृति
में स्थापित होती है। 'उसकी आत्मा के लिए' जिस तरह से यूरोपवासियों के लिए बोधगम्य है, उस तरह
से एक सामान्य भारतीय हिंदू के लिए नहीं।
यह कहना कि हेमिंग्वे
का लेखन विशेषणों और क्रिया विशेषणों को सर्वथा-सर्वदा काट-छाँट कर किनारे कर देता
है,
सही नहीं होगा। मैं इस संदर्भ में उनकी एक और बहुत अच्छी कहानी 'सोल्जर'ज़ होम' की ओर आपका
ध्यान आकृष्ट करूँगा। यह एक ऐसे अमरीकन सैनिक की कहानी है जो प्रथम विश्व युद्ध के
मोर्चे से घर लौटा है। इसके बावजूद कहानी में युद्ध की कोई विभीषिका दर्ज़ नहीं
है। यह सैनिक इतनी देर से घर लौटा कि तब तक लौटे हुये युद्धनायकों का धूमधाम से
स्वागत करने का समय बीत चुका था। वह लोगों को युद्ध के किस्से सुनाना चाहता है,
लेकिन किसी को उसमें रुचि नहीं है। यहाँ तक कि वह दूसरों की वीरता
के किस्से भी अपना बनाकर सुनाना चाहता है ताकि किस्से रोचक बन सकें। उसे अफसोस
होता है कि उसके रोचक झूठ का भी कोई श्रोता नहीं है। वह बहुत निराश होता है।
दोनों कहानियों, 'अ क्लीन, वेल लाइटेट प्लेस' और
'सोल्जर'ज़ होम' को
पढ़ने से यह आभास होता है कि यद्यपि दोनों कहानियाँ न्यूनतावादी हैं, किंतु दोनों में विशिष्ट अंतर भी है। सोल्जर'ज होम'
में पर्याप्त विशेषण और क्रिया विशेषण है, किंतु
'अ क्लीन, वेल लाइटेड प्लेस' में विशेषण का अभाव है।
सबसे खास अंतर यह है कि जहाँ सोल्जर'ज होम' में पात्रों को नाम दिया गया है, यथावश्यकता बल्दियत और सकूनत दर्ज़ की गई है। वहीं 'अ कलीन, वेल लाइटेड प्लेस' में सारे पात्र अनाम है। दोनों कहानियों के पढ़ने के बाद यही समझ में आता है कि आइस वर्ग थ्योरी इतनी इकहरी भी नहीं है। उसमें कई परते हैं।
पाठकगण इस लेख का दूसरा भाग अगले ब्लॉग में पढ़ सकते हैं । https://www.shabdendriya.com/2026/09/blog-post_28.html
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