निवेदन

निवेदन 
[उनके प्रति जो मेरी कृतियों में मुझे ढूँढ़ेंगे]


ये कविताएँ,

यह कथा-कहानी-उपन्यास,इनके अन्दर तुम नाहक मुझको ढूँढ़ रहे!

ये गलियाँ थीं,

इनसे होकर मैं गुजर चुका,

यह केंचुल है, जो धीरे-धीरे छूट रही!


'मैं' और 'कला'

इनकी कुछ भी अहमियत नहीं!

इन दोनों से ज्यादा विराट् 

कोई तीसरा सत्य है

जिसको आत्मसात् कर पाने को 

मेरी आत्मा

धीरे-धीरे

जीवन की यज्ञ-शिखाओं में पकती जाती।

ओ मेरे बेजाने-पहचाने दोस्त,

कौन जाने शायद मुझसे पहले तुम पा जाओ

वह जिसको खोज रहा हूँ मैं!

तुम भी जाने या अनजाने

चल रहे वहीं!


दुःख, दर्द और संघर्षों के माध्यम से

जब तुम भी उस सच्चाई की मंजिल तक पहुँचो

जब एक विराट् सत्य की छाया में अभिषेक तुम्हारा हो

तब अपने चरणों पर बिखरे 

क्षत-विक्षत पूजा-फूलों में ढूँढ़ना मुझे

शायद तुम मुझको पा जाओ

नाहक तुम ढूँढ़ रहे मुझको

इन कथा-कहानी-उपन्यास-कविताओं में!

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स्रोत- ठण्डा लोहा(99-100)
रचनकार- धर्मवीर भारती
प्रकाशक- भारतीय ज्ञानपीठ  

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