पास्तीश की संस्कृति के चार अध्याय:हरी चरन प्रकाश भाग -3

 


वैद पर लिखे गए अध्याय  का शीर्षक 'द अनबियरेबल टीडीएसनेस ऑफ़ पास्तीश' (पास्तीश का असह्य ऊबाऊपन) है। उन पर लगभग 52 पृष्ठों का विस्तृत श्रम करने के उपरांत प्रो. जयदेव कहते हैं कि जब तक वैद ही 'वैद' की तरह  लिखते हैं, तब तक हिंदी कथा-साहित्य के लिए आशा बची  है। यह कहने के बावजूद प्रो. जयदेव कहीं-कहीं यह आभास देते भी नजर आते हैं कि वे कृष्ण बलदेव वैद के प्रति अतिरिक्त रूप से कठोर नहीं हैं

अपनी अंवागर्द  कृतियों में वैद समाज या जनता में किसी भी प्रकार की रुचि होने से साफ इनकार करते हैं। यह इनकार तीन सिद्धांतों पर आधारित है: पहला, साहित्य को संकीर्ण, संकुचित अथवा सामाजिक नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे अपना एक वैकल्पिक,कलापूर्ण और सौंदर्यपरक संसार रचना चाहिए। दूसरा, साहित्य का सरोकार केवल उन मूलभूत वस्तुओं से होना चाहिए जो समाज, सामाजिक और ऐतिहासिक आयामों से परे हों। तीसरा, जनता के सरोकार कलाहीन, सौंदर्यविहीन और तिरस्करणीय हैं, और साहित्य उन सरोकारों को संबोधित करने के लिए किसी भी तरह का समझौते नहीं कर सकता है।

मामूलीपन  वैद के सौंदर्यवादी नायकों को क्षुब्ध करता है, और वे आम भीड़ या हुजूम के साथ घुलना-मिलना नहीं चाहते हैं। उनके अनुसार, आम लोगों को खारिज करना, संरचना का नया व्याकरण और नए सौंदर्यपरक प्रतिमानों के सृजन की ओर एक आवश्यक क़दम उठाने जैसा है। इस तरह से जनता और जन-सरोकारों को अस्वीकार करना उच्च-आधुनिकतावादियों की मुद्राओं को हूबहू स्वीकार करना है। यद्यपि वैद अपने को एक 'विमुख' के रूप में वर्णित करते हैं, परंतु वस्तुतः वे भारतीय समाज और संस्कृति के प्रति विमुख न होकर, उसके प्रति एक स्थायी बैरभाव से ग्रस्त दिखाई पड़ते हैं।

वैद एक अत्यधिक अस्मिता-बोध संपन्न लेखक हैं। उन्होंने अपने लेखन की शुरुआत महत्त्वपूर्ण कृतियों से की थी; खास तौर पर 'उसका बचपन', जो निस्संदेह एक उत्कृष्ट कृति है। इस उपन्यास में वैद एक सचेत उद्देश्य और विश्वास के साथ पश्चिमी साहित्यिक युक्तियों का अनुकूलन कुछ इस ढंग से करते हैं कि उनका लेखन भारतीय समाज और संस्कृति की ही उपज जान पड़ता है। परंतु उनका परवर्ती लेखन, जैसे 'विमल उर्फ़ जाएँ तो जाएँ कहाँ' और 'नसरीन' आदि, एक दूसरी ही श्रेणी में आते हैं। यद्यपि इस परवर्ती लेखन में भी पश्चिमी संकेत-चिन्हों का प्रयोग है, परंतु वह पूरी तरह से भ्रष्ट और यथार्थहीनता की ओर उन्मुख है। इन कृतियों में वैद की लेखकीय योजना कृत्रिम है। वे पश्चिम के महारथी साहित्यकारों का अनुकरण इस इच्छा के वशीभूत होकर करते हैं कि वह असामान्य कथ्य शैली और तौर-तरीकों का प्रयोग कर सकें; परन्तु ऐसा करते समय वे उन महारथियों की आत्मकगत मानवता और  करुणा तक नहीं पहुँच पाते हैं।

वैद के इस परवर्ती लेखन में जो आत्मबोध है, और जिसे उनकी भारी-भरकम विद्वत्ता का सहारा भी प्राप्त हैउनके विद्यार्थियों के समक्ष पर्याप्त जटिलता पैदा करता है। उनकी इन कृतियों पर कुछ भी सारवान कहने के लिए बड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी। साथ ही, वैद के पाठकों को बहुत सावधान भी रहना पड़ेगा; क्योंकि उनकी विडंबना इतनी आत्म-रक्षात्मक है, उनकी आत्मवाचकता इतनी त्रुटिहीन है और उनका कृतित्व इतना कवचित है कि आसानी से उसकी भर्त्सना नहीं की जा सकती। वे अपने ऊपर होने वाली संभावित आलोचनाओं का पहले ही अनुमान लगा लेते हैं और अपने कथा-साहित्य में ही पूर्वोपायी उत्तर दे देते हैं।

कोई वैद पर कैसे यह आरोप लगा सकता है कि वे चिल्लर बातों का दैवत्वीकरण करते हैं, जबकि उनके नायक स्वयं ही अपनी उपलब्धियों को नगण्य ठहराते हैं। वैद की कृतियों का कोई भी ऐसा प्रतिवाद नहीं हो पाएगा जिसे वे यह कहकर खारिज न कर सकें कि—'भई देखो, इसे तो मैं अपनी रचना के अधिपाठीय स्तर (Metatextual Level) पर पहले ही खारिज कर चुका हूँ!' इस कुशल तरकीब का उद्घाटन प्रो. जयदेव ने वैद के दो उपन्यासों 'विमल' और 'नसरीन' के माध्यम से किया है।

वैद का 'उसका बचपन' एक मास्टरपीस है—इस बात को खुले दिल-दिमाग से स्वीकार करते हुए  प्रो. जयदेव यह पाते हैं कि आगे चलकर वैद के लेखन में समाजदृष्टि का अभाव हो गया है। वैद ने भारतीय रहन-सहन और रस्मों-रिवाज की तमाम गलाजत(जो कि है भी) को उद्घाटित किया है, लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह होगी कि क्या इस उद्घाटन के पीछे कोई समाजविद्केरोही घृणा है या एक जुझारू सामाजिक सरोकार।वैद के परवर्ती साहित्य को पढ़ने के बाद बार-बार ऐसा लगता है मानो वे यह मान चुके हैं कि भारतीय पशुओं की तरह रहते हैं चूँकि वह ऐसा रहन-सहन पसंद करते हैं। वैद को उनकी असहायता, विवशता और अभाव नजर नहीं आते। इसी तरह, भारतीय समाज के प्रति वैद के नायकों का दृष्टिकोण अमूमन दंभ, सनसनीप्रियता, पर-पीड़न वृत्ति (Sadism) और कहीं-कहीं भित्तिचित्रणात्मक कल्पना (Graffiti Imagination) से निर्धारित होता है। अच्छा होने के लिए लोगों का या तो अमरीकन होना या उच्चवर्गीय भारतीय होना ज़रूरी है। अमरीकी नागरिकता से संपन्न भारतीय नायक का स्वदेश लौटना तभी सार्थक होता है जब वह 'नसरीन' जैसी अपवादिक योग्यताओं वाली युवती से मिलता है। नसरीन के सुंदर, अमीर और स्वैराचारिणी होने के अलावा हमें उसके बारे में कोई अहम जानकार्याँ नहीं मिलती हैं। कहाँ से उसकी  रोटी, शराब और धुएँ का ख़र्च आता है, कुछ पता नहीं चलता। उसका आस-पड़ोस, उसके रिश्तेदार आदि सब इतने अवर्णित हैं कि उसके वास्तविक औरत होने पर शंका होती है; बावजूद इसके कि वह नायक के समक्ष अपनी यौनिक सम्ओंभावनाओं को पूरी उद्दामता के साथ प्रस्तुत करती है। 'नसरीन' वैद के नायक की चहेती है, 'नसरीन' एक सामाजिक-सांस्कृतिक शून्य में अवस्थित है।

नसरीन के विपरीत, 'विमल' में सामाजिक यथार्थ 'भित्तिचित्रणात्मक कल्पना' (Graffiti) के माध्यम से प्रकट हुआ है। इस उपन्यास में घर है, कॉलेज है, और कलात्मक तथा बौद्धिक सोहबतें हैं। परंतु यहाँ परिवार एक 'सेक्सुअल जंगल' है और ऐसा आभास होता है मानो एक आम भारतीय घर केवल यौन शिक्षा की पाठशाला हो। उपन्यास जीवंत किंतु अश्रद्धालु नकल (Mimicry) से भरा हुआ है। हालाँकि, यहाँ यह कहना आवश्यक है कि ध्वंसात्मक नकल और भित्तिचित्र (Graffiti) की इन दोनों भूमिकाओं को साहित्य में सदैव आदर मिला है। इसका पहला उपयोग अपने समय के वर्चस्वशाली और प्रतिष्ठानी साहित्यिक विमर्श में सेंध लगाना है, ताकि जो विमर्श हाशिए पर है उसे पहचान देते हुए समाज के दमित वर्ग को साहित्य में जगह दी जा सके। लेकिन यहाँ गौर करने योग्य बात यह है कि वैद के नायक के पास समाज के वंचित वर्ग के लिए केवल घृणा है। ग्रिफिटी और मिमिक्री की दूसरी भूमिका सांस्कृतिक है। जिंदगी के कुछ ऐसे पहलू होते हैं जिन्हें परंपरावश अशोभनीय समझा जाता है और खुलेआम उन पर बात करना निषिद्ध माना जाता है। फलतः ऐसी बातें लबार मज़ाक और गुह्य कल्पना-क्षण में सीमाबद्ध हो जाती हैं। उस सीमा से उन्हें मुक्त करके साहित्य संस्कृति की मददगार समालोचना कर सकता है। कम से कम यह तर्क मार्क्विस दे साद और हेनरी मिलर जैसे लेखकों के समर्थन में दिया जाता रहा है। अलबत्ता, इस तर्क के साथ दो बातें विशेष रूप से जुड़ी होनी चाहिए—पहली यह कि प्रत्येक संस्कृति अपने मूल्यों के अनुसार जीवन के कुछ पहलुओं को प्रभाषित करती है। प्रतिषिद्ध यौनाचार भारतीय समाज में भी है, परन्तु उसे भारतीय साहित्य में महत्तवपूर्ण स्थान इसलिए नहीं दिया गया क्योंकि उससे अधिक मूल्यवान पहलुओं को महत्त्व देना जरूरी समझा गया। दूसरी यह इच्छा कि जीवन की प्रतिषिद्ध सच्चाइयों को साहित्य के जरिए पहचाना जाए, समझ में आने वाली बात है लेकिन ऐसा केवल सनसनी फैलाने के लिए किया जाए, यह स्वीकार्य नहीं है। उदाहरण के लिए, जॉयस के 'यूलिसिस' में यौनाचार और नैत्यिक क्रियाओं का विस्तृत वर्णन है, परंतु वह सब कुछ एक महत् समग्रता के अंतर्गत है, जिसका उस जीवन और संस्कृति के प्रति गहरा सरोकार अक्षुण्ण है। वैद के साहित्य में इस तरह की ग्राफिटी, मिमिक्री और बेबाकी की मौजूदगी का कोई सरोकार भारतीय समाज और संस्कृति से नहीं है और न ही उसमें मानवीयता है। वैद की बेबाकी निस्संदेह चौंकाती है, लेकिन मुँह में बुरा जायका छोड़ती है। पश्चिमी तर्ज़ पर हिंदी साहित्य को 'कारामुक्त' करके वह सोचते हैं कि उन्होंने इसे क्रांतिकारी बनाया है।

उपन्यास 'विमल' में विमल नाम का एक युवक उपन्यास लिखने में लगा हुआ है। विमल हस्तमैथुनी है और अपने इस रचनाधीन उपन्यास को 'शाब्दिक हस्तमैथुन' कहता है। इस स्वावलंबी रति के दौरान वह निकट पारिवारिक रिश्तों के कामाचारी उल्लंघन की कल्पना करता है। इस काम का दो सौ पचास पृष्ठों में वर्णन क्यों हुआ, इसे जानने की तुलना में यह जानना अधिक आवश्यक है कि इस वर्णन का उत्स क्या है।

हेनरी मिलर के 'ट्रॉपिक ऑफ़ कैंसर' 'ट्रॉपिक ऑफ़ कैप्रिकॉर्नतथा फिलिप रोथ के 'पोर्टनॉयस कंप्लेंट' का साक्ष्य देते हुए प्रो. जयदेव बताते हैं कि किस प्रकार वैद यौन अंगों और यौन सम्बन्धों के अमानवीकरण के वर्णन के लिए इन महानुभावों से प्रेरित हैं। वैद के साहित्य में हेट्रोसेक्सुअल सोडोमी, डाःसल् इंटरकोर्स(पृष्ठीय सम्भोग),फलेशिओ(मुख मैथुन) और परपीड़क कोड़ाघात किसी एक पश्चिमी साहित्यकार से प्रेरित नहीं हैं, बल्कि उसके पीछे बोकैशियो, मार्क्विस दे साद, रेबले और नॉर्मन मेलर की एक पूरी परंपरा है। वैद न केवल हिंदी साहित्य को उसके मूल जनसंस्कारों (भीड़ और उसका मामूलीपन) से विलग करना चाहते हैं, बल्कि उपर्युक्त पश्चिमी लेखकों के हमकलाम होने का एक भ्रम भी पैदा करना चाहते हैं। वैद जिस अंदाज़ में पास्तीश का इस्तेमाल करते हैं, उससे ध्यानाकर्षक उक्तियाँ ही पैदा होती हैं। वे इन लेखकों से छोटे-छोटे विवरण छाँटकर उन्हें हिंदी में प्रदशित करते हैं। वैद ने लिंग का जितनी तरह से  वर्णन किया है, उससे लगता है मिलर और रोथ की उन पर बड़ी देनदारी है। मिलर के 'द माइक्रोफोन इन योर पैंट्स' या 'द डायनमो बिटवीन योर लेग्स' (ट्रॉपिक ऑफ कैंसर), रोथ के 'अ डज़न इन माई वॉलेट' (पोर्टनॉयस कंप्लेंट) और वैद के 'खतरनाक खंजर', 'हिलता हुआ टारजन' आदि प्रतीकों में बहुत अंतर नहीं है। प्रो. जयदेव ने कुछ ऐसी कामातुरीण समानताएँ मिलर, रोथ और वैद के बीच उल्लिखित की हैं, जिन्हें यहाँ न लिखा जाए तो बेहतर होगा। पश्चिम की पास्तीश की सचेत परंपरा से तुलना करने पर यही समझ में आता है कि वैद की पास्तीश में ईमान की भारी कमी है, क्योंकि यह अधिकतयः चौंकाने वाली अनुर्वर नकल है। वैद की पास्तीश में वाचाल हिंसा भी है। मीरा के मनमोहक भजन—'मेरो तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई' की पहली पंक्ति तोड़कर वैद ने हस्तमैथुन का उत्सव कुछ इस तरह मनाया—'मेरे तो गीले गोपाल'। दूसरी पंक्ति का उपयोग उन्होंने अपने उपन्यास 'दूसरा न कोई' के आत्मपरक अस्तित्ववादी शीर्षक के रूप में किया है। इस तरह की हरकतों के लिए वैद का नायक सैमुअल बेकेट का मंत्रजाप करता है।

वैद के साहित्य में बेकेट की उपस्थिति गंभीर अनुशीलन की माँग करती है। वैद ने न केवल बेकेट का अनुवाद किया है, बल्कि वे उनके कृतित्व के अच्छे जानकार भी हैं। बेकेट की रचनाओं में बहुत ही Intertextuality है, और बेकेट को संबोधित करने का अर्थ दांते से लेकर काफ्का और कामू तक के लेखकों-विचारकों को संबोधित करने जैसा है। प्रो. जयदेव लिखते हैं कि वैद के लेखन में लगभग चार सौ विवरण ऐसे मिलते हैं जिसका उत्स सीधे बेकेट में है। शायद उनकी इच्छा है कि उन्हें 'भारतीय बेकेट' माना जाए। शब्दार्थ की तुलना में शब्द ध्वनि को महत्त्व देने वाले बेकेट के साहित्यिक वातावरण का विवेचन करने के उपरांत, प्रो. जयदेव 'दूसरा न कोई' के नायक की कुछ मुद्राओं की समरूपता बेकेट के पात्रों (मलोन, मलोय) से दिखाते हैं। साथ ही वे यह भी बताते हैं कि बेकेट के साथ अन्तरंगता में शायद कुछ कमी पाने के कारण वैद ने हेनरी मिलर के सेक्सुअल संकेत-चिन्हों का भी उपयोग किया है।

वैद अपनी शैली के निर्माण के लिए एक सुचिंतित तरीके से आगे बढ़ते हैं। पहले वे बेकेट के गद्य के विशिष्ट लक्षणों को काढ़ते हैं, फिर उन विशेषताओं को दर्शाने के लिए अपनी भाषा गढ़ते हैं। हालाँकि, वैद द्वारा रचित यह लाक्षणिकता दूर से भी बेकेट की संवेदनशील और दार्शनिक लयात्मकता को छू नहीं पाती है। नतीजा यह है कि बेकेट के उपन्यास 'द अननेमेबल' के नायक की जो असामान्य अवस्थिति है, वह वैद के उपन्यास 'दर्द ला दवा' के नायक में पदच्छेद की शक्ल में सामने आती है।

वैद के ऊपर 'द्विचित्तेपन' का भार है। 1987 में स्टॉकहोम में दिए गए अपने वक्तव्य में इस द्विचित्तेपन को अपनी रचनात्मकता के लिए उपयोगी मानते हुए उन्होंने कहा था कि इसी कारणवश उन्होंने अंग्रेजी को अपनी साहित्यिक भाषा नहीं बनाया। स्टॉकहोम के इसी वक्तव्य में वैद ने यह भी कहा कि भारतीय लेखक (जिनमें अंग्रेजी में लिखने वाले भी शामिल हैं) पश्चिम से बराबरी का संवाद करने में असफल रहे हैं। बराबरी के संवाद की इस ज़ोर-आज़माइश पर प्रो. जयदेव दो सवाल उठाते हैं। पहला यह कि पास्तीश का लेखक खुद की ज़मीन को इस कदर खो देता है कि वह पश्चिम से कोई बातचीत मंच के नीचे खड़ा होकर ही कर सकता है। अंततोगत्वा, कोई भी संवाद दो वास्तविक पक्षों की माँग करता है; यह नहीं कि एक पक्ष असली हो और दूसरा उसका केवल एक नकलची साया। वैद ने यह प्रयास किया है कि अधिपाठीय (Metatextual), अस्तित्ववादी, विषयासक्त अभिव्यत्तियों के साथ सत्ता या प्रतिष्ठान भंजक्ष और रबेलेसियन (फ्रांसेस रबेले नामक लेखक से संबंधित पद, जो फूहड़ मज़ाक के साथ सनकी उल्लास को भी अभिव्यक्ति देता है) का उपयोग करके हिंदी साहित्य को बदल दिया जाए। हो सकता है कि किसी हिंदी लेखक में पश्चिमी लेखक जैसा दिखने के इस प्रयास को कोई पश्चिमी पाठक एक उदार मुस्कान के साथ स्वीकार कर ले, लेकिन इससे कोई संवाद तो बन ही नहीं सकता; क्योंकि स्मितवदन बड़प्पन और नीतिज्ञ सहिष्णुता किसी सच्चे संवाद का आधार नहीं बन सकते। भारतीय पाठक तो ऐसे लेखन को कौतूहल की सामग्री ही समझेगा, जिसमें भारतीय यथार्थ का इतना अपचयन कर दिया गया हो। अलबत्ता, इस प्रसंग में यह कहना तो ऊपर से बनता है कि यदि वैद अंग्रेजी में लिखते तो उनका कोई पुछत्तर हाल न होता, हिंदी में उन्होंने खूब सनसनी फैलाई है।

स्टॉकहोम के वक्तव्य में वैद ने अपने विडंबनात्मक स्वभाव का ज़िक्र किया है। प्रो. जयदेव यह मानते हैं कि साहित्य में विडंबना (Irony) के उपयोग हैं, खासकर जीवन और कला के द्वैध को सहनीय और सामान्य बनाने में; लेकिन इस सारी गतिविधि में एक सकारात्मक और नैतिक उद्देश्यपरकता होनी चाहिए, जो वैद में नहीं है। वे आत्मपरक और आत्म-रक्षात्मक विडंबनाओं का इस्तेमाल कवच की तरह किसी भी भावी आलोचना से बचने के लिए करते हैं। वस्तुतः वैद इस तरकीब में कामयाब हैं कि वे अपनी रचना से खुद को पूरी तरह कतरकर दूर रख सकें। खुद को तटस्थ रखने का यह गुण उस समय भी काम करता है जब वह भूख और अभाव को भी एक 'कलात्मक दृश्य' बना देते हैं। वैद की पास्तीश में एक अहंकारप्रियता है जो उनके कृतित्व की सामाजिकता पर एक प्रश्नचिह्न लगाती है।.....


लेखक
हरी चरन प्रकाश  

                                                           

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