कहानी लिखने का रचनात्मक आनंद तभी है जब कहानी भी एक चरित्र बन जाए: हरीचरन प्रकाश

  वरिष्ठ साहित्यकार हरीचरन प्रकाश से  प्रदीप श्रीवास्तव की बातचीत  भाग- २  .. अतः हेमिंग्वे की आइसबर्ग थ्योरी पर हर्फ़ लगाए बगैर मेरा यह कह...

 वरिष्ठ साहित्यकार हरीचरन प्रकाश से प्रदीप श्रीवास्तव की बातचीत 

भाग- २ 



.. अतः हेमिंग्वे की आइसबर्ग थ्योरी पर हर्फ़ लगाए बगैर मेरा यह कहना है कि यह थ्योरी सुसंगत सांस्कृतिक संदर्भों की माँग करती है। अलबत्ता, मैं यह ज़रूर कहना चाहूँगा कि इस थ्योरी और इसकी प्रतिनिधि रचनाओं ने मुझे अपनी उन कमियों को जानने का और अधिक समझदारी से अवसर दिया, जिन कमियों से मैं बाद में अवगत हुआ।

मेरी कुछ कहानियाँ बहुत वाचाल हैं और शब्द स्फीति से ग्रस्त हैं। अगर देह का रूपक दूँ तो वह कुछ-कुछ धुलथुल कहानियाँ हैं, जिनमें अनावश्यक वसा है।

अब मैं इस दिशा में सतर्क हूँ और कोशिश करता हूँ कि यथासंभव छरहरी कहानियाँ लिखूँ और अन्त में दोहरा कर कहूँगा कि हेमिंग्वे जैसी छरहरी और वसाहीन कहानियाँ लिखना आसान नहीं है। वह हमारे महानतम लेखकों में से एक हैं, जो कहानी का सत्व हासिल करने में समर्थ थे।

प्रश्न-आपकी कहानियों के शीर्षक भी अपने भीतर काफ़ी कुछ कहने वाले होते हैं। शीर्षक आपके पास कब आता है, कहानी लिखने से पहले, जब कथा का पहला बीज भीतर पड़ता है, या फिर पूरी रचना से गुज़रने के बाद उसकी अंतर्ध्वनि से शीर्षक अपने आप निकलकर सामने आता है?

 

उत्तर -पहला शीर्षक तो कहानी की रुपरेखा बनाते समय आता है। इसके बाद ज्यों-ज्यों कहानी आगे बढ़ती है, दो या तीन नए शीर्षक पैदा होते हैं। कहानी का अंत करते समय मैं उन शीर्षकों में से किसी एक का चयन करता हूँ। शीर्षक चुनते समय बस इतना ध्यान रहता है कि कौन सा शीर्षक अंत में रचना की परिपक्वास्था का स्पष्ट उद्घोष करता है अथवा पूरी कथा में प्रतिध्वनित होता है। दो ही मानदण्ड हैं।

 

कहानी लिखने के बाद आप सबसे पहले किसी मित्र-पाठक को पढ़ने और सुझावों के लिए भेजते हैं, उनके सुझाव को स्वीकार करते हैं। आज के समय में जब बहुत से लेखक अपनी रचना पर किसी आलोचनात्मक टिप्पणी को सहजता से स्वीकार नहीं कर पाते, आपके लिए उनका क्या महत्त्व है? क्या वह लेखक के भीतर छिपे अंधे कोनों को भी दिखाने में सक्षम हैं, उनका नाम बताना चाहेंगे?

उर्दू साहित्य में नए शायर अपने उस्ताद को इस्लाह के लिए रचनाएँ भेजते थे। मैं जिन्हें अब अपनी कहानियाँ भेजता हूँ वह कोई कहानीकार नहीं हैं। वह बहुत समझदार और बहुपाठी पाठक हैं और मेरे ही संवर्ग की एक सेवानिवृत अधिकारी हैं, जिनका नाम श्रीमती मंजू चन्द्रा है। कहानियाँ उन्हें भेजने का सिलसिला अभी हाल ही में शुरु हुआ है। अभी तक मैंने उन्हें चार कहानियाँ ही भेजी हैं और उनका अमूल्य सहयोग प्राप्त किया है। अब तो मुझे पश्चाताप होता है कि मैंने पहले उनकी खोज क्यों नहीं की। मैं शायद अन्यत्र कह चुका हूँ कि मेरी कहानियाँ वृतांतबहुल हुआ करती थीं और इस कारण लम्बी भी। लंबी कहानियों के दौर में वह खप भी गई हैं। लेकिन जिसे पश्चातबुद्धि कहते हैं, तो अब लगता है कि मेरी अनेक कहानियों में ऐसे वृतांत थे जो रोचक तो थे लेकिन कहानी के प्रवाह को उसी तरह अवरुद्ध करते थे जैसे किसी नदी पर जगह-जगह जलाशय बना दिए जाएँ। मंजू चन्द्रा एक ऐसी पाठक-सम्पादक हैं जो ऐसी जगहों को इंगित करती हैं। उनकी कोई सलाह मैं मानता हूँ और कोई नहीं। अगर मेरा वह कहानी संग्रह कभी छपा जिसमें उनके द्वारा की गई संपादित कहानियाँ होंगी तब मैं उनके वैदुष्यपूर्ण, निष्ठावान किन्तु निस्पृह योगदान के प्रति समुचित कृतज्ञता ज्ञापन करूँगा। कहानी के अन्धेरे कोने मैं ख़ुद टटोलता हूँ।

 

आप बातचीत में निःसंकोच यह बताते हैं कि आपकी पहली तस्वीरें इतनी परिचित होती हैं कि परिवार या मित्र उनमें अपने जीवन की छवियाँ पहचान लेते हैं। उसके बाद आपको 'स्वयं के साथ समागम करते हुए उस परिचित यथार्थ को रचना में बदलना पड़ता है। यह प्रक्रिया आपके लिए कितनी कठिन होती है? क्या कभी अपने ही जीवन और अपने आसपास के लोगों को कथा में रूपांतरित करते हुए भीतर कोई नैतिक या भावनात्मक संघर्ष पैदा हुआ?

 

मेरी कहानी के पहले ड्राफ्ट में जो तस्वीरें होती हैं, वह उसी समाज की होती है जिसका मैं अंग हूँ। लेकिन दूसरे ड्राफ्ट में वह तस्वीर उतनी ही बदलती है जितनी कि वह शिशु जो पूरी तरह से न तो अपनी माँ को पड़ा है और न पिता को। वह एक पूरी अनुवांशिकी का परिणाम होती है। प्रक्रिया कठिन है। कभी कलम भोंथरी पड़ जाती है तो कभी बढ़ती आयु के साथ दवात में स्याही भी कम हो जाती है, तो खीझ होती है। किंतु इन सबके बावजूद, सार्थकता का जो अहसास होता है, वह अतुल्य है। वही मेरी रचना की जीवनी शक्ति है। रचते समय मेरे व्यक्तित्व का भी रूपांतरण होता है, इस रूपांतरण के सापेक्ष मैं अपने आसपास के लोगों का भी रूपांतरण कर देता हूँ। ऐसा करते समय कोई द्विविधा या भावनात्मक संघर्ष उत्पन्न नहीं होता है। बल्कि ऐसा करते समय लगता है कि इस समय अपने पराए का भेद करना साहित्यिक धर्म के विरुद्ध है।

 

आपकी कहानियों में सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना दोनों एक साथ दिखाई देते हैं। आपके लिए यथार्थ का अर्थ क्या केवल समाज का दस्तावेज़ तैयार करना है या उस यथार्थ के भीतर छिपे मनुष्य के मन, उसकी इच्छाओं, विवशताओं और अंतर्युद्ध को सामने लाना भी उतना ही ज़रूरी है?

 

समाज का दस्तावेज़ तैयार करना समाजशास्त्रियों का काम है। समाजशास्त्र एक अलग अकादमिक अनुशासन है। मेरे मतानुसार कोई भी साहित्यिक रचना, किसी समाजशास्त्रीय अध्ययन का मात्र साहित्यिक क्रियान्वयन नहीं होनी चाहिए। समसामयिकता का सम्मान करते हुए भी कहानी को किसी प्रगल्भ सामाजिक दृष्टि का अनुवाद होने से बचना चाहिए। साहित्यकार का काम सामाजिक यथार्थ के भीतर और बाहर मनुष्य के मन को उस यथार्थ की परतों के सापेक्ष पढ़ना और लिखना है।

 

सामान्य आदमी, मध्यवर्ग, निम्नवर्ग और श्रमजीवी जीवन के अनेक रूप आपकी कहानियों में दिखाई देते हैं। आपको क्या लगता है कि समकालीन हिंदी कहानी इन जीवन-स्थितियों को पर्याप्त गहराई से अभिव्यक्त कर पा रही है? या अभी भी हमारे कथा-साहित्य में बहुत-सा जीवन ऐसा है, जो अपनी पूरी जटिलता के साथ सामने आना बाकी है?

 

जी हाँ, हिंदी कहानी में इस समय पात्रों और जीवन स्थितियों का चेहरा बदला है। उदाहरण के लिए आज से 50 साल पहले कामकाजी स्त्रियों के लिये टीचर, नर्स, टेलीफोन एक्सचेंज और उन सबसे अलग और गरिमामय लेडी डॉक्टर के व्यवसाय उपलब्ध थे। अब ऐसी स्थिति नहीं है। कंप्यूटर क्रांति के बाद बड़ी संख्या में हमारे घर की लड़कियों ने रोजगार के नए अवसर प्राप्त किये। शुरुआती दौर में दक्षिण भारत के कुछेक शहरों में ऐसे रोजगार बड़ी संख्या में उपलब्ध थे, इसीलिए न केवल लखनऊ की, वरन् गोंडा-बहराइच की लड़कियाँ बेंगलौर, मुंबई और चेन्नई में रहने लगीं। वहाँ उन्हें एक नई स्वतंत्रता प्राप्त हुई और वह अपने जीवनसाथी का चयन स्वयं करने लगीं। 

इसके अतिरिक्त समाज का वर्गीय चरित्र भी बदला है। अब जैसे मध्य वर्ग है। इतना वैविध्यपूर्ण सामाजिक वर्ग कम मिलेगा। स्थान के हिसाब से इसकी हैसियत बदलती रहती है। लखनऊ का जो रहवासी लखनऊ में मध्यवर्ग का कहलाता है, वह दिल्ली और मुंबई जाने पर निम्न मध्यवर्गीय हैसियत का हो जाता है। यह जो स्थलपरक वर्गीय हैसियत है, इनका द्वंद्व सामने आ रहा है। लखनऊ के खुले मकान में रहने वाले माँ-बाप जब मुंबई के दो कमरों में फ्लैट में क़दम नाप-नाप कर रहते हैं, तो महीने दो-महीने में वापस लौटने की सोचने लगते हैं। इस अर्न्तमध्यवर्गीय सामाजिक द्वंद्व की कहानियाँ हिंदी कहानीकार की नई कलम को आमंत्रित कर रही हैं।

मेरी समझ में कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ हिंदी कहानी दाखिल होने से कतराती है। मैं एक उदाहरण बंगाली प्रवासियों का देता हूँ, हालाँकि उन्हें हिंदी  पट्टी में बसे सौ, सवा सौ साल तो हो ही चुके हैं, किंतु मुश्किल से किसी हिन्दी कहानी में बंगाली चरित्र और जीवन मिलेगा। यही हाल 1947 के बाद आए रिफ्यूजियों का है। कितने पंजाबी, सिंधी सरनेम हमारी कहानियों के पात्र हैं? दूसरा क्षेत्र धार्मिक अल्पसंख्यक का है। यह क्षेत्र तो पूरी तरह से हिंदू-मुस्लिम युग्मज की भेंट चढ़ गया है, जैसे कि सिख और ईसाई यहाँ रहते ही न हों। यह हिंदू-मुस्लिम की साहित्यिक अभिव्यक्तियाँ भी राम-रहीम की एकता या सांप्रदायिक/धर्मनिरपेक्ष उठापटक के लेखन से कभी-कभार ही आगे जा पाती हैं। मुझे प्रसन्नता है कि कुछ मुस्लिम हिंदी लेखक आज अपने समाज की स्वतंत्र और आंतरिक तस्वीरें सामने लाने लगे हैं।

एक और क्षेत्र बच्चों का है। कामकाजी माँ-बाप अपने बच्चे कैसे पालें, यह बड़ी समस्या है। एक बच्चे को माँ-बाप और ख़ासतौर पर और एक उम्र तक माँ चाहिए। 'सूरदास तब विहंसि जसोदा लै उर कंठ लगायों' छिन-पल में जब माँ नहीं होगी तो बच्चा क्या महसूस करेगा?

बच्चों की भावनात्मक ज़रूरत इस समय महँगे खिलौनों से ख़रीदी जा रही है। यह परिदृश्य कामकाजी माँ-बाप के घरों का है। इन माँ-बाप की अलग मज़बूरी है। यह एक ऐसा आग का दरिया है जिसे हिन्दी कहानीकार को बार-बार तैर कर पार करना है।

हिन्दी कहानी में अनुपस्थित या कम उपस्थित विषयों में एक क्षेत्र उन घरेलू कामगारों का है जिनमें अधिकतर वे स्त्रियां हैं जो मध्यवर्गीय घरों में झाडू-पोछा, चौका-बर्तन करने जाती हैं। इसे दो-तीन पायदान ऊपर कुक स्त्रियाँ हैं जो इन घरों में खाना बनाने जाती हैं। बर्तन माजने वाले की आकांक्षा है कि वह भी कुक बन जाए। निम्नवर्ग और श्रमजीवी जीवन का सामाजिक बोध हमें यह बताता है कि अब हमारा समाज एक टिपिकल आकांक्षी समाज हो गया है। हैसियतों और औकातों की पुरानी मान्यताओं को हर क्षेत्र में चुनौती मिल रही है। बड़े शहरों की मध्यवर्गीय रिहाइशों के पास जो झोपड़पट्टियाँ प्लास्टिक का तिरपाल तान रही हैं उनके रहवासियों को भी वह सब कुछ चाहिए जो वह अपने मध्यवर्गीय सेवायोजकों के यहाँ देखते हैं। घरेलू सेवकों का यह आकांक्षी समाज हज़ारों ख़्वाहिशों को जन्म दे रहा है। जिनमें से कुछ पूरी होती हैं, कुछ आधी-अधूरी रह जाती हैं और कुछ जीवन का सपना बन जाती हैं। इन तीनों गतियों का अंर्तद्वन्द्व हिंदी कहानी में जगह की माँग कर रहा है।

 

आपकी कहानियों के शीर्षक बहुत अर्थपूर्ण होते हैं, 'गृहस्थी का रजिस्टर' जैसे शीर्षक में ही घरेलू जीवन और सामाजिक यथार्थ का एक सुंदर रूपक छिपा हुआ है। समय के साथ परिवार की संरचना, संबंधों और प्राथमिकताओं में बहुत बदलाव आया है। क्या इन बदलावों ने आपकी अपनी कथा-दृष्टि में 'गृहस्थी' के अर्थ को भी बदला है?

जी हाँ, गृहस्थी के अर्थ में युगान्तरकारी बदलाव आए हैं। इसकी नींव तो उसी समय पड़ गई थी जब गृहस्थी का अर्थशास्त्र बदला। परिवार में आय के स्रोतों में बदलाव आये। उदाहरण के लिये एक संयुक्त परिवार जिसका पालन-पोषण केवल कृषि की आय से होता था,उसमें जब आय के अन्य स्रोत जैसे नौकरी या अन्य व्यवसाय जुड़े तो संयुक्त परिवार की जगह न्यूक्लियर परिवार आए। इस संरचनात्मक बदलाव के कारण पारंपरिक रिश्ते शिथिल हो गए। किन्तु आरंभ में यह न्यूक्लियर परिवार भी पुरुष के वर्चस्व को स्थापित करने जाली सामाजिक संस्था थी। 'गृहस्थी के रजिस्टर' के गृहस्वामी की पत्नी नौकरी करती है किंतु पति, पत्नी की पूरी तनख़्वाह अपने कब्जे में ले लेता है और हर ख़र्चे को एक रजिस्टर में लिखता है। इस दम्पत्ति का पुत्र पढ़ लिख कर जब कोई नौकरी प्राप्त करने में असमर्थ रह जाता है तब वकालत का पेशा अपनाता है जो उसके लिए एक "बाइज्जत बेरोजगारी" थी। इस लड़के के लिए एक कमासुत लड़की की तलाश होती है। जब वह लड़की घर की बहू बन कर आती है तब वह इस पूरी व्यवस्था को उलट-पुलट देती है।

तनख़्वाह उसके हाथ में रहती है और गृहस्थी का रजिस्टर भी वह हथिया लेती है। उसका विद्रोह उसकी आवाज़ में कम उसके कर्म में अधिक है।

अब तो गृहस्थी का स्वरूप हर पाँच साल में बदल रहा है। डबल इनकम, नो किड्स और उससे भी आगे सिंगल पेरेंटिंग में कुछ भी हो सकता है, किंतु कोई गृहस्थी तो निर्मित नहीं होती है। मेरी यह मान्यता है कि यह बदलाव कोई प्रगतिशील सार्थक बदलाव नहीं है, वरन् कुछ रुझान है। मैं इन रुझानों का दर्शक हूँ, समर्थक नहीं। किन्तु यदि कोई नई कलम इन रुझानों पर स्याही ख़र्च करना चाहती है तो हिन्दी कहानी में उसे भी जगह मिलनी चाहिए। आख़िरकार, साहित्य का लोकतंत्र तो तभी कायम रह पाएगा।

अंत में ज़ोर देकर मुझे कहना है कि मेरे रचना कर्म में परिवार की केन्द्रीयता है। इस केन्द्रीयता को विचलित करने वाला लेखन मेरा अभीष्ट नहीं है।

 

करुणा के साथ विडंबना और सामाजिक विसंगति भी देखनी है तो आपकी कहानियों को भी पढ़ा जाना चाहिए। मैं आपसे समझना यह चाहता हूँ कि करुणा को कथा में प्रभावी बनाने के लिए क्या लेखक को भावुकता से एक दूरी बनाए रखना ज़रूरी है? आपके लिए संवेदना और भावुकता के बीच वह महीन रेखा कहाँ है?

 

देखिए गलदश्रु भावुकता और भावुकता में एक महीन फर्क़ है। भावुक हृदय में ही संवेदना जागृत होती है। अतः भावुकता से दूरी बनाने का ख्याल मुझे नहीं जँचता है। लेकिन, वह भावुकता जो विचार के स्तर पर पाठक को प्रभावित न करें, उसका साहित्यिक मूल्य बहुत कम है। करुणा के साथ विडंबना और सामाजिक विसंगति दर्शाने के लिए लेखक के पास एक सामाजिक अंतर्दृष्टि होनी चाहिये। जो लेखक सहानुभूति और समानुभूति के बीच का अंतर जानता है, वह संवेदना और भावुकता के बीच की महीन रेखा भी पहचान लेगा।

 

आपके कहानी-संग्रह 'जीविका जीवन', 'उपकथा का अन्त', 'गृहस्थी का रजिस्टर' और प्रकाशनाधीन संग्रह 'सुख का कुआँ खोदते हुएः दिन-प्रतिदिन' आपके लंबे लेखकीय अनुभव के अलग-अलग पड़ावों का प्रतिनिधित्व करते हैं। पीछे मुड़कर देखते हुए क्या आपको इन कृतियों में अपने कथा-विकास की अलग-अलग अवस्थाएँ दिखाई देती हैं? यदि हाँ, तो वे अवस्थाएँ क्या हैं?

 

हाँ, 'जीविका जीवन' में मेरे लेखन के शुरुआती दौर की कहानियाँ हैं, अधिकांशतः रोचक स्मृतियों का भोग लगाने वाली कहानियाँ हैं जैसा कि इस कथा संग्रह का शीर्षक ही बताता है। इसमें अनेक कहानियाँ ऐसी हैं जो यह दर्शाती हैं कि मनुष्य की जीविका कैसे उसके जीवन को आकार और अर्थ देती हैं।

फैजाबाद से लखनऊ के बीच एक लोकल ट्रेन चलती थी। आज भी चलती है। यह लोकल ट्रेन लखनऊ में बड़ी लाइन के स्टेशन से चलती थी। रास्ते के हर स्टेशन पर रुकती थी। हम लोग अवध के बासी हैं तो दोनों शहरों से सरोकार था, आना-जाना था। पता नहीं क्यों एफ. बी. एल. (फैजाबाद-बाराबंकी-लखनऊ पैसेंजर गाड़ी) लखनऊ के जिस प्लेटफार्म से वापस फैजाबाद के लिये रवाना होती थी, उसे ‘गदहा लाइन' कहते थे। इस नामकरण पर मुझे आज भी हँसी आती है। उस समय संवेदना इतनी जल्दी जख्मी नहीं होती थीं। जीविका जीवन की कहानियों में मेरी नौकरी के प्रारंभिक अनुभवों की कहानियाँ हैं। यह कहानियाँ रोचकता पर बल देती प्रतीत होती हैं, इसीलिए इनकी पठनीयता बेहतर है। परंतु बेहतर पठनीयता का मतलब यह नहीं है कि यह आवश्यक रूप से बेहतर कहानियाँ हैं। भाषा की चुहल ने इनकी मार्मिकता को प्रभावित किया है। ऐसा लगता है कि लेखक स्थितियों और पात्रों को भलीभाँति देख तो रहा है किंतु उनका उपहास भी कर रहा है। उक्त कमी के बावजूद इस संग्रह में कई कहानियाँ ऐसी हैं जिनमें शहरी मध्यवर्ग के भेद-विभेद और उनका बदला हुआ चेहरा दिखाई पड़ता है।

'गृहस्थी के रजिस्टर’ में मेरी श्रेष्ठतर कहानियाँ हैं। ख़ासकर गृहस्थी का रजिस्टर' नामक कहानी तो मेरी हस्ताक्षर कहानी है। इस संग्रह की अन्य कहानियों से भी मुझे संतुष्टि मिली। मैं इस संग्रह में बतौर लेखक अपना विकास देख पाता है। 'सुख का कुआँ खोदते हुएः दिन-प्रतिदिन' में भी मैंने नई जमीन तोड़ी है। अभी यह संग्रह प्रकाशनाधीन है। जहाँ तक कथा के विकास की अवस्थाओं की बात है, यह विकास वाक्य कौशल को कम करते हुए अनुभव को अनुभूति की ओर सहानुभूति को समानुभूति की ओर ले जाने के लिए अधिक चैतन्य है। मुझे इस बात की ख़ुशी है कि इधर हाल में मैंने जो कहानियाँ लिखी हैं, वह अपनी प्रकृति में अन्वेषणात्मक है और तद्नुसार उनका भाषिक और भाविक विन्यास है।

 

'सुख का कुआँ खोदते हुएः दिन-प्रतिदिन' यह शीर्षक अपने आप में संघर्ष, आकांक्षा और जीवन की विडंबना को समेटे हुए है। आपके लिए 'सुख' आखिर क्या है? व्यक्तिगत उपलब्धि, सामाजिक सुरक्षा, अच्छे मानवीय संबंध या भीतर मिलने वाला कोई आत्मिक संतोष? और क्या मनुष्य सचमुच सुख पाता है या जीवन भर उसका कुआँ ही खोदता रहता है?

 

मैंने जो जीवन देखा है, अपना और दूसरों का, उसके प्रकाश में तो यही कह सकता हूँ कि सुख का कुआँ खोदे हुए बिना जिसे सुख मिलता है वह रोज़मर्रा के जीवन का अनुभव करने में असमर्थ है। हालाँकि मेरा यह कथन भी आज की तारीख़ में निहायत विडंबनापूर्ण है। पेंशन प्राप्त कर रहा हूँ, बिना कुछ किये-धरे। कोई कुआँ नहीं खोद रहा हूँ। मेरी सहानुभूति अब उनके साथ है जो पुराने हिंदी मुहावरे रोज कुआँ खोदना, रोज पानी पीना के अनुसार ज़िन्दगी की जद्दोज़हद में लगे हैं। इस मुहावरे में ईमानदार श्रम है, चालबाजी नहीं। सकाम कर्म और फल से ही सुख की प्राप्ति होती है। मेरे लिए सबसे बड़ा सुख है परिवार और बृहत्तर समाज के प्रति कर्तव्यों का पालन और सम्मानपूर्ण जीवन जिसमें दूसरों को सम्मान देना भी शामिल है। सृजन मुझे आत्मिक संतोष देता है और सामाजिक सुरक्षा उस सृजन की स्वतंत्रता है।

 

आपके उपन्यास 'एक गन्धर्व का दुःस्वप्न' का शीर्षक अपने आप में बहुत कुछ सोचने को विवश करता है। 'गन्धर्व' जैसी सौंदर्य और कल्पना से जुड़ी छवि के साथ 'दुःस्वप्न' का यह संयोजन आपने क्यों चुना? इसके पीछे कौन-सा जीवन-इंद्र या अनुभव काम कर रहा था?

 

आपके प्रश्न के उत्तर में सर्वप्रथम में इसी उपन्यास से तीन कथन उद्धृत कर रहा हूँ:

 

ब्रह्मा से तत्पश्चात गंधवों की उत्पत्ति हुई। ये उच्चारण वा गाने करते जन्मे, इसीलिए गंधर्व नाम से अभिहित हुए-

-विष्णुपुराण

गंधर्व दो भागों में विभक्त हैं। जो मनुष्य इस कल्प के मध्य गंधर्व समाज-भुक्त हुए उन्हें मर्त्य और जो इस कल्प के आदि से गंधर्व हैं, उन्हें दिव्य गंधर्व कहते हैं।

शब्द चिंतामणि

जिले में गंधर्व जाति के उन्तालीस लोग हैं। उनका पेशा नाचना और गाना है। इनका चरित्र बहुत प्रतिष्ठित नहीं है।

जनगणना 1901, जिला फैजाबाद

 

उपरोक्त उद्धरणों से यह स्पष्ट हो जाएगा कि शब्द गंधर्व ने कितनी लंबी यात्रा की है, पुराण से लेकर इतिहास तक की दिव्य से लेकर मर्त्य और मर्त्य से अप्रतिष्ठित उन्तालीस तक। उपन्यास की विषयवस्तु एक संगीतकार की सामाजिक असंपृक्तता और बाबरी मस्जिद के ढ़हाए जाने का दस्तावेज़ी विवरण है। मैं संगीत को सर्वश्रेष्ठ ललित कला मानता हूँ क्योंकि यह कला किसी गेय पद, पर अनिवार्यतः आश्रित नहीं है, जैसे कि चित्रकार कैनवस और कूँची पर, मूर्तिकार पत्थर और छेनी पर अनिवार्यतः आश्रित है। उसका बस एक ध्वन्यात्मक लोक है। संगीत, शिक्षित, अशिक्षित और निरक्षर सबके हृदय में बज सकता है। परंतु इस सर्वश्रेष्ठ कला का एक विवादित पक्ष भी है। संगीतकार किसी की भी महफ़िल में गा बजा सकता है। बीथोवन को छोड़कर शायद ही कोई उदाहरण मिले कि संगीतकार ने अत्याचारी शासकों का विरोध किया हो। ऐसे में मेरे उपन्यास का नायक जो गंधर्व जाति का नहीं है, किंतु पेशे से उनका बिरादर है, शहर की सामाजिक संरचना के विध्वंस को दुःस्वप्न के जरिए ही देख रहा था। उसका दुःस्वप्न यद्यपि एक निष्क्रिय प्रतिवाद है, किंतु उसकी मौन चीख भी है। उपन्यास में से ही निम्न पंक्तियाँ उद्धृत कर रहा हूँ।

 

'हे स्वप्न, हम तुम्हारी जन्मभूमि जानते हैं तुम देवभगिनियो के पुत्र हो, तुम यम के सहायक हो, तुम अन्तर हो, तुम मृत्यु हो, मैं दुःस्वप्न देखने पर घूम जाता हूँ (करवट बदल लेता हूँ) में स्वप्नों में आगत दुश्चिन्ताओं को भगाता हूँ।

 

-अथर्ववेद

 

'बस्तियों का कारवाँ' पढ़ते हुए लगता है कि विभाजन केवल जमीन के एक टुकड़े से दूसरे टुकड़े तक का विस्थापन नहीं था; वह स्मृतियों, संस्कृति, भाषा और पहचान का भी विस्थापन था। आपके लिए इस उपन्यास में 'बस्ती' केवल रहने की जगह है या वह स्मृति, संस्कृति और सामूहिक पहचान का भी एक रूपक बन जाती है?

 

'बस्तियों का कारवाँ' मेरा दूसरा और घोषित रूप से अंतिम उपन्यास है। इसे लिखकर मैंने अपने लेखकीय स्व की प्राप्ति की। विश्व इतिहास में सहस्त्रों सत्ता परिवर्तन हुए हैं लेकिन भारत-पाक विभाजन एक ऐसी त्रासदी है जहाँ न केवल राजा बदला, वरन् प्रजा भी बदल गई। इस प्रजा को उन स्थानों से पलायन करना पड़ा जहाँ वह सैकड़ों सालों से अपनी सांस्कृतिक पहचान, स्मृतियों के साथ एक मातृवत भाषिक परिवेश में रह रहे थे। मनुष्यों का कारवाँ तो एक बहुप्रचलित पद है लेकिन जहाँ पूरी की पूरी बस्तियाँ उजड़ कर भागें तो वह तो बस्तियों का कारवाँ ही हुआ। वैसे तो विभाजन का दंश पंजाबियों, बंगालियों और सिंधियों को सहना पड़ा किंतु इनमें भी सिधियों की पीड़ा एक अलग ही दर्जे की थी। भारत-पाक विभाजन के समय, जब पंजाब विभाजित हुआ तो पंजाबी हिंदू और सिखों के पास भारतीय पंजाब के रूप में एक होमलैंड था। बंगाल विभाजित हुआ तो बंगाली हिंदुओं के लिए एक भारतीय बंगाल था। इनका उत्पाटन हुआ, इन्होंने अकथनीय हिंसा सही, किंतु इनका सांस्कृतिक उच्छेद नहीं हुआ। इनके बरक्स सिंधियो को तो कुछ भी नहीं मिला। भारत में उन्हें कोई होमलैंड नहीं मिला, इसलिए पूरा भारत सिंधियों का होमलैंड हो गया। उन्हें जहाँ जगह मिली, बस गए और बिना किसी दैन्य के उन्होंने शरणार्थी से पुरुषार्थी बनने की यात्रा की। पंजाब के विभाजन पर पंजाबी और उर्दू में ख़ूब लिखा गया। हिंदी में यशपाल और भीष्म साहनी जैसे बड़े लेखकों ने लिखा। बंगाल के विभाजन पर प्रचुर मात्रा में बंगाली साहित्य उपलब्ध है। हिंदी में राजकमल चौधरी ने थोड़ा बहुत लिखा है। पर हमारी हिंदी पट्टी के कितने लेखकों ने इस क्षेत्र में आकर बसे सिंधी शरणार्थियों के जीवन और संघर्ष पर लिखा? ऐसे में विभाजन के शिकार सिंधी शरणार्थियों पर लिखने का विचार मेरे मन में आया। इस उपन्यास में 'बस्ती' एक पूरे समुदाय के सामूहिक पलायन का मानवीकरण है।

 

इस उपन्यास को लिखते समय मैंने सिन्ध और सिन्धियों के इतिहास के बारे में पढ़ा, कुछ सिन्धी परिचितों से भी बात की। मुझे बहुत अच्छा लगा यह जानकर कि सिंधियों में ब्राह्मण तो होते हैं किंतु इस समाज में वर्णवादी वर्चस्व की भावना नहीं है। सिंधी समाज में श्रेणीगत विभाजन तो है जो कार्य और पेशे पर निर्भर थे। एक हिंदू समाज में ऐसी वर्णविहीन व्यवस्था की उपस्थिति मेरी रचनात्मकता के लिए एक बड़ी प्रेरणा थी। इसके बाद तो मैंने हिंदी पट्टी से बाहर के अन्य समाज के बारे में नई जानकारी की। पता लगा कि वर्णवादी वर्चस्व का भौगोलिक विस्तार भारत में सर्वव्यापी नहीं है।

 



                                                                                                                      - प्रदीप श्रीवास्तव

पाठकगण इस साक्षात्कार  का अंतिम  भाग अगले ब्लॉग में पढ़ सकते हैं ।

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शब्देन्द्रिय: कहानी लिखने का रचनात्मक आनंद तभी है जब कहानी भी एक चरित्र बन जाए: हरीचरन प्रकाश
कहानी लिखने का रचनात्मक आनंद तभी है जब कहानी भी एक चरित्र बन जाए: हरीचरन प्रकाश
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